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1952 ई. से बेड़ो के डाक बंगला से शुरू हुआ था दुर्गा पूजा का सफर

  • महज 376 रुपए की लागत से की गई थी पूजा

  •  होम्योपैथ चिकित्सक डॉ जादव नाथ देवघरिया की पहल

  •  काफी उतार चढ़ावों वाला रहा है यहां के दुर्गापूजा का इतिहास

  •  पश्चिम बंगाल से कारीगर आया था प्रतिमा गढ़ने पहली बार

सुनील कुमार गुप्ता

बेड़ो: 1952 ई. से बेड़ो में दुर्गा पूजा का सफर यानी आज से 68 वर्ष पूर्व  पुराने डाक बंगला

वर्तमान जिला परिषद मार्केट के पीछे  शुरू किया गया था। होम्योपैथ चिकित्सक और

तत्कालीन मुखिया सह समाजसेवी जादव नाथ देवघरिया ने 1952 ई0 में बेड़ो के रूंजु सेठ,

गिरधारी सिंह, परन बड़ाईक, महली सिंह बड़ाईक, बंठा गोयन्दा गोप की मदद से दुर्गा

पूजा की शुरूआत की थी। बेड़ो में पहली बार हुई दुर्गा पूजा में जादव नाथ देवघरिया के

साथ मिलकर दिवाकर चंद्र देवरिया ने पूजारी की भूमिका भूमिका निभायी थी। तीन वर्षों

तक लगातार डाक बंगला में पूजा होने के बाद 1955 ई0 में थाना के सामने परन सिंह

बड़ाईक के कच्चे मकान में पूजा होने लगी। यहां की पूजा में तत्कालीन तहसीलदार ने

महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।‌ बेड़ो में प्रखंड की स्थापना के साथ में ही 1961 ई0 में जादव

नाथ देवघरिया ने तत्कालीन ठक्कर बाप्पा योजना के तहत चलने वाली आदिम जाति

सेवा मंडल मध्य विद्यालय के प्रधानाध्यापक और बारीडीह निवासी संतोष कुमार राय,

दुर्गा प्रसाद शर्मा, हरिश्चन्द्र राय के साथ मिलकर पुनः पहल कर ऐतिहासिक महादानी

मंदिर के परिसर में मिट्टी के कच्चे मंदिर बनाकर स्थायी रूप से दुर्गा पूजा की शुरूआत की

थी। सभी पूजाओं में जादव नाथ देवघरिया, दिवाकर चंद्र देवघरिया और बंठा गोयन्दा गोप

की भूमिका अहम थी। पश्चिम बंगाल के पुरूलिया से मूर्ति बनाने वाले कारीगर मंगाकर

मां दुर्गा की प्रतिमा बनवाई गयी।

1952 ई की पूजा की जानकारी भी डॉ देवधरिया ने दी थी

जादव नाथ देवघरिया ने बताया था कि पहली दुर्गा पूजा में केवल 376 रूपए का खर्च हुआ

था। पहली पूजा पूरी तरह बंगला रीति रिवाज से आयोजित की गयी थी और उसके बाद

बेड़ो बांग्ला रीति रिवाज से ही मां दुर्गा की पूजा होती रही। तब बेड़ो में दुर्गा पूजा के साथ-

साथ लोगों के मनोरंजन के लिए नाटकों का मंचन होता था। स्टेज बनते थे और दुर्गा पूजा

आयोजन समिति के सदस्य ही नाटकों में हिस्सा लेते थे।

बारीडी के प्रसिद्ध लोक कलाकार क्षितिज कुमार राय ने बताया कि

उन्हें महाभारत नाटक में जयद्रथ की भूमिका मिली थी जिसमें उन्होंने स्वर्ण पदक का

अवार्ड जीता था। नाटकों में कालीकांत राय, प्रमोद चंद्र देवरिया, हरिश्चंद्र राय तथा दुर्गा

प्रसाद शर्मा ( अब सभी स्वर्गीय ) समेत अन्य लोगों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

जादव नाथ देवघरिया के बाद उनके सुपुत्र विनोद चंद्र देवरिया ने हरि सोनी और दुर्गा

प्रसाद शर्मा के साथ मिलकर 1971 में दुर्गा पूजा आयोजन की कमान संभाली। वहां से

लेकर लेकर वर्तमान में दुर्गा पूजा महासमिति के अध्यक्ष सौमित्र शर्मा तक का सफर बेड़ो

के दुर्गा पूजा के लिए महत्वपूर्ण रहा है। तत्कालिन मुखिया स्व. विनोद चन्द्र देवघरिया,

स्व.नित्यानंद सेन, स्व.प्रमोद देवघरिया, स्व.भवानी बडा़ईक, स्व. मुन्ना भगत, स्व.

बैजनाथ बडा़ईक ने अपने समय में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी थी। उनके बाद किशोरी

बडा़ईक,शशिभूषण बडा़ईक,ललन कुमार मिश्रा,दशरथ गोप, केदार रजक, ईन्द्रदेव सिंह

(अब स्वर्गीय ) मनोरंजन देवघरिया,गौतम देवघरिया ने अहम भूमिका निभायी।

बेडो़ में दुर्गा पूजा महासमिति के अध्यक्ष के रूप में विनोद चन्द्र देवघरिया के बाद

1989 ई. से 1994 ई. तक प्रकाश कुमार सिंह 1995 ई. में सुनील कुमार गुप्ता,1996 ई. में

विश्वनाथ गोप,1997 ई0 से 2001 ई0 तक धनंजय कुमार राय, 2002 ई. से 2004 ई.तक

बबलू कुमार गुप्ता, 2005 ई. में पवन कुमार गुप्ता (अब दिया गया।


 

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