महिला दिवस पर भी रोटी की चुनौती

महिला दिवस के मौके पर भी दो वक्त के रोटी के जुगाड़ की चुनौती
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अनगड़ा : महिला दिवस के अवसर पर महिलाओं के सम्मान में देश विदेश में कार्यक्रम आयोजित किये गए।

कई मंचो पर महिलाओं को सम्मानित भी किया गया।

तो ठीक उसी रात इन सबसे दूर ग्रामीण क्षेत्र की एक आठ साल की बच्ची गुड़िया (काल्पनिक) नाम और दो महिलाएं वैवाहिक कार्यक्रम में सर पर लाईट ढोते हुये दो वक्त की रोटी की जुगाड़ कर रहे थे।

इनमे शामिल एक महिला ने तो अपने पीठ पर दुधमुहे मासूम बच्चे को भी बांध रखा था।

यकीनन आजादी के सात दशकों में महिलाओं के उथान और विकास के कई कार्यक्रम शुरू किये गए और आज भी जारी है।

लेकिन इन योजनाओं का लाभ क्या सचमुच महिलाओं को मिल पाया खासकर ग्रामीण क्षेत्र की महिलाओं को।

इस सवाल का उत्तर शायद ही कोई दे पाये।

ग्रामीण समाज की महिलाओं की समस्या कुछ अलग प्रकृति की है।

यंहा आज भी महिलाएं दोयम दर्जे की नागरिक है।

सुबह खाना बनाने से लेकर रात में बचा हुआ खाने का निवाला खाने तक उन्हें हाड़तोड़ मेहनत करनी पड़ती है।

सरकार द्वारा कई अधिकार महिलाओं को दिये गए।

लेकिन यह अधिकार सिर्फ मध्यम वर्ग की महिलाएं प्राप्त कर रही है।

संगठित श्रम बाजार में ग्रामीण महिलाएं अनुपस्थित है।

यही वजह है कि वे अपने अधिकार न ले पा रह ही है ।

और न शोषण मजबूरी अभय अत्याचार के खिलाफ खड़ी हो पा रही है।

आज भी महिलाओं को शिक्षा के लायक नही समझा जा रहा।

यह दर्द सिर्फ गुड़िया तक सिमटा नही है ऐसी सैकड़ो गुड़िया चौक चौराहे पर खड़ी है।

स्थिति तो इतनी बदतर है कि महिलाएं संपति स्वास्थ्य शिक्षा यहां तक कि स्वयं के शरीर पर प्राकृतिक अधिकार से वंचित है।

यह कहने में कोई अतिश्योक्ति नही होगी कि इतना आगे बढ़ने के बावजूद सच्चाई यह है कि महिलाएं आज भी बहुत पीछे खड़ी है।

इन्हें जागरूक करने की आवश्यकता है ताकि सदियों से घुटन भरी जिंदगी जी रही नारी शक्ति को सबसे बड़े लोकतंत्र का भाग्य तय करने में आने का अधिकार मिले।

क्योंकि देश की महाशक्ति का रास्ता नारी शक्ति के द्वारा ही तय कर सकते है।

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