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कांग्रेस के अंदर नीचे से ऊपर तक चल रहा है वर्ग संघर्ष

कांग्रेस के अंदर चल रहा वर्ग संघर्ष दोबारा नजर आया है। इस बार कांग्रेस का राजस्थानी

किला ढहते ढहते बच गया है लेकिन यह जगजाहिर है कि किले की दीवार पर बड़ी दरारें

नजर आने लगी हैं। इसलिए आने वाले दिनों  भी अशोक गहलोत इस किला को बचा

पायेंगे, इसकी कोई गारंटी भी नहीं है। कांग्रेस के अंदर दरअसल क्या चल रहा है, इसकी

बड़ी लंबी फेहरिस्त है। उत्तर प्रदेश से लेकर मध्यप्रदेश और कई अन्य राज्यों में भी पार्टी

संगठन के अंदर से बहुत कमजोर होने की असली वजह भी कांग्रेस के अंदर का यही वर्ग

संघर्ष है। कई बार यह वर्ग संघर्ष जातिवादी संघर्ष के तौर पर भी उभर आता है। राजस्थान

की स्थिति और भविष्य पर चर्चा के पहले मध्यप्रदेश की परिस्थितियों को समझ लेना

होगा। मध्यप्रदेश में काफी पहले से इस बात के संकेत मिल रहे थे कि मुख्यमंत्री

कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया के बीच तालमेल बिगड़ चुका है। कांग्रेस के अंदर

के नेतृत्व संकट की वजह से इस मनमुटाव को जानने के बाद भी उसे दूर करने का कोई

प्रयास तक नहीं किया गया। उसका नतीजा बाद में लोगों ने देखा जबकि ज्योतिरादित्य

सिंधिया के समर्थकों के अलग हटते ही सरकार को समर्थन देने वाले निर्दलीय भी खूंटा

तोड़कर भाग निकले। नतीजतन कमलनाथ की सरकार को इस्तीफा देना पड़ा और अभी

वहां शिवराज सिंह चौहान फिर से मुख्यमंत्री बने हैं। कांग्रेस के अंदर ऐसी परिस्थितियों में

एक खोखली दलील बार बार दी जाती है कि भाजपा ने खरीद फरोख्त को बढ़ावा देकर

उनके विधायकों को तोड़ लिया। इस बात पर कांग्रेस की तरफ से सफाई कभी नहीं आती

कि उसने ऐसे लोगों को टिकट ही क्यों दिया, जो प्रलोभन की वजह से टूट गये।

कांग्रेस के अंदर अगर बिकाऊ माल था तो उसे बिकना ही था

अब कांग्रेस के अंदर अगर बिकाऊ माल था तो कोई भी खरीद सकता था। वर्तमान

परिस्थिति में खरीद के मामले में भाजपा के पास सबसे अधिक धन है तो खरीद लिया। जो

लोग बिक गये, उनकी पृष्टभूमि और उनके विधायक बनने का निशान अगर कांग्रेस का

था, तो कांग्रेस को इन तमाम घटनाक्रमों की नैतिक जिम्मेदारी भी लेनी चाहिए कि उसके

स्तर पर प्रत्याशियों के चयन में पार्टी के प्रति उनकी निष्ठा के सवाल को लगातार

नजरअंदाज किया गया। कांग्रेस के अंदर लगातार इस बात की जानकारी लोगों को मिलती

रही है कि वहां पार्टी का सारा काम काज गणेश परिक्रमा की तर्ज पर चलता है। दरअसल

पार्टी नेतृत्व के आस पास जो घेराबंदी है, उसमें ऐसे नेता भरे हुए हैं जो अपने बलबूते पर

तो शायद पंचायत या नगर पालिका का चुनाव तक नहीं जीत सकते। राज्यसभा में भी जो

कुछ चेहरे हैं, उनमें से भी अधिकांश बहुमत के कोटा और सेटिंग गेटिंग के कारण संसद के

इस सदन तक पहुंचने में कामयाब रहे हैं। दरअसल ऐसे नेता आम जनता से पूरी तरह कटे

हुए हैं। लिहाजा उन्हें आम जनता से नियमित जनसंपर्क में होने का अनुभव भी नहीं है।

उनका सारा समय नेतृत्व के ईर्दगिर्द अपने फायदे का जाल बुनने में चला जात है। दूसरी

ओर जो कुछ नेता पार्टी में हैं और जनाधार रखते हुए पार्टी का काम कर रहे हैं, उनके पास

ऐसी साजिशों में शामिल होने का ज्यादा वक्त भी नहीं होता। ऐसे में बिना जनाधार वाले

नेता ही जब कांग्रेस के अंदर सबसे ताकतवर नीति निर्धारन बन जाएं तो इस किस्म का

परिणाम आना तो जगजाहिर है। राजस्थानी किला के टूटने में दूसरा आयाम यह भी नजर

आता है कि पुराने और नई पीढ़ी के नेताओं के बीच भी सत्ता समीकरणों का ताल मेल

ठीक नहीं है।

पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व समस्या को प्रारंभ में नहीं सुलझाता

केंद्रीय नेतृत्व भी उसे सुधारने में अपना समय जाया करना नहीं चाहता। ऐसी स्थिति में

बीमारी लगातार पड़ती ही चली जाती है। बाद में उस परेशानी को दूर करने के लिए

ऑपरेशन करना पड़ता है, जैसा कि अब जाकर राजस्थान में किया गया है। कांग्रेस के

अंदर जो स्थिति है, वह कमोबेशी भाजपा के अंदर भी हैं। लेकिन यह तय मानिये कि जब

तक भाजपा का नेतृत्व नरेंद्र मोदी के पास है, इस पर कोई संकट नहीं आयेगा क्योंकि

निजी लोकप्रियता के मामले में श्री मोदी दूसरों से काफी आगे हैं। यह कहना कठिन है कि

नरेंद्र मोदी के मैदान में नहीं होने की स्थिति में दरअसल कांग्रस के अंदर वाली स्थिति

भाजपा पर होगी अथवा नहीं। घाव को बढ़ते हुए नासूर बनते देखना कांग्रेस के अंदर का

पुराना रिवाज है। ऐसे में बाहर खड़े शल्यचिकित्सक यानी भाजपा अगर मौके पर चौका

जड़ भी देती है तो कांग्रेस को इससे परेशानी नहीं होनी चाहिए क्योंकि यह परिस्थिति

कांग्रेस के अंदर की उपज ही तो है।


 

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