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पश्चिम बंगाल में भाजपा के पक्ष में नहीं है एकतरफा परिणाम

पश्चिम बंगाल में हर चरण के साथ चुनावी माहौल और भी ज्यादा गर्म होता जा रहा है।

कौन जीतेगा, किसकी सरकार बनेगी, इसका आकलन न तो अभी चुनावी गुणा-गणित के

एक्सपर्ट कर पा रहे हैं और न ही चुनावी अटकलबाज। लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और

अमित शाह की बातों से यह समझा जा सकता है कि शेष सीटों पर अपने प्रत्याशियों की

जीत सुनिश्चित करने के लिए वे पूरी ताकत लगा रहे हैं। भाजपा की पूरी ताकत जिस

तरीके से अब काम कर रही है, उससे साफ है कि पिछले चरणों में भाजपा को अपेक्षित

सफलता नहीं मिल पायी है। इसलिए वे अब शेष सीटों पर अपनी यह कमी पूरी कर लेना

चाहते हैं। लेकिन इतना कुछ होने के बीच कांग्रेस की तरफ से अपने प्रत्याशियों को

सुरक्षित हटा लेने के फैसले से ऐसा माना जा सकता है कि कांग्रेस को यह अंदेशा है कि

विधानसभा कहीं त्रिशंकु की हालत में ना बने। वैसी स्थिति में निश्चित तौर पर अमित

शाह का ध्यान कांग्रेस के विधायकों को तोड़ने में लगेगा। कई राज्यों के चुनाव परिणाम

घोषित होने के बाद अमित शाह ने जिस तरीके से वहां तोड़ फोड़ कर अपनी सरकार बनायी

है, उसी अनुभव के आधार पर कांग्रेस को अपना घर बचाने के लिए ऐसा करना पड़ रहा है।

पश्चिम बंगाल में अधिकांश टीएमसी की मजबूत पकड़ वाले इलाके हैं

दरअसल बाकी के चार चरणों की सीटों में से अधिकांश टीएमसी की मजबूत पकड़ वाले

इलाके हैं। जहां सीट छीन लेने के लिए नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने पूरी ताकत झोंक दी

है। इस उठापटक के बीच अगर संतुलन में जरा सा भी हेरफेर हुआ तो निश्चित तौर पर

त्रिशंकु विधानसभा के आसार कांग्रेस को दिखने लगे हैं। दूसरी तरफ तमाम किस्म के

विरोधों और चुनाव आयोग के प्रतिबंधों के बाद भी तृणमूल कांग्रेस अपनी जीत के प्रति

पूरी तरह आश्वस्त है। यूं तो अमित शाह ने भी जनसभाओं में अपनी पार्टी की स्पष्ट जीत

होने के दावे किये हैं लेकिन जिस तेवर से वे बातें कर रहे हैं, उससे साफ झलकता है कि

उनका आत्मविश्वास भी डिगा हुआ है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी खुद चुनावी भाषण में

लोगों से अपील कर चुकी हैं कि वे ज्यादा से ज्यादा मतदान करें क्योंकि तृणमूल की सीटें

200 से कम रहीं (पिछली बार तृणमूल को 211 सीटें मिली थीं) तो भाजपा जोड़-तोड़कर

सरकार बना लेगी। उनका इशारा मध्य प्रदेश में सत्ता परिवर्तन और महाराष्ट्र में चुनाव

बाद के राजनीतिक ड्रामे की ओर है।

मगर तृणमूल खुद भी जोड़तोड़ से परहेज नहीं करेगी।

TMC छोड़ भाजपा में जाने वालों को ममता भले खुले मंच से कोस रही हों, लेकिन पार्टी के

मैनेजरों की कतार अब कहने लगी है कि दोस्ती-दुश्मनी चुनाव नतीजों के बाद ही तय

होगी। पश्चिम बंगाल में अभी चुनाव के चार चरण बाकी हैं। हालांकि इन चरणों में तस्वीर

पिछले चरणों की तुलना में कुछ अलग हो सकती है। एक तरफ TMC चौथे चरण के

मतदान के दिन फायरिंग में चार लोगों की बूथ पर मौत का फायदा उठाने में जुटी है। वहीं

दूसरी तरफ इस घटना के बहाने मुस्लिम वोटों में आ रहे बिखराव को वह फिर एकजुट

करने की कोशिश में भी है। लेकिन उसकी इस कोशिश का एक दूसरा पहलू ये भी है कि

इससे होने वाले ध्रुवीकरण का फायदा भाजपा को मिल जाए। पहले दो चरणों में मतदान

80% से ऊपर रहा तो तीसरे और चौथे चरण में भी मतदान 75% के ऊपर गया। मगर अब

शेष 4 चरणों में मतदान प्रतिशत कम रहने की आशंका है।राज्य में कोरोना संक्रमण के

मामले लगातार बढ़ रहे हैं और इसका असर लोगों की दिनचर्या पर दिखने लगा है।

हालांकि लोगों का मतदान के लिए न निकलना फॉल्स वोटिंग बढ़ा सकता है। इसमें

जिसका बाहुबल चल गया, वह आगे निकल सकता है। यहां चुनाव कराने आए

एक पर्यवेक्षक की टिप्पणी भी माहौल के आकलन के लिए काफी महत्वपूर्ण है।

उन्होंने मजाकिया लहजे में कहा कि यहां तो बंगाल पुलिस टीएमसी के लिए काम कर रही

है और केंद्रीय अर्ध सैनिक बल लगता है कि भाजपा के लिए काम कर रहा है। माहौल की ये

अनिश्चितता आम लोगों से बातचीत में भी झलकती है।

आपको हर इलाके में भाजपा और तृणमूल दोनों के समर्थक मिल जाएंगे।

हालांकि पहली बातचीत में कोई भी तृणमूल के खिलाफ कुछ नहीं बोलता, लेकिन बातें

लंबी खिंचे तो मन की बात बाहर आ जाती है। कुल मिलाकर भाजपा ने अन्य राज्यों की

तरह यहां भी टीएमसी को अपने प्रचार अभियान के बल पर कुचल देने की जो तैयारी की

थी, वह पूरी तरह कामयाब नहीं हो पाया है। ऐसे में अगर सीटों की संख्या कम रही तो कौन

किसे तोड़ेगा, यह देखना भी रोचक बात होगी।

 

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