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राज्य की वित्तीय हालत की स्थिति स्पष्ट हो

राज्य की वित्तीय हालत के बारे में अब सार्वजनिक जानकारी जरूरी है। यह सवाल

इसलिए खड़ा हो रहा है क्योंकि अक्सर ही राज्य के कोषागारों से भुगतान बंद करने की

नौबत आ रही है। इस बार भी एक दिन पूर्व ही कोषागारों को फिर से भुगतान करने के

आदेश निर्गत किये गये हैं। राज्य सरकार के पास आर्थिक तंगी हो तो यह बात समझ में

आती है कि राज्य का कोष संग्रह सही नहीं रहा है। अथवा केंद्र सरकार से उसे जो राज्यांश

मिलना चाहिए था, वह सही समय पर और सही अनुपात में नहीं मिला है। अगर यह दोनों

बातों नहीं हैं तो एक गंभीर सवाल यह खड़ा होता है कि फिर अनुमानित बजट में क्या कुछ

खामी रही थी, जिसकी वजह से यह आर्थिक दुर्दशा राज्य की वित्तीय स्थिति बिगड़ी है।

वजह चाहे जो भी हो लेकिन यह वर्तमान राज्य सरकार की जिम्मेदारी है कि वह आर्थिक

स्थिति बिगड़ने के मुद्दे पर सही जानकारी जनता के बीच रखें। अनेक राज्यों में इस बात

की शिकायत है कि नये जीएसटी के प्रावधान लागू होने के बाद भी केंद्र सरकार जीएसटी में

राज्य का हिस्सा समय पर नहीं दे रही है। पहले से ही इस बात की जानकारी है कि राज्य

सरकार का ढेर सारा पैसा केंद्र सरकार सहित अन्य प्रतिष्ठानों पर बकाया है

दूसरी तरफ स्थिति यह है कि झारखंड के तमाम संसाधनों का उपयोग करने के बाद

दामोदर वैली कारपोरेशन झारखंड को ही बिजली काटने की धमकी भी दे रहा है। राज्य

गठन के बाद से ही राज्य के वित्तीय अनुशासन पर सही तरीके से ध्यान नही दिया गया।

आज तक यह संकलित तथ्य सामने नहीं आ पाया कि किस जिला को राज्य और केंद्र से

कितने पैसे दिये गये और किस मद में कितना पैसा दरअसल खर्च किया गया।

कहां कितना खर्च हुआ इसका साफ हिसाब हो

यह मसला जब कभी चर्चा में आता है तो सरकार की अफसरशाही असहज सी हो जाती है।

हम घर के बजट से भी इस स्थिति को समझ सकते हैं कि घर में किसी सदस्य को अगर

किसी काम के लिए पैसे दिये जाते हैं, तो उससे उसका हिसाब भी लिया जाता है। अनेक

घरों में बाकी पैसे लौटाने की प्रथा आज भी कठोर तरीके से लागू होती है। ठीक इसी तरह

जिला को अलग अलग फंड में जो पैसे राज्य गठन के बाद से मिलते रहे हैं, उसका हिसाब

लिया जाना चाहिए। इस रिकार्ड के बाद ही हम यह समझ पायेंगे कि दरअसल राज्य किस

रास्ते पर अब तक बढ़ता रहा है। यह बात स्पष्ट है कि राज्य गठन के बाद आधारभूत

संरचना की कमी होने के नाम पर अरबों रुपये भवन बनाने के नाम पर खर्च किये गये हैं।

इन भवनों के बनकर तैयार होने के बाद उनका क्या कुछ उपयोग हो रहा है अथवा वे

जनता के लिए कितने फायदेमंद साबित हो रहे हैं, उसका भी मूल्यांकन किया जाना

चाहिए। वरना अनेक इलाकों में हम उन खंडहर बन रहे स्वास्थ्य उपकेंद्रों को देखते हैं,

जिनमें कोई नहीं रहता और सुनसान इलाके में होने की वजह से भवन के दरवाजे और

खिड़कियों को चोर उठा ले गये हैं। अनेक स्थानों पर सरकारी भवनों की चारदीवारी की ईंटे

भी दूसरों के काम आ रही है, ऐसा देखा जा सकता है। राज्य के अनेक प्रखंड कार्यालयों में

भी बने नये भवनों का नियमित इस्तेमाल अब तक प्रारंभ नहीं हो पाया है। ऐसी स्थिति में

यह माना जा सकता है कि ऐसे निर्माण के मुद्दे पर पैसा खर्च करने की आवश्यकता अभी

नहीं थी।

राज्य की वित्तीय स्थिति सुधारने के लिए फिजूलखर्ची रुके

सिर्फ ठेकेदार और अफसरों की कमीशनखोरी के चक्कर में यह पैसा बर्बाद किया गया है।

अनेक सड़कों के निर्माण के मद में भी पैसे खर्च हुए हैं लेकिन उनका निर्माण कैसा हुआ है,

इस पर जांच नहीं हो पायी है। अब राज्य को अपनी योजना मद के खर्च पर नजर और

नियंत्रण रखने की जरूरत है। ऐसा कर हम ज्यादा जरूरी काम के लिए पैसे उपलब्ध करा

सकते हैं। दूसरी तरफ केंद्र सरकार सहित अन्य प्रतिष्ठानों के पास झारखंड का कितना

बकाया है, यह भी जानने का अधिकार झारखंड की जनता को है। ताकि उसे पता चल सके

कि उसे जो कुछ बताया जाता रहा है, वह सच्चाई से कितना करीब अथवा दूर है। दिल्ली

की सरकार अगर एक पुल के निर्माण में एक सौ करोड़ रुपया बचा सकती है तो हमें इस

सच को समझ लेना चाहिए कि चालीस प्रतिशत कम दर पर काम लेने वाले ठेकेदार क्या

कुछ गुल खिला रहे हैं। लिहाजा अब निर्माण कार्यों की लागत का भी नये सिरे से आकलन

किया जाना चाहिए। यहि इसमें भी हम पैसे बचा पाये तो हो सकता है कि झारखंड को

अपनी नई योजनाओं के लिए धन के लिए केंद्र अथवा किसी अन्य एजेंसी के पास हाथ

पसारना ही नहीं पड़े।

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