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इस अप्रिय स्थिति से बच सकती थी मोदी सरकार

इस अप्रिय स्थिति को अब नकारने का कोई तर्क नहीं बचा है। भारतबंद के बाद बिना

किसी कार्यक्रम के अमित शाह का किसान नेताओं के साथ वार्ता करना और उसके बाद

अगले दिन भी सरकार के साथ किसानों की वार्ता का विफल होना यह साबित करता है कि

इस बार किसानों के अड़ जाने की वजह से मोदी सरकार संकट की स्थिति में है। सरकार ने

अपनी अड़ियल छवि अपने आचरण से बनायी है। इसके पहले राजनीतिक आंदोलनों को

कुचल देने में सरकार की इस छवि के मुख्य कारक गृहमंत्री अमित शाह रहे हैं। लेकिन इस

बार अमित शाह के दिखाये रास्ते पर चलते हुए भाजपा ने अपने तुरुप के एक्के यानी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता को ही दांव पर लगा दिया है। दरअसल इस पूरी

स्थिति को सरकार अगर चाहती तो टाल सकती थी। कृषि बिल को लागू करने के पूर्व कई

स्तरों पर यह मांग की थी कि इतना बड़ा फैसला लेने के पहले खुद केंद्र सरकार सभी

संबंधित पक्षों से सार्थक विचार विमर्श कर ले। किसकी सलाह पर सरकार ने इस

जिम्मेदारी से पाला झाड़ा, इसका तो पता नहीं लेकिन पहले बात नहीं करने के बाद अब

सरकार की यह मजबूरी है कि उसे उन्हीं मुद्दों पर बात करना पड़ रहा है, जो कभी नकारे

गये थे। किसान नेता कृष्णबीर चौधरी की मानें तो यही हो रहा है क्योंकि नरेंद्र मोदी

सरकार ने नए कृषि कानूनों में कई वही प्रावधान लागू करने की कोशिश की है जो कांग्रेस

की अगुवाई वाली यूपीए सरकार करने की कोशिश कर रही थी। मनमोहन सिंह सरकार-2

में भूपेंद्र सिंह हुड्डा के नेतृत्व में एपीएमसी मंडियों को खत्म करने की बात की गई थी।

इस अप्रिय स्थिति से बेहतर था कि पहले ही बात कर लेते

किसान नेता चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत भी खुले बाजार की मांग करते रहे थे। ऐसे में आज

जब सरकार उन्हीं प्रावधानों को लागू करने की कोशिश कर रही है तो इसका विरोध क्यों हो

रहा है? किसान नेता के मुताबिक कृषि सुधारों पर वामपक्ष की राजनीति भारी पड़ती दिख

रही है। हालांकि वे यह स्वीकार करते हैं कि अगर कानून बनाने से पहले सभी पक्षों से

ज्यादा बातचीत कर ली गई होती, और कानून में न्यूनतम समर्थन मूल्य को लिखित

कानून बना दिया गया होता तो आज के विवाद से बचा जा सकता था। हरियाणा के पूर्व

मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा के नेतृत्व में 500 किसानों और किसान संगठनों से बातचीत के

दौरान यह बात सामने आई थी कि मंडियों में किसानों का शोषण हो रहा है, उन्हें उनकी

फसलों के उचित मूल्य नहीं मिल रहे हैं। इसके लिए आठ मुख्यमंत्रियों की अगुवाई में एक

कमेटी का गठन भी किया गया था। हालांकि, यह कोशिश परवान नहीं चढ़ पाई, लेकिन

आज जब वर्तमान सरकार उसी कोशिश को पूरा कर रही है तो उसका विरोध किया जा रहा

है। अगर इस कानून को बनाने से पहले किसानों, विशेषज्ञों से और ज्यादा बात की गई

होती तो आज के टकराव से बचा जा सकता था। मनमोहन सिंह सरकार के दूसरे कार्यकाल

में पूरे पांच साल के दौरान केवल दो लाख करोड़ रुपये से कुछ अधिक के खाद्यान्न की

खरीदी की गई थी, जबकि नरेंद्र मोदी सरकार के पांच साल के कार्यकाल में पांच लाख

करोड़ रुपये से ज्यादा खाद्यान्न की खरीद न्यूनतम समर्थन मूल्य पर की गई है।

सरकार पर किसान विरोधी आरोप भी गलत ही है

ऐसे में इस सरकार पर किसान विरोधी होने का आरोप लगाना गलत है। किसान नेता

महेंद्र सिंह टिकैत ने भी अपने जमाने में आंदोलन करते हुए यही मांग की थी कि अगर

व्यापारी अपनी बनाई सूई को भी अपनी कीमतों पर बेचता है तो किसानों को भी अपनी

फसलों को अपने मनचाहे मूल्य पर बेचने की अनुमति क्यों नहीं मिलनी चाहिए। वे भी

फसलों को खुले बाजार में बेचने के पक्ष में थे। आज नरेंद्र मोदी सरकार के कानून में इसकी

व्यवस्था की जा रही है तो कुछ लोग बिना इसकी असलियत जाने विरोध कर रहे हैं।

किसानों में यह डर घर कर गया है कि अस्पष्ट प्रावधानों का फायदा उठाकर अंततः उनकी

जमीनों पर पूंजीपति घरानों का कब्जा हो जाएगा। ऊपर से केंद्र और भाजपा शासित

राज्यों के बीच भी इन कानूनों के लेकर संवादहीनता की स्थिति बार बार सामने आ रही है।

एक तरफ प्रधानमंत्री पूरे देश में जहां अधिक कीमत मिले, वहां किसानों को फसल बेचने

की छूट मिलने की बात करते नजर आ रहे हैं तो दूसरी तरफ मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री

शिवराज सिंह चौहान भी यह कहते देखे जा रहे हैं कि किसी दूसरे राज्य की अनाज को

उनके प्रदेश में लाने पर न सिर्फ उसे जब्त कर लिया जाएगा बल्कि इसके लिए जिम्मेदार

व्यक्ति को कानूनी तौर पर दंडित भी किया जा सकेगा। इसलिए इस अप्रिय स्थिति के

लिए केंद्र सरकार की संवादहीनता और भाजपा के रणनीतिकारों को ही जिम्मेदार ठहराया

जा सकता है।

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