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इंडियन काउंसिल फॉर मेडिकल रिसर्च के बयानों का लगातार हो रहा है खंडन

  • प्लाज्मा ट्रीटमेंट पर आइसीएमआर की राय पर विवाद

  •  डब्ल्यूएचओ के जैसा आचरण है आईसीएमआर का

  •  स्वस्थ हो चुके मरीज पर भी निर्भर है इसका असर

  •  आंकड़ों का विश्लेषण का तरीका अलग अलग है

प्रतिनिधि

नईदिल्लीः  इंडियन काउंसिल फॉर मेडिकल रिसर्च का प्लाज्मा ट्रीटमेंट पर यह गंभीर

बयान आया था। आईसीएमआर ने कहा है कि प्लाज्मा के जरिए कोरोना का ईलाज

अधिक उम्र के रोगियों के लिए कारगर नहीं है। लेकिन इस बयान के बाद प्लाज्मा के

जरिए मरीजों का ईलाज कर रहे अनेक डाक्टरों की जो प्रतिक्रिया आयी है, वह

आइसीएमआर के बयान के खिलाफ हैं। अब तो चिकित्सा जगत में आईसीएमआर की

तुलना भी डब्ल्यूएचओ से की जाने लगी है जो सिर्फ बिना सोचे समझे बयान ही जारी

करने के काम तक सीमित है। वैसे भी मास्क और पीपीई किट आयात के मामले में अपने

फैसलों की वजह से यह सरकारी संस्था पहले ही विवादों में घिर चुकी थी।

आईसीएमआर के महानिदेशक डॉ बलराम भार्गव ने कहा था कि दुनिया में सबसे अधिक

तादाद में प्लाज्मा ट्रीटमेंट भारत में ही हो रहा है। उनके मुताबिक देश के 39 अस्पतालों में

ऐसा किया गया है। इसी आधार पर मरीजों का आयु और उपचार के आंकड़ों के आधार पर

इस ट्रीटमेंट से उम्रदराज लोगों पर फायदा नहीं होने की जानकारी मिली है। उनका कहना

था कि इससे मृत्युदर कम करने में कोई उल्लेखनीय सफलता प्राप्त होने का कोई प्रमाण

नहीं मिल पाया है। उन्होंने यह बयान इसी सप्ताह दिया है। लेकिन उसके बाद प्लाज्मा से

कोरोना मरीजों का ईलाज करने वाले कई डाक्टरों ने इस बयान का खंडन कर दिया। इस

बारे में अपने अनुभव के आधार पर बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के प्रोफसर सुनीत कुमार

सिंह ने कहा कि इसमें प्लाज्मा ईलाज के लिए कई विषयों पर ध्यान देने की भी जरूरत

रहती है। खास कर यह देखा जाना चाहिए प्लाज्मा देने वाले के खून में किसी किस्म का

वाइरल आरएनए सक्रिय नहीं हो।

इंडियन काउंसिल पर मेडिकल रिसर्च के बयान में तथ्यों की कमी

दरअसल शोध वैज्ञानिक यह कहने से भी नहीं चूकते कि आईसीएमआर भी सीधे तौर पर

अमेरिका में घटित हो रहे घटनाक्रमों के आधार पर अपनी बात कहता जा रहा है। वह

अपने तौर पर खुद कोई गहन अनुसंधान भी नहीं कर रहा है। अमेरिका में कोरोना का

प्रकोप बढ़ने पर कनवलसेंट प्लाज्मा के उपचार की अनुमति दी गयी थी लेकिन कुछ लोगों

के बयान के तुरंत बाद इसे वापस भी ले लिया गया। बाद में जब और आंकड़े सामने आये

तो फिर से इसकी समीक्षा के उपरांत प्लाज्मा ट्रीटमेंट की अनुमति दी गयी है। ठीक वही

घटनाक्रम भारतवर्ष में भी आईसीएमआर के मामले में नजर आ रहे हैं। लेकिन अमेरिका

में इसके खिलाफ दवा लॉबी का दबाव होने की बात सामने आ गयी है। भारतवर्ष में यह

राज खुलना अभी बाकी है।

एमजीआई इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस, सेवाग्राम, महाराष्ट्र के निदेशक डॉ एस पी

कालांतरी ने कहा कि प्लाज्म पद्धति से हुए ईलाज से निश्चित तौर पर मृत्युदर को कम

करने में सफलता मीली है। इसमें उन्हीं मरीजों का ईलाज किया गया था जो गंभीर किस्म

के बीमार थे। लेकिन इसमें अभी और शोध करने की जरूरत है। सीधे सीधे उसे खारिज तो

नहीं किया जा सकता।

सौम्या स्वामीनाथ ने कहा अभी कुछ तय कर पाना कठिन है

इस संबंध में डब्ल्यूएचओ की मुख्य वैज्ञानिक डॉ सौम्या स्वामीनाथन ने कहा कि इसमें

कोई आदर्श सिद्धांत तय करना अभी कठिन है। जिन रोगियों का ईलाज इस पद्धति से हुआ

है, सभी की स्थिति अलग अलग थी। लिहाजा ऐसे सभी मरीजों के शरीर में उत्पन्न

एंटीबॉडी की स्थिति भी अलग अलग रही होगी। लेकिन उन्होंने कहा कि प्लाज्मा पद्धति से

ईलाज के लिए इस बात पर ध्यान दिया जाना चाहिए कि जिस व्यक्ति का प्लाज्म लिया

जा रहा है, वह कोरोना के प्रभाव से पूरी तरह मुक्त हो चुका हो। तभी उसके शरीर में मौजूद

एंटीबॉडी के प्रभाव का पता चल पायेगा।

दिल्ली के होली फैमिली अस्पताल के क्रिटिकल केयर यूनिट के प्रमुख डॉ सुमित राय ने

कहा कि भारत और चीन में प्लाज्मा ईलाज के आंकडे पर्याप्त नहीं हैं। इसलिए अभी इस

बारे में कोई नतीजा निकाल पाना जल्दबाजी होगी।

दूसरी तरफ बेंगलुरु के डाक्टरों ने कहा है कि वे आईसीएमआर के निष्कर्षों से कतई

इत्तेफाक नहीं रखते हैं। उनके मुताबिक बेंगलुरु में जिन मरीजों का इस विधि से ईलाज

हुआ है, उसके आंकड़े काफी उत्साहवर्धक हैं। इन डाक्टरों ने कोरोना के वैसे मरीजों का

ईलाज करने में प्लाज्मा पद्धति से हुए फायदे का जिक्र किया है जो कोरोना के अलग अलग

स्थिति के मरीज थे। बेंगलुरु और कर्नाटक के 55 अस्पतालों के 430 मरीजों का आंकड़ा

देते हुए यह दावा किया गया है कि इनमें से साठ प्रतिशत मरीजों को इस पद्धति से हुए

ईलाज से फायदा हुआ है।


 

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