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कानून की अवधारणा और क्रियान्वयन में समानता होनी चाहिए




कानून की अवधारणा हमेशा ही समाज के हितों को ध्यान में रखते हुए ही होती है।

लेकिन कई अवसरों पर ऐसे कानून गलत क्रियान्वयन की वजह से जनता के लिए परेशानी का सबब बन जाते हैं।

वर्तमान में कुछ ऐसी ही स्थिति नये मोटर व्हैकिल एक्ट की है।

इस एक्ट के लागू होने के बाद से लगातार इसकी आलोचना सिर्फ इस वजह से हो रही है

क्योंकि इसमें भारी अर्थदंड का प्रावधान है।

लेकिन दरअसल इस कानून को सिर्फ यह ध्यान में रखते हुए बनाया गया है

ताकि गलत तरीके से गाड़ी चलाने की वजह से होने वाली दुर्घटनाओं और मौत के आंकड़ों को

कम किया जा सके।

इस नये कानून के तहत आर्थिक दंड के तहत लोगों पर अधिक बोझ डाला गया है।

लेकिन इसके क्रियान्वयन पर नजर डालें तो यह हम यह देख पाते हैं कि

इसके अर्थदंड के दायरे में जो लोग अब तक आये हैं,

उनमें से कोई भी उच्च आय वर्ग का व्यक्ति नहीं है।

यानी जो व्यक्ति नोटबंदी के बाद से ही आर्थिक मार झेलता आ रहा था,

उसे अब नये सिरे से अतिरिक्त आर्थिक बोझ का सामना करना पड़ रहा है।

कानून का फायदा बहुमत को हो तभी वह सफल कानून है

गरीब की जेब अथवा उसके परिश्रम का पैसा फिर से सरकारी कोष में जा रहा है।

सरकारी खजाने में बढ़ोत्तरी के साथ साथ हमें यहध्यान में रखना होगा कि इससे गरीब और मध्यम वर्ग की जनता की जेब खाली हो रही है।

जिन मकसद से कानून बनाया गया है, उसपर सवाल उठाने का कोई औचित्य नहीं है।

लेकिन एक दिहाड़ी कामगार जिसकी पूरी दिनचर्या भी किसी खटारा गाड़ी पर आधारित है

अगर उस पर अचानक दस हजार का जुर्माना लग जाए तो वह क्या करेगा, इस बात पर भी विचार करना चाहिए।

कानून के क्रियान्वयन की बात इसलिए प्रासंगिक है क्योंकि पिछले दो दिनों में

इस काम पर नजर रखने के लिए तैनात पुलिस कर्मियों की मंशा कानून का पालन कराना कम और जुर्माना वसूलना अधिक नजर आ रहा है।

कई बातों, जिन्हें नजरअंदाज भी किया जा सकता है, उन्हें जबरन लागू करने के लिए आम आदमी पर

जोर डालना कहीं न कहीं इस कानून के गठन के औचित्य को ही समाप्त कर देता है।

इस हालत से उपजी नाराजगी को भोगेगा कौन

बात सिर्फ इस एक कानून की नहीं है। इसलिए जिस तरीके से कानून बनाये अथवा हटाये जा रहे हैं,

उसमें व्यवहारिक कठिनाइयों को ध्यान में रखना भी जरूरी हो चुका है। केंद्र सरकार ने पुराने और बेकार साबित हो चुके

अनेक कानूनों को हाल ही में खत्म किया है। उसके पीछे का तर्क यही था कि

इन कानूनों का कोई नियमित और व्यवहारिक उपयोग शेष नहीं रह गया था।

इसलिए सरकार की यह जिम्मेदारी भी बनती है कि जो कानून अभी अमल में लाये जा रहे हैं,

उनकी सार्थकता और प्रासंगिकता के साथ साथ आम आदमी पर उनके प्रभाव को भी जांच लिया जाए।

इस कानून के लागू होने और उसके देश भर में हो रही आलोचनाओं को ऑटो उद्योग में आयी मंदी से जोड़ना भी एक बेतूकी बात है।

देश के आर्थिक हालत का जायजा लेते वक्त अब सिर्फ सरकार, भारतीय रिजर्व बैंक और बैकों की स्थिति को ही आधार न माना जाए।

देश की जनता के पास जो पैसा है और वह तेजी से घटता जा रहा है,

इस बात को भी ध्यान में रखना चाहिए। देश की जनता के पास मौजूद पैसे का प्रवाह ही सामाजिक अर्थव्यवस्था के ढांचे तो मजबूत बनाये रखता है।

नया चेकिंग तो पुलिस की कमाई का जरिया भर बन गया है

सरकार की तरफ से तमाम तरीकों की दलील दिये जाने के बाद भी असली सच तो यही है कि

नोटबंदी के बाद से ही देश का आम आदमी अपने घर का बजट सही तरीके से नहीं संभाल पा रहा है।




जिस तर्क के साथ यह कड़ा फैसला लिया गया था, वह तर्क भी बेतूका ही साबित हुआ है

क्योंकि कालाधन अब तक आम जनता की नजरों से गायब ही है। जो सवाल जनता के मन में है,

उस सवाल का सीधा सीधा उत्तर देने में सरकार को परेशानी है।

जनता यह जानना चाहती है कि आखिर देश के बड़े बकायेदार कौन कौन हैं और उनमें से किसके पास कितना पैसा बकाया है।

बैंक यह बताने में परहेज कर रहे हैं। बैंकों के पास जो पैसा है वह भी जनता का पैसा है,

इस बात को बैंक और सरकार दोनों को समझ लेना चाहिए।

इसलिए तमाम ऐसे कल्याणकारी कानूनों को लागू करने के बाद उनकी नियमित समीक्षा होनी चाहिए

ताकि यह पता चल सके कि कहीं ये नये अथवा संशोधित कानून जनता के लिए परेशानी तो नहीं खड़ी कर रहे हैं।

अगर ऐसा है तो पुलिस को इस किस्म के भयादोहन से रोकने के लिए भी उपाय किये जाने चाहिए।

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