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वो सुबह कभी तो आयेगी जब रात का आंचल ढलकेगा

वो सुबह कभी तो आयेगी क्योंकि अब उसकी उम्मीद बढ़ चली है। जी हां मैं देश में कोरोना

की स्थिति पर बात कर रहा हूं। कहां हर रोज चार लाख से अधिक संक्रमण से घटकर अब

85 हजार के कम संक्रमण का आंकड़ा तो यही शुभ संकेत दे रहा है। लेकिन इसमें भी शर्त है

कि हम पिछली बार वाली गलती नहीं करें। सरकार ने व्यापार और लोगों के आम

जनजीवन में छूट दी है। उस छूट का अपने और समाज के लाभ के लिए कैसे इस्तेमाल

करना है, यह तो हमलोग ही बेहतर समझ सकते हैं। वरना पिछली बार की गलती की सजा

तो पूरा देश भुगत ही रहा है। इस बार ऐसी गलती हम ना दोहरायें, यही गनीमत है।

लेकिन यह गीत किसान आंदोलन के लिए भी सटीक बैठता है। छह माह से अधिक हो गये

किसान आंदोलन को और दोनों पक्ष अपनी अपनी बात पर अड़े हुए हैं। उम्मीद है कि कभी

तो यह गतिरोध टूटेगा और सड़कों पर बैठे किसान अपने अपने घर लौटेंगे। वैसे सरकार

की तरफ से एमएसपी के एलान के बाद ऐसा माना जा सकता है कि छह महीने से चला आ

रहा गतिरोध अब इसलिए समाप्त होने वाला है क्योंकि उत्तर प्रदेश भाजपा में सब कुछ

सही नहीं चल रहा है। खास तौर पर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के भाजपा नेता अब साफ साफ

कहने लगे हैं कि सरकार के अड़ जाने की वजह से अब वे गांवों तक में नहीं जा पा रहे हैं।

जहां भी जाते हैं, खुलकर विरोध होता है। स्थिति बड़ी विकट है। उधर योगी जी के तेवर भी

सीधे सीधे चुनौती देने वाले हैं। मजेदार बात यह है कि श्री मोदी और योगी दोनों ही शायद

अब्बल दर्जे के जिद्दी प्रवृत्ति के हैं।

योगी और मोदी दोनों ही जिद्दी हैं एक तरीके के

पिछली बार भी जब मुख्यमंत्री बनाने की बात आयी थी तो योगी आदित्यनाथ अड़ गये थे।

इसी वजह से मनोज सिन्हा के बदले उन्हें मुख्यमंत्री बनाया गया था। अब आगे देखिये

क्या होता है। इसी बात पर एक काफी पुरानी फिल्म का उत्साहवर्धक गीत याद आने लगा

है। इस फिल्म का नाम भी था फिर सुबह होगी। इस गीत को लिखा था साहिर लुधियानबी

ने और संगीत में ढाला था खय्याम ने। इस गीत को मुकेश कुमार और आशा भोंसल ने

अपना स्वर दिया था। गीत के बोल कुछ इस तरह हैं

वो सुबह कभी तो आयेगी, वो सुबह कभी तो आयेगी
इन काली सदियों के सर से, जब रात का आंचल ढलकेगा
जब अम्बर झूम के नाचेगी, जब धरती नग़मे गाएगी
वो सुबह कभी तो आयेगी …

जिस सुबह की खातिर जुग-जुग से,
हम सब मर-मर के जीते हैं
जिस सुबह की अमृत की धुन में, हम ज़हर के प्याले पीते हैं
इन भूखी प्यासी रूहों पर, एक दिन तो करम फ़रमायेगी
वो सुबह कभी तो आयेगी …

माना के अभी तेरे मेरे इन अरमानों की, कीमत कुछ नहीं
मिट्टी का भी है कुछ मोल मगर,
इनसानों की कीमत कुछ भी नहीं
इनसानों की इज़्ज़त जब झूठे सिक्कों में ना तोली जायेगी

वो सुबह कभी तो आयेगी …

दौलत के लिये अब औरत की, इस्मत को ना बेचा जायेगा
चाहत को ना कुचला जायेगा, गैरत को ना बेचा जायेगा
अपनी काली करतूतों पर, जब ये दुनिया शरमायेगी
वो सुबह कभी तो आयेगी …

बीतेंगे कभी तो दिन आखिर, ये भूख और बेकारी के
टूटेंगे कभी तो बुत आखिर, दौलत की इजारेदारी की
अब एक अनोखी दुनिया की, बुनियाद उठाई जायेगी
वो सुबह कभी तो आयेगी …

मजबूर बुढ़ापा जब सूनी, राहों में धूल न फेंकेगा
मासूम लड़कपन जब गंदी, गलियों में भीख ना माँगेगा
हक माँगने वालों को, जिस दिन सूली न दिखाई जायेगी
वो सुबह कभी तो आयेगी …

चलते चलते पश्चिम बंगाल की भी चर्चा करते चलें, जहां मुकुल अब ममता की छांव में

पल्लवित होने के लिए लौट गये हैं। और कौन कौन जाएगा, इसे लेकर चर्चा जोरों पर है।

भाजपा का प्रदेश नेतृत्व भी बिगड़ती स्थिति को संभाल नहीं पा रहा है। एक तरफ प्रदेश

अध्यक्ष तो दूसरी तरफ शुभेंदु अधिकारी। इस गुटबाजी का क्या नतीजा निकलेगा, यह भी

देखने वाली बात होगी। यानी वहां भी सुबह कभी तो आयेगी का इंतजार हो रहा है। पहली

बार भाजपा को इस किस्म का झटका लगा है तो जाहिर है कि उसके दूरगामी परिणाम भी

होंगे। राज्यो में अपना अपना प्रभाव क्षेत्र रखने वाले छोटे दल भी मत प्रतिशत की गणित

को समझकर आपस में मिलकर भाजपा से दो दो हाथ करने की तैयारियों में दिख रहे हैं।

अंत में कांग्रेस का क्या होगा, यह तो ईश्वर ही जानता है। पार्टी फिलहाल ऐसे संक्रमण

काल से गुजर रही है, जहां पार्टी का नेतृत्व आगे कौन संभालने जा रहा है, इस पर बहस

और मतभिन्नता साफ हो चुकी है।

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