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जो बिडेन के जीवन युद्ध से भी हम बहुत कुछ सीख सकते हैं

  •  पुल पर खड़े थे आत्महत्या करने की सोच कर
  •  जीवन में कई बार भीषण मानसिक चोट खायी
  •  पूरी जिंदगी ही अचानक तहस नहस हो गयी थी

राष्ट्रीय खबर

रांचीः जो बिडेन को पूरी दुनिया अब सलाम ठोंक रही हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि चुनाव

परिणामों की अंतिम घोषणा होने के पहले ही यह मान लिया गया है कि वह चुनाव जीत

रहे हैं। दूसरे शब्दों में वह पूरी दुनिया के लिए उगते सूरज की तरह है। लेकिन यह जान

लेना जरूरी है कि अमेरिका के राष्ट्रपति की इस कुर्सी तक पहुंचने के पूर्व उनके जीवन में

भीषण उतार-चढ़ाव के दौर आये हैं। इसलिए आम आदमी को अमेरिका के राष्ट्रपति से

नहीं बल्कि जो बिडेन की अपनी जिंदगी से बहुत कुछ सबक सीख लेना चाहिए। जे विल्सर

ने अपनी पुस्तक दी बुक ऑफ जो में इन घटनाओं का उल्लेख किया है। आप भी जान

लीजिए कि वह किन परिस्थितियों के बीच से संघर्ष करते हुए सफलता के इस मुकाम तक

पहुंचे हैं। कहानी की तर्ज पर इसे अगर बयां करें तो घटनाक्रम इस प्रकार का बनता है।

डेलावार शहर में जाड़े की रात। हाल के दिनों में क्रिस्टमस त्योहार खत्म हुआ है। इसलिए

शहर में तुलनात्मक तौर पर सन्नाटा पसरा हुआ है। इसी सुनसान परिस्थितियों के बीच

डेलावर मेमोरियल ब्रिज के ऊपर खड़ा है एक शख्स जो बिडेन। पुल के करीब डेढ़ सौ मीटर

नीचे से डेलावार नदी बह रही है। नदी की तरफ एकटक देखते इस शख्स के चेहरे से ठंड की

वजह से ताप भी भाप बनकर निकल रहा है। वह सोच रहा है कि उसे नदी में कूद जाना

चाहिए या नहीं। जिस वक्त की यह घटना है वह 1973 साल के जनवरी का है। काफी देर

तक मानसिक उधेड़बून के बीच उनके अंदर से आवाज आयी कि मैदान मत छोड़े अभी

लड़ना बाकी है। वह व्यक्ति वहां से अपने घर की तरफ लौट जाता है।

जो बिडेन के जीवन में ऐसे मोड़ मानसिक तौर पर तोड़ने वाले थे

इसके पहले की घटनाओं को भी जान लीजिए। वह महज डेढ़ माह पहले ही सिनेटर चुने

गये हैं। घर में सिनेटर चुनाव जीतने और क्रिस्टमस की वजह से त्योहार का माहौल है।

इसी खुशी के बीच उत्सव की खरीददारी के लिए उनकी पत्नी अपने दो पुत्रों और बेटी को

लेकर बाजार गयी थी। जो बिडेन अपने कार्यालय में ही थे कि हादसे की सूचना आयी। एक

ट्रक ने उनकी पत्नी की गाड़ी को रौंद दिया है। उनकी पत्नी और छोटी बच्ची का

घटनास्थल पर ही निधन हो गया है। दोनों बेटे अस्पताल में हैं और गंभीर रुप से घायल हैं।

पत्नी से उनका जुड़ाव कॉलेज के जमाने का था। 1961 साल में वह राजनीति विज्ञान पढ़ते

वक्त ही नेलिया हंटर के करीब आ गये थे। 1966 में दोनों ने शादी कर ली थी। शादी के बाद

से ही वह अपनी पत्नी को लगातार अपने सपने की बात कहा करते थे कि वह एकदिन देश

के सफल नेता बनेंगे। अचानक जीवन में छाये अंधेरे के बीच ही उन्हें बार बार अपनी पत्नी

से हुई चर्चा की बात याद आती रही। अपने कार्यालय की जिम्मेदारियों को संभालते हुए वह

घर लौटकर अपने बच्चों की परवरिश की चुनौती से दो दो हाथ करने लगे। आफिस का

काम खत्म कर घर लौटते वक्त वह ट्रेन में भी नहीं सोते थे। उन्हें पता था कि घर पर बच्चे

इंतजार कर रहे हैं। घर लौटने के बाद बच्चों को भोजन कराना और उन्हे कहानी अथवा

लोरी सुनाकर सुलाना भी उनकी बहुत बड़ी जिम्मेदारी थी। घऱ का सारा काम खुद ही

करना पड़ता था क्योंकि उनकी आर्थिक हैसियत नौकर रखने की नहीं थी।


घर का सारा काम खुद ही करते थे क्योंकि गरीब थे


लेकिन इसके बीच कभी भी वह लोगों के मिलने जुलने के बाद भी शराब के नजदीक नहीं

गये। कभी दिल नहीं माना और घर के अंदर शराब पीने की सोची तो बड़ा बेटा बिउ विरोध

करता था। वह खुद भी मन ही मन सोचते थे कि अगर उन्हें बच्चे शराब पीते देखेंगे तो हो

सकता है कि वे भी गलत रास्ते पर चले जाएं।

खैर जीवन की इस कठिन चुनौती को पार लगाते हुए उन्होंने अपने बच्चों को पढ़ा

लिखाकर इंसान बनाया। बड़ा बेटा बिउ सेना में चला गया लेकिन वहां से लौटने के बाद

पिता के र्साते पर चल पड़ा इसके बाद वह भी अमेरिका का एटर्नी जनरल बना। लेकिन

हादसों का यह अंत नहीं था। जो बिडेन अमेरिका के उपराष्ट्रपति थे उसी समय पता चला

कि बिउ भी अस्वस्थ है। जांच रिपोर्ट आयी तो पता चला कि उसके दिमाग में कैंसर है। वर्ष

2015 में वह भी बिछड़ गया और जो बिडेन एक बार फिर हताशा में डूब गये। लेकिन अपने

पुत्र को अंतिम समय में किया गया वादा उन्हें हर पल याद रहा। उन्होंने अपने मरते पुत्र

को वचन दिया था कि चाहे कुछ भी हो जाए वह मैदान छोड़कर नहीं हटेंगे वरना उससे

पहले तो वह खुद यह एलान कर चुके थे कि अब राजनीति में भाग लेने का उनका कोई

इरादा नहीं है। लेकिन अपने पुत्र को दिया वचन उन्हें आगे बढ़ने को प्रेरित करता रहा

वैस बचपन से ही संघर्ष उनके जीवन का हिस्सा रहा है। उनके पिता पेनिनसिल्वानिया में

एक सामान्य सेल्समैन था। इसलिए घर में आर्थिक तंगी हमेशा बनी रहती थी।

पिता की सीख से हकलाने वाला बना अमेरिका का श्रेष्ठ वक्ता

उस वक्त जो बिडेन को बोलने में भी परेशानी थी। इसकी वजह से कई बार वह स्कूल में भी

प्रताड़ना के शिकार होते थे। लेकिन तब उनके पिता ने उन्हें मजबूती से आगे बढ़ने की

सबक दी थी। नतीजा आज सामने है। जो बच्चा बचपन में बोलते वक्त हकलाता था आज

उनके भाषण से पूरा अमेरिका मंत्रमुग्ध है। इसलिए जो बिडेन के राष्ट्रपति बनने से नहीं

बल्कि उनके जीवन के संघर्ष से हर इंसान को संघर्ष करने की सीख अवश्य मिलती है।

आर्थिक तौर पर वह न तो पहले मजबूत थे और न ही आज मजबूत है। लेकिन इस्पात से

अधिक मजबूत उनके इरादों ने खुद बिडेन को ही नहीं बल्कि आर्थिक कारणों से ही मैदान

छोड़ चुकी भारतवंशी कमला हैरिस को भी दोबारा लड़ने की प्रेरणा दी है। नतीजा हम सभी

के सामने है। जो बिडेन के अलावा कमला हैरिस अमेरिकी में प्रथम अश्वेत और महिला

उपराष्ट्रपति हैं। वैसे कमला हैरिस यानी वहां के प्रशंसकों के लिए चाची प्रथम भारतवंशी

और प्रथम अफ्रीका वंशी भी है। ऐसा इसलिए है क्योंकि कमला हैरिस की माता दक्षिण

भारतीय थी और उनके पिता अफ्रीकी मूल के थे। इस लिहाज से जो बिडेन ने कई

महाद्वीपों को अमेरिका के साथ सीधे जोड़ने में भी अपनी महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन

किया है।

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