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जांच प्रक्रिया को तेज करे सरकार

जांच प्रक्रिया पर ही अब पूरे देश को अधिक ध्यान देना चाहिए। क्योंकि अब भी हम कई

छोटे देशों के मुकाबले जांच के मामले में काफी पीछे चल रहे हैं। जब तक यह जांच प्रक्रिया

तेज नहीं होगी तो कोरोना के संक्रमण के नये नये इलाकों का पता चलने तक यह और

अन्य इलाकों तक फैलता चला जाएगा। घटनाक्रम यही बताते हैं कि प्रवासी मजदूरों के

अपने अपने घर लौटने के बाद ही यह तेजी से फैला है। लेकिन इसकी असलियत क्या है,

यह अपने आप में एक रहस्य है। इस बात को रहस्य इसलिए कह रहा हूं क्योंकि अगर ये

सारे मजदूर किसी दूसरे इलाके या महानगरों में थे, वहां इनकी जांच हुई थी अथवा नहीं,

इस बारे में कोई कुछ नहीं कहता। श्रमिक ट्रेन से इन्हें लाये जाने के दौरान रेलवे ने भी सभी

की जांच करने का दावा किया था, उस बारे में भी अब कोई चर्चा नहीं होती। अगर इन दोनों

ही बिंदुओं पर जांच नहीं हुई थी, तो उसकी जिम्मेदारी किसे सौंपी जाए। साथ ही वाकई

मजदूरों ने अगर घर लौटने के बाद एकांतवास के नियमों का कड़ाई से पालन नहीं किया

तो उसकी भी जिम्मेदारी तय नहीं हो पायी है। कुल मिलाकर जनता को उसके अपने भरोसे

छोड़ दिया गया है। यह तो तय है कि जो अपना ख्याल जो खुद नहीं रख पा रहे हैं, उनके

जरिए ही कोरोना का संक्रमण फैल रहा है। किस व्यक्ति को कहां से और कैसे संक्रमण हो

रहा है, उसका पता भी नहीं चल पा रहा है। इसलिए इस बात को लेकर अब बहस की कोई

गुंजाइश नहीं है।

जांच प्रक्रिया को तेज नहीं करना केंद्र सरकार की एकमात्र गलती

सरकार की तरफ से सिर्फ एक गलती हुई है और जो अब भी हो रही है, वह है कोरोन

संक्रमण की जांच की गति को तेज करना। दरअसल पहले से स्वास्थ्य विभाग के फैसलों

पर हावी घूसखोरी की वजह से झारखंड में वैसे ऑटोमैटिक मशीनों को लगाने का फैसला

नहीं लिया जा सका था, जो यह काम काफी तेजी से कर सकते थे। वक्त की मांग को देखते

हुए लगभग सभी पड़ोसी राज्यों में ऐसी अत्याधुनिक मशीनें लगायी जा चुकी है। लेकिन

झारखंड अब भी ट्रूनेट के भरोसे आगे बढ़ रहा है। दरअसल नीति निर्धारकों को दवा और

उपकरण बनाने वालों की लॉबी ने अपने चहेते अधिकारियों के माध्यम से जो कुछ

समझाया होगा, उसी की वजह से ऐसे फैसले लिये गये हैं। जांच की प्रक्रिया के लिए

सरकार को चाहिए कि वह रोशे कंपनी की कोवास मशीन का इस्तेमाल करे। इस मशीन के

बारे में इंटरनेट पर जो सूचनाएं उपलब्ध हैं, उसके मुताबिक यह मशीन 24 घंटे में 1440

टेस्ट कर सकती है। पूरी तरह ऑटोमैटिक इस मशीन में सब कुछ मशीन ही कर लेती है।

इस वजह से मानव श्रम पर जो समय नष्ट होता है, वह बचता है और काम में तेजी आती

है। अभी झारखंड में कोरोना की जांच प्रक्रिया को तेज करने की बहुत जरूरत है। सभी

प्रमंडलों में अगर यह मशीन लगायी गयी होती तो शायद आज जांच रिपोर्ट के लिए हजारों

लोगों को इंतजार नहीं करना पड़ता। जांच रिपोर्ट में विलंब की वजह से भी कोरोना

संक्रमण फैला है, इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता है। आबादी के लिहाज से

तुलना करें तो सभी जानते हैं कि दुनिया में भारत से अधिक आबादी वाला देश सिर्फ चीन

है।

हम घनी आबादी वाले देश हैं इसलिए चुनौती अधिक

लेकिन यह कोई चर्चा नहीं करता कि चीन ने अपने यहां कोरोना फैलने के बाद से प्रति दस

लाख लोगों में 62814 लोगों की कोरोना जांच की है। दूसरी तरफ भारत अब भी मात्र 11798

जांच प्रति दस लाख के औसत को प्राप्त कर पाया है। प्रति दस लाख लोगों में जांच के

औसत में भारत पूरी दुनिया में 136वें नंबर पर है। ऐसी स्थिति में अगर हम जांच की गति

को तेज करने जैसा प्रशासनिक फैसला नहीं ले पाते तो आने वाले दिनों में हमारी सारे

चिकित्सा संसाधन इसके मुकाबले कम पड़ जाएंगे। काफी पहले से ही इसके विकल्प की

मांग की जाती रही है। लॉक डाउन लागू किये जाने के दौरान ही अगर यह फैसला कर लिया

गया होता तो स्थिति में अब तक काफी सुधार भी नजर आता। झारखंड सरकार को भी

इस मामले में इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च के पथ का अनुसरण करना चाहिए

और कोरोना काल की हर जरूरत पर पैसा बचाने की सोच रखने वालों से अलग हटकर

ऐसी ऑटोमैटिक मशीनों को स्थापित करना चाहिए, जिनका उल्लेख कोरोना संकट के

प्रारंभ होने के काफी पहले से किया जाता रहा है क्योंकि ब्लड बैंक में मशीन लगने के वक्त

भी इसका उल्लेख किया गया था।


 

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