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तीसरा विकल्प बनती जा रही है केजरीवाल का पार्टी




तीसरा विकल्प क्या है, इस पर लगातार दोनों स्थापित घड़ों के नेता सवाल ही नहीं करते

बल्कि अपनी बात रखने में यह दंभ भी भरते हैं कि भारतीय मतदाता के पास इसका कोई

रास्ता नहीं है। तीसरा विकल्प तैयार करने का प्रयास कोई नई बात नहीं है। इसके पहले

भी कई बार तीसरा मोर्चा बनाने की कोशिश हुई है। हर बार पारंपरिक राजनीति से ऊपर

आने वाले नेताओं को व्यक्तिगत अहंकार इसमें बाधक बना है। अपने और अपनी पार्टी के

लिए अधिकाधिक लाभ लेने की सोच ने इस तीसरे विकल्प की संभावनाओं के प्रति आम

मतदाता को भी डरा दिया है। जनता यह मान चुकी है कि अन्य राजनीतिक दलों ने

मिलकर अगर कोई तीसरा विकल्प बना भी लिया तो वह कितने दिनों तक जीवित रह

पायेगी, यह कह पाना कठिन है। शायद इसी राजनीतिक शून्यता की स्थिति ने भी भाजपा

और कांग्रेस के नेताओँ को अहंकारी बना रखा है। दिल्ली में जब पहली बार किसी नई पार्टी

का उदय हुआ तो उसे पारंपरिक राजनीतिक दलों ने बहुत हल्के में लिया था। उस कालखंड

को याद करें तो रामदेव के आंदोलन के वक्त आज के कपिल सिब्बल सरीखे नेता किस

तरीके से इस समस्या का समाधान कर रहे थे, वह हरेक को याद होगा। आज राहुल गांधी

के खिलाफ आवाज उठा रहे बागी कांग्रेसियों में से कई लोगों के भाषा अन्ना हजारे के

आंदोलन के दौरान क्या थी, वह भी लोगों को याद है। इसलिए जब आम आदमी पार्टी

पहली कोशिश में ही कामयाब हुई तो स्थापित राजनीति के लोगों के लिए इस जनादेश को

पचा पाना कठिन था। अब तीसरी बार भी पूर्ण बहुमत से चुनाव जीतने के बाद अरविंद

केजरीवाल ने अपनी उस बात को सच साबित कर दिया है कि वे राजनीति करने नहीं

राजनीति को बदलने आये हैं।

तीसरा विकल्प के पहले पहल कहा था राजनीति बदलने आये है

राजनीति का यह बदलाव अब देश में पैर पसार रहा है। हाल ही में गुजरात के औद्योगिक

शहर सूरत के स्थानीय निकाय के चुनाव परिणाम यह दर्शा रहे हैं कि गुजरात जैसे मजबूत

जनाधार के इलाके में भी आम आदमी पार्टी ने भाजपा के गढ़ में दरार पैदा करने में

सफलता पायी है। अरविंद केजरीवाल खुद यह साफ साफ कह चुके हैं कि उनकी पार्टी

अगले वर्ष वहां होने वाले विधानसभा चुनावों की तैयारियों में जुटी है। इसे राजनीतिक दांव

पेंच में यह माना जा सकता है कि अरविंद केजरीवाल ने नरेंद्र मोदी और अमित शाह की

जोड़ी को उनके घर में घुसकर चुनौती देने का काम किया है।

अब थोड़ी जनता की भी समझ लें। तो यह सोच फिर से दिल्ली की जनता के फैसले से

स्पष्ट होता है। दिल्ली नगर निगम के उप चुनावों में से चार सीट जीतकर आम आदमी

पार्टी ने यह भी साबित कर दिया है कि काम के बदौलत भी वोट हासिल किये जा सकते हैं।

लगातार आरोपों और केंद्र सरकार के असहयोग और अड़ंगे के बीच से एक नई पार्टी जो

कीर्तिमान गढ़ रही है वह भी तीसरा विकल्प तैयार होने का आधार जैसा ही है। किसान

आंदोलन से उपजी राजनीतिक परिस्थितियों के बीच नरेंद्र मोदी के कई बयान यह संकेत

दे जाते हैं कि प्रवल जनविरोध का सामना करने का कोई पूर्व अनुभव उनके पास नहीं है।

गुजरात की तरह दिल्ली में भी अपने फैसले के नीचे हरेक को रौंद देने की सोच से इस बार

गाड़ी न सिर्फ फंसी है बल्कि लगातार दलदल में धंसती जा रही है। उत्तर प्रदेश में भी

पंचायत चुनाव और बाद में विधानसभा चुनाव आने वाले हैं।

किसान आंदोलन को कमजोर समझने का खामियजा भी भुगतना पड़ेगा

किसानों के आंदोलन को बार बार अपनी बातों में हल्का और कमजोर बताने वाले नेता भी

अब समझ रहे हैं कि जाट नेता और केंद्रीय मंत्री संजीव बालियान को भी अपने इलाके में

जाने में अब परेशानी हो रही है। इसके बीच ही दिल्ली में नगर निगम के चुनाव परिणाम

सामने आये हैं। कुछ चैनलों की मदद से इस साजिश को फिर से अंजाम देने की कोशिश

की गयी थी ताकि किसान आंदोलन कमजोर पड़े। लेकिन जनता दोनों तरफ के आचरणों

को परख रही है। दिल्ली नगर निगम के उप चुनाव के परिणाम जनता की सोच को ही

दर्शाने वाले हैं। सिर्फ भाजपा के नेतृत्व भले ही इस बात को स्वीकार नहीं कर पा रहा हो

लेकिन इससे हर दिन पार्टी का वोट बैंक कमजोर हो रहा है, इससे भाजपा के ग्रासरुट स्तर

के लोग भी सहमत हैं। तीसरा विकल्प क्या है, का दंभ भरने वालों के लिए यह जनता का

फैसला सुनाने जैसा ही है इसके जरिए देश की जनता बार बार सत्तारूढ़ दल को यह बताने

की कोशिश कर रही है कि उसका दंभ और आचरण तमाम किस्म की अच्छाइयों के बाद

भी जनता को पसंद नहीं आ रहा है। तीसरा विकल्प इसी किस्म की गलतियों से उपजेगा,

यह फिर से स्पष्ट हो रहा है



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