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अंतिम बार जेम्स वेब टेलीस्कोप के विशाल आइने को खोला गया

  • अंतरिक्ष में रवाना करने से पहले हो रही है जांच

  • निर्धारित समय से पीछे चल रहा है कार्यक्रम

  • आइना आकार में बड़ा है, इसलिए मोड़ा गया

  • अन्य कई उपकरण भी मोड़कर रखे गये हैं

राष्ट्रीय खबर

रांचीः अंतिम बार जांच कर वैज्ञानिक संतुष्ट हो जाना चाहते हैं। प्रस्तावित कार्यक्रम के

मुताबिक इस विशाल खगोल दूरबीन को आगामी 31 अक्टूबर को अंतरिक्ष में भेजा जाना

है। इसी परीक्षण के तहत वैज्ञानिकों ने इसके विशाल आइने को अंतिम बार के लिए

खोला। इसके बाद यह आइना सीधे अंतरिक्ष में जाने के बाद ही खुलेगा। दुनिया के सबसे

आधुनिक और बड़े इस टेलीस्कोप को अंतरिक्ष में भेजने के बाद पहले से वहां काम कर रहे

हब्बल टेलीस्कोप का प्रयोग बंद हो जाएगा। वैसे भी हब्बल अपने निर्धारित समय सीमा से

काफी अधिक समय तक काम करता आ रहा है। कोरोना संकट की वजह से नासा के सारे

अंतरिक्ष कार्यक्रम भी विलंब से चल रहे हैं। जेम्स वेब टेलीस्कोप को अंतरिक्ष में भेजने का

कार्यक्रम भी इसी वजह से टला था। इस खगोल दूरबीन में जो आइना लगा है वह साढ़े छह

मीटर लंबा है। यह पूरी तरह मोड़ा जा सकता है। अंतरिक्ष में जाने और अपने कक्ष में

स्थापित होने के बाद यह आइना धीरे धीरे पूरा खुल जाएगा। इसके पहले अंतिम बार

उसके खुलने की जांच कर ली गयी है। इस जांच से वैज्ञानिक संतुष्ट हैं। इस आइने को कई

कारणों से खास माना जा रहा है क्योंकि यह भी आधुनिक विज्ञान की नई तकनीक की एक

मिशाल है। यह वजन में काफी हल्का है। उस पर कई किस्म की परतें हैं। साथ ही उसमें

अत्याधुनिक यंत्र और सूर्य की रोशनी और गर्मी से बचने का प्रबंध भी है। यह पूरा ताम

ताम एक साथ है और उसे अंतरिक्ष यान में मोड़कर भेजा जा रहा है। नासा गोडार्ड स्पेस

फ्लाइट सेंटर के ली फेइनबर्ग ने कहा कि सभी उपकरणों को उनके सही स्थान पर रखने के

पहले जांच लेना जरूरी होता है। आइना को खोला जाना भी उसी का हिस्सा है।

अंतिम बार हर उपकरण की बारी बारी से जांच जारी

आइने के हर हिस्से की बारिकी से जांच करने के लिए भी सैकड़ों वैज्ञानिक लगे हुए हैं, जो

अपने अपने हिस्से की जिम्मेदारी निभा रहे हैं। दरअसल अंतरिक्ष में भेजे जाने वाले इस

खगोल दूरबीन का आकार इतना बड़ा है कि उसे किसी अंतरिक्ष यान में नहीं भेजा जा

सकता था। इसी वजह से उसकी संरचना में यह इंतजाम किया गया है कि उसके सारे

उपकरण, जो आकार में बहुत बड़े हैं, उन्हें मोड़कर अंतरिक्ष यान के अंदर रखा जाए। एक

बार अंतरिक्ष की कक्षा में स्थापित होने के बाद वे नियंत्रण कक्ष से प्राप्त निर्देशों के

मुताबिक एक एक कर खुलते चले जाएंगे और अपना काम करने लगेंगे। पांच मीटर लंबे

रॉकेट के खाली स्थान में इन सारे उपकरणों को रख लेना भी इंजीनियरिंग का कमाल ही

है। आइनों की जिम्मेदारी यह होगी कि वे रिफ्लेक्टर का भी काम करेंगे। एक बार उसके

सारे पंख जब खुल जाएंगे तो सारे संवेदनशील उपकरण आइने के पीछे छिप जाएंगे ताकि

सूर्य की रोशनी और ताप से उनकी रक्षा हो सके। जेम्स वेब टेलीस्कोप को पृथ्वी से करीब

दस लाख मील की दूरी पर स्थापित करने की योजना है। जहां से वह अंतरिक्ष की हर छोटी

बड़ी घटनाओं की जानकारी हमें भेजता रहेगा। कैलिफोर्निया के रेडोंडो बिच में स्थित

नार्थ्रप ग्रूमैन नियंत्रण कक्ष से उसे जांचा परखा भी गया है। शून्य गुरुत्वाकर्षण में यह सारे

उपकरण कैसे काम करते हैं, उसकी जांच जरूरी भी थी क्योंकि अंतरिक्ष में इन उपकरणों

को इसी माहौल में काम करना होगा। उन सारे उपकरणों को ढकने के लिए विशेष रुप से

तैयार किये गये थर्मल आवरणों की भी जांच हो रही है ताकि वे स्थापित कक्ष में सही ढंग

से काम कर सके।

आधुनिक विज्ञान का सबसे संवेदनशील यंत्र बना है यह

तकनीकी और इंजीनियरिंग के नजरिए से देखें तो इतना अधिक संवेदनशील लेकिन सूर्य

की गर्मी को सहन करने वाला उपकरण इससे पहले कभी तैयार नहीं किया गया है। इसमें

हजारों छोटे बड़े यंत्र लगे हैं। इसके कुछ दिन पूर्व ही उसके बहुत ही पतले शील्ड को भी

काफी सावधानी के साथ मोड़ा गया था। उस शील्ड की जिम्मेदारी सूर्य के अत्यधिक ताप

और विकिरण से यंत्रों को बचाने की है। जैसे जैसे यह काम पूरा हो रहा है, जेम्स वेब

टेलीस्कोप को अंतरिक्ष में भेजने की तैयारियों को अंतिम रुप प्रदान किया जा रहा है।

अगले चरण में उसके दो विशेष रेडियेटरों की जांच होनी है, जो पूरी प्रक्रिया में शामिल सभी

यंत्रों को ठंडा रखने का काम करेंगे। इस नये टेलीस्कोप के स्थापित होने के बाद यह

उम्मीद की जा रही है कि हम अंतरिक्ष के उन अनजाने इलाकों को भी बेहतर तरीके से देख

पायेंगे, जहां अब तक हमारी वैज्ञानिक नजर नहीं गयी है।

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