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हीरा बना डाला वह भी कमरे के अंदर चंद मिनटों में

  • शुद्ध कार्बन के तैयार होने की विधि को ही बदल डाला

  • सामान्य तापमान में इसे बनाने में पहली कामयाबी

  • प्राकृतिक हीरा से ज्याद कठोर भी है यह

  • ग्रेफाइट से ही हीरा बनाने की यह विधि

  • अब कम दबाव में हीरा पर काम जारी

राष्ट्रीय खबर

रांचीः हीरा बना डाला वह भी सामान्य तापमान पर। यह अपने आप में बड़ी बात है। वरना

हीरा नाम ही हमें सतर्क कर देता है। प्लैटिनम को अलग कर दें तो यह दुनिया की सबसे

महंगी चीज है। खास तौर पर आभूषणों में इसके इस्तेमाल से पहनने वालों की रौनक बढ़

जाती है। काफी महंगी होने के पीछे का भी सच यह है कि यह आसानी से नहीं मिलता।

जिस परिश्रम से उसे खदानों से निकाला जाता है, उसी वजह से उसकी कीमत वैसे ही बढ़

जाती है। लेकिन अब शायद यह स्थिति बदलने जा रही है। सामान्य तापमान पर हीरा

बनने की बात सपने में भी सच नहीं लगती थी। दरअसल वैज्ञानिक तथ्यों के मुताबिक

प्राकृतिक तौर पर अथवा प्रयोगशाला में भी कृत्रिम हीरा बनाने के लिए अत्यधिक दबाव के

साथ साथ ताप की भी जरूरत पड़ती है। पहली बार इस सिद्धांत के उलट सामान्य तापमान

पर ही हीरा बनाने में वैज्ञानिकों को कामयाबी मिल गयी है। ऑस्ट्रेलिया के नेशनल

यूनिवर्सिटी और आरएमआईटी के वैज्ञानिकों ने ऐसा कर दिखाया है। अपनी कोशिशों के

तहत वे दो किस्म का हीरा बनाने में कामयाब हुए हैं। यह भी बड़ी बात है कि इन हीरों को

बनाने में उन्हें महज कुछ मिनट का समय लगा है। जो हीरा इसमें तैयार हुआ है उनमें से

एक लोंसडेलाइट कहा जाता है। दूसरे हीरा कुछ वैसा है जैसा कि आम तौर पर शादी की

अंगूठी में आभूषण बनाने के काम आता है। लिहाजा अब यह भी माना जाता है कि इस

विधि से हीरा तैयार होने की वजह से अब हीरे की कीमतों में भी कमी आयेगी क्योंकि इस

विधि से तैयार हीरा भी बिल्कुल असली हीरा के जैसा ही नजर आयेगा।

हीरा बना डाला तो उसकी वैज्ञानिक परख भी होने लगी

इससे पहले हम यही जानते थे कि जमीन की अधिक गहराई में लाखों वर्षों तक पड़े रहने

की वजह से पेड़ पौधे कार्बन के इस स्वरुप में बदल जाते हैं। क्योंकि यह कार्बन का सबसे

शुद्ध स्वरुप है। मिट्टी के अंदर के अत्यधिक दबाव और भीषण गर्मी से कार्बन के इस स्वरुप

की संरचना होती है। इसी वजह से खदानो से निकलने वाले हीरों की कीमत भी काफी

अधिक हुआ करती है। इस कड़ी में प्रयोगशाला में दूसरे किस्म का हीरा बना डाला था। 

व्यापारिक इस्तेमाल और उत्पादन के लिहाज से उन्हें अमेरिकन डायमंड या एडी कहा

जाता है।  

इस शोध से जुड़े वैज्ञानिकों ने पूरी प्रक्रिया को भी स्पष्ट कर दिया है। उन्होंने बताया है कि

कार्बन के अणु कई तरीकों से एक दूसरे से प्रतिक्रिया करते हैं। इन्हीं अलग अलग

प्रक्रियाओँ की वजह से हल्के किस्म के ग्रेफाइट से लेकर कठोर किस्म का हीरा तैयार होता

है। यह सभी कार्बन के अलग अलग स्वरुप ही है। ग्रेफाइट की संरचना के आधार पर ही

वैज्ञानिक इसके पहले ही ग्रेफाइन बना चुके हैं। यह सबसे पतला पदार्थ है, जिसकी कई

किस्म की उपयोगिता सामने आ चुकी है। वैज्ञानिकों ने प्राकृतिक हीरा से प्रयोगशाला में

बने इस हीरे का अंतर साफ करते हुए कहा है कि आम तौर पर प्राकृतिक हीरा में एक

घनाकर स्फटिक का स्वरुप नजर आता है। लेकिन उनके द्वारा तैयार हीरा घनाकार नहीं

बल्कि षटकोणाकार है। इसी वजह से उसका नाम भी लोंसडेलाइट रखा गया है। बता दें कि

रॉयल सोसायटी के सदस्य रहे कैथलीन लोंसडेल के नाम पर इसका नामकरण हुआ है।

उस वैज्ञानिक ने एक्स रे किरणों की मदद से कार्बन के ढांचे की अवधारणा को सार्वजनिक

किया था।

कमरे के तापमान पर इन्हें बनाना पहले संभव नहीं हुआ था

सामान्य तापमान पर इन्हें तैयार करने के लिए तापमान का इस्तेमाल नहीं करने के बदले

दबाव का प्रयोग किया गया है। इस पद्धति से हीरा बनाने वालों का दावा है कि इस विधि से

तैयार हीरा प्राकृतिक हीरा के मुताबिक 58 प्रतिशत अधिक कठोर है। पृथ्वी में प्राकृतिक

हीरा को ही अब तक का सबसे कठोर पदार्थ माना जाता रहा है। ग्रेफाइट पर लगातार दबाव

देने के क्रम में उनकी रचना हुई है। इसके लिए अतिरिक्त तापमान की आवश्यकता भी

नहीं पड़ी है। अत्यधिक दबाव की वजह से ही कार्बन के ग्रेफाइट जैसे स्वरुप में बदलाव होने

लगता है। एक खास प्रक्रिया के तहत उससे हीरा बनाया जा सकता है। शोधकर्ताओं के

मुताबिक सामान्य तापमान पर इस विधि से लोंसडेलाइट अथवा सामान्य हीरा भी तैयार

किया जा सकता है। इस विधि से हीरा बनाने के लिए ऊपर से एक खास दिशा में दबाव

और नीचे से उल्टी दिशा में दबाव दिया गया है। इसी चौतरफा दबाव की वजह से ग्रेफाइट

की आणविक संरचना में बदलाव होने की वजह से वह हीरा में तब्दील हो गया है।

अब तो शायद हीरा पर आधारित दुनिया ही बदल जाएगा

अब इस विधि से हीरा तैयार होने का प्रयोग सफल होने के बाद पूरा हीरा उद्योग ही संभवः

बदल सकता है। इसकी खास वजह बहुत कम समय में और बहुत कम खर्च में उसका

उत्पादन है। इस विधि से तैयार हीरा भी व्यापारिक इस्तेमाल में काम आने वाले नकली

हीरों के मुकाबले ज्यादा बेहतर गुणवत्ता वाले हैं। लेकिन इस शोध से जुड़े वैज्ञानिक इतने

में ही संतुष्ट नहीं है। अब से इसे बनाने में इस्तेमाल होने वाले दबाव को और कम करने के

विषय पर काम कर रहे हैं। यानी वे अपने अनुसंधान के अगले चरण में सामान्य तापमान

में और बहुत कम दबाव में हीरा बनाने की विधि को परिष्कृत करना चाहते हैं। इसके

सफल होने पर हीरा उत्पादन की विधि और कम खर्चीला और समय बचाने वाला साबित

होने जा रहा है।

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