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मेनहर्ट के घोटाले पर विधायक सरयू राय ने लिखी है पुस्तक

  • फिर से बाहर आ गया मेनहर्ट घोटाले का जिन्न

  • मेनहर्ट के सवाल पर पहले भी लगे हैं आरोप

  • जांच को हर स्तर पर रोकने की पूरी कोशिश

  • दरअसल कंपनी को टेंडर मिलना ही नहीं था

संवाददाता

रांचीः मेनहर्ट का घोटाला रघुवर दास के लिए निजी तौर पर परेशानी का सबब है। 

विधायक सरयू राय की पुस्तक में मेनहर्ट घोटाले का जिस तरीके से जिक्र किया

गया है, वह पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास को और अधिक परेशानियों में डालने वाला साबित

हो सकता है। याद रहे कि इस मेनहर्ट घोटाले के अलावा भी कई अन्य मुद्दों पर भ्रष्टाचार

होने की शिकायत श्री राय अपने कैबिनेट मंत्री रहते हुए भी करते रहे है। अब चंद दिनों के

युद्धविराम के बाद उनकी तरफ से रघुवर दास के खिलाफ फिर से गोले दागे जा रहे हैं।

दूसरी तरफ हेमंत सोरेन द्वारा एक एक कर जांच के आदेश दिये जाने की वजह से रघुवर

दास खेमा के लोगों के चेहरों की रंगत उड़ी हुई है। इस कड़ी में ताजा फैसला धनबाद का है,

जिसमें समझा जा रहा है कि रघुवर दास के करीबी रहे चंद्रशेखर अग्रवाल को निपटाने की

राजनीतिक तैयारी कर ली गयी है।

विधायक सरयू राय ने अपनी इस पुस्तक के पहले मधु कोड़ा पर भी एक किताब लिखी थी

जबकि चारा घोटाला पर वह पहले ही विस्तारित जानकारी लिख चुके हैं। मेनहर्ट के मामले

में पहले से उल्लेखित मुद्दों को भी श्री राय ने सही ठहराया है। उन्होंने अपनी किताब में यह

क्रमवार ढंग से बताया है कि कैसे अयोग्य होने के बाद भी इस कंपनी को फायदा पहुंचाने

के लिए नियम कानूनों क माखौल उड़ाया गया था। श्री राय ने लिखा है कि जब यह सारी

गड़बड़ी हो रही थी तो नगर विकास विभाग रघुवर दास के अधीन था। सरकार बदली तो

जांच आगे बढ़ी। निविदा का मूल्यांकन करनेवाली तकनीकी उपसमिति और उच्चस्तरीय

समिति के अभियंताओं और अधिकारियों की कार्यान्वयन समिति के समक्ष पेशी हुई,

उनसे पूछताछ की गयी। पूछताछ में असलियत सामने आ गयी।

विधायक सरयू राय ने कार्रवाइयों का विवरण पेश किया है

समिति ने निष्कर्ष निकाला कि निविदा की योग्यता शर्तों के मुताबिक मेनहर्ट अयोग्य

था। उसकी बहाली अनियमित थी। यह निष्कर्ष सरकार के पास भेजा गया। सरकार का

उत्तर नहीं मिला तो कार्यान्वयन समिति ने अपना प्रतिवेदन विधानसभा अध्यक्ष को सौंप

दिया। बाद में सरकार ने कार्यान्वयन समिति के प्रतिवेदन के निष्कर्षों की सत्यता जांचने

के लिए पांच अभियंता प्रमुखों की तकनीकी समिति गठित की। इस समिति के चार

सदस्यों ने माना कि निविदा की शर्तों पर मेनहर्ट की नियुक्ति में भूल हुई है। एक ने तो

यहां तक कह दिया कि निविदा प्रकाशन से लेकर निविदा निष्पादन की प्रक्रिया में हर

जगह त्रुटि हुई है। मामले की निगरानी जांच का अनुशंसा के बाद निगरानी ब्यूरो के

आइजी ने एक साल में पांच पत्र निगरानी आयुक्त को लिखा कि मामले की जांच के लिए

अनुमति दी जाये, पर निगरानी आयुक्त से उन्हें जांच की अनुमति नहीं मिली। निगरानी

ब्यूरो को जांच नहीं करने दी गयी। उस वक्त निगरानी आय़ुक्त के पद पर पूर्व मुख्य

सचिव राजबाला वर्मा काबिज थीं। जिन्हें अफसरशाही में रघुवर दास को बिगाड़ने का

सबसे अधिक श्रेय जाता है। विधायक श्री राय ने अपनी पुस्तक में इस बात का भी उल्लेख

किया है कि जांच के दौरान ही निविदादाता की योग्यता मूल्यांकन के बारे में नगर विकास

मंत्री, महाधिवक्ता लगातार झूठ बोलते रहे, वही झूठ न्यायपालिका के सामने भी और

मुख्यमंत्री के सामने भी जान-बूझकर परोसा जाता रहा।

अदालत से लेकर हर जगह मेनहर्ट पर झूठ बोला गया

यह झूठ था कि निविदा केवल दो लिफाफों में आमंत्रित की गयी थी। जबकि निविदा प्रपत्र

में स्पष्ट अंकित था कि निविदा तीन लिफाफों में आमंत्रित की गयी है। पहला लिफाफा

योग्यता का, दूसरा लिफाफा तकनीकी क्षमता का और तीसरा लिफाफा वित्तीय प्रस्ताव

का। मेनहर्ट निविदा में अंकित योग्यता की शर्तों पर अयोग्य था। योग्यता की शर्तों के

अनुसार निविदादाता फर्मों से गत तीन वर्षों, 2004-05, 2003-04 और 2002-03, का टर्न

ओवर मांगा गया था। मेनहर्ट ने केवल दो वर्षों- 2002-03, और 2003-04 का ही टर्न ओवर

दिया था। 2004-05 का टर्न ओवर उसने दिया ही नहीं था। इस कारण उसकी निविदा

मूल्यांकन के पहले चरण में ही, यानी योग्यता के मूल्यांकन के समय ही खारिज हो जानी

चाहिए थी।


 

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