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अभी दोगुना पुरुषार्थ समय की मांग है बाकी बातें फिलहाल गैर जरूरी

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अभी दोगुना पुरुषार्थ समय की मांग है,स्वतंत्रता दिवस पर सोशल डिस्टेंसिंग के तहत हम




जब यह समारोह मना रहे हैं तो हमें यह याद रखना होगा कि यह वर्ष पूरा ही अन्य वर्षों के

मुकाबले बिल्कुल अलग है। सामान्य समझ की बात है कि वैश्विक महामारी कोरोना की

वजह से दुनिया का बहुत कुछ बदल चुका है। लिहाजा ग्लोबल विलेज की परिभाषा के

तहत हम भी इससे हर तरीके से प्रभावित हुए हैं। अभी की सारी परिस्थितियां आम आदमी

और देश की जरूरतों के प्रतिकूल हैं। लिहाजा हमें नये सिरे से उठ खडा होने के लिए दोगुना

परिश्रम करने की आवश्यकता है। कोरोना और उसकी वजह से लगे लॉक डाउन ने देश

और देशवासियों का जो नुकसान किया है, उसकी भरपाई किये बिना हम प्रगति के पथ पर

आगे नहीं बढ़ सकते। लेकिन यह समझ लेना होगा कि एक जैसी स्थिति दुनिया के सभी

अन्य देशों की है। इसलिए भी दूसरों के मुकाबले जल्दी अपने देश की अर्थव्यवस्था को

पटरी पर लाने के लिए हमें अतिरिक्त परिश्रम करने की जरूरत है। हम जो कुछ गवां चुके

हैं, उसकी भरपाई का यही एकमात्र रास्ता है। हम अपने अधिक परिश्रम में उत्पादकता को

बढ़ाकर जो घाटा हो चुका है, उसकी जल्दी भरपाई कर सकते हैं। अभी मॉनसून का मौसम

है लेकिन देश में हर स्थान पर बारिश की अनुकूल परिस्थितियां नहीं हैं। बिहार जैसे कई

राज्य बाढ़ की चपेट में हैं तो कुछेक इलाकों में अल्पवर्षा की भी शिकायत है। भारतीय

अर्थव्यवस्था को तेजी देने का असली साधन हमारी कृषि आधारित अर्थव्यवस्था ही है।

अभी दोगुणा पुरुषार्थ कृषि उत्पादन में लगना चाहिए

इसलिए कृषि उत्पादन को बढ़ाने के माध्यम से भी हम अपने पुरुषार्थ को साबित कर

सकते हैं। देश के आगे बढ़ने के लिए इस पुरुषार्थ की जब जब चर्चा होगी तो हमें याद

रखना होगा कि हमें अब चीन से सीधा मुकाबला करना है। कूटनीतिक और व्यापारिक

प्रतिस्पर्धा के बीच हमें चीन के विरोध के साथ साथ उसकी उत्पादक क्षमता को समझने

की जरूरत है। बिना उसका बराबरी किये हम अपने बलबूते पर औद्योगिक उत्पादकता में

अधिक तेजी से ऊपर नहीं जा सकते। अभी जो परिस्थितियां देश के अंदर हैं, उसमें कोरोना

संक्रमण के तेजी से होते विस्तार के साथ साथ रोजगार के मोर्चे पर जबर्दस्त चुनौती की

स्थिति है। उत्पादकता जैसे जैसे बढ़ेगी, इस चुनौती का हमारी अर्थव्यवस्था पर दबाव वैसे

वैसे कम होगा। जो कुछ नुकसान हो चुका है, उसकी भरपाई का एक ही रास्ता है अभी




हमारे पास और वह है कि वह इस घाटे को दोगुना पुरुषार्थ यानी परिश्रम से पूरा करें। देश

की जरूरतों और कोरोना काल की नई किस्म की चुनौतियों को बारे में भी नये सिरे से कुछ

जानने समझने का अवसर नहीं है। इस एक अदृश्य वायरस ने क्या कुछ नुकसान किया है,

उससे अब औसत भारतीय अच्छी तरह वाकिफ है। चीन पर आधारित हमारी औद्योगिक

व्यवस्था के बीच चीन के विवाद के बाद कच्चा माल जुटाना अपने आप में बड़ी चुनौती है।

औद्योगिक इकाइयों से त्वरित लाभ की उम्मीद बेमानी

इसलिए भी हमें अभी दोगुना पुरुषार्थ करने की आवश्यकता है। लेकिन यह तय है कि चीन

को मात देने के लिए हमें अपने औद्योगिक उत्पादनों की गुणवत्ता और उसकी लागत

कम करने की दिशा में काम करना पड़ेगा। वर्तमान में इसके लिए चीन के मॉडल का कोई

और बेहतर विकल्प नहीं है। हम भी अपने देश में विकेंद्रीत अवस्था में लघु और कुटीर

उद्योगों का प्रसार कर औद्योगिक उत्पादन के क्षेत्र में भी रोजगार के नये अवसर पैदा कर

सकते हैं। जो कुछ कर पाना हमारे हाथ में हैं, हम उस पर ध्यान केंद्रित करें और

उत्पादकता को निरंतर बढायें, यह समय की मांग है। अत्याधुनिक तकनीक को हासिल

करने में जो वक्त लगता है, उस समय को इंतजार में नष्ट करने से बेहतर है कि उस समय

में भी कुछ न कुछ उत्पादन किया जाए। भारतीय अर्थव्यवस्था के पहिये कोरोना और

लॉक डाउन की वजह से पूरी तरह रुक गये थे। उन चक्कों का चलना तो प्रारंभ हुआ है

लेकिन उसमें और अधिक गति प्रदान करना भी समय की मांग है। इसी गति प्रदान करने

का काम अभी दोगुना पुरुषार्थ ही कर सकता है। जितनी तेजी से हम अपनी उत्पादकता को

बढ़ायेंगे, उतनी तेज से धन का प्रवाह तेज होगा। इसलिए इस बारे के स्वतंत्रता दिवस

समारोह के केंद्र में देश और देश का विकास रहे, यह सोच ही हमें बदली हुई तथा बिल्कुल

अप्रत्याशित परिस्थितियों के बीच उस लक्ष्य को प्राप्त करने का अवसर प्रदान कर सकता

है। लेकिन यह भी समझ लेना चाहिए कि हर देश की कमोबेशी एक जैसी स्थिति है और

कोई भी आसानी से हमें विकास के मार्ग पर आगे निकलने का मार्ग नहीं देगा। हमें अपने

प्रयास से ही इस चुनौती का भी मुकाबला कर सकते हैं और इसका फिलहाल कोई और

विकल्प भी नहीं है।



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