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सरकार को विदेशी निवेश के लिए बेहतर काम करना होगा

सरकार को अपनी और देश की आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए फिर से विदेशी पूंजी

निवेश की आवश्यकता पड़ेगी, यह स्पष्ट हो चुका है। देश की अपनी खाद्य संबंधी जरूरतों

को देश के किसान इस बार तो पूरा कर लेंगे। उसकी दूसरी वजहें भी हैं। लेकिन अगले साल

नये कृषि कानून का क्या कुछ असर पड़ेगा, यह अभी देखने समझने की बात होगी।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस वर्ष अपने कई संबोधनों में विदेशी निवेशकों को चीन के

समक्ष भारत को एक वैकल्पिक निवेश केंद्र के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया है।

उन्होंने निवेशकों से कहा कि यह भारत में निवेश करने का सबसे अच्छा समय है। वैसे तो

कोरोना दुष्काल में सभी देशों की आर्थिक स्थिति बुरी तरह बिगड़ चुकी है। लेकिन यह

समय भारत के लिए इसलिए भी बेहतर अवसर है क्योंकि भारतीय श्रम के दाम अपेक्षाकृत

कम होने की वजह से चीन से भागने वाले निवेशक विकल्प तलाश रहे हैं। केंद्र सरकार या

यूं कहें कि नरेंद्र मोदी के चमत्कारिक व्यक्तित्व से प्रभावित विदेशी निवेशक भारत में

अपनी नया ठिकाना तलाश रहे हैं। लेकिन इसके लिए सिर्फ मोदी के व्यक्तित्व का

चमत्कार ही काम नहीं आयेगा। भारतीय शासन व्यवस्था में जो खामियां हैं और जिनकी

वजह से निवेशक यहां आने के बाद भाग जाते हैं, उन खामियों को हमें अपने अंदर से दूर

करना होगा। बिना किसी काम के भी फाइलों को बेवजह लटकाने की प्रवृत्ति पर रोक

लगानी होगी। कोरोना संकट के आने के पहले मोदी प्रयासों के बेहतर परिणाम नजर आने

लगे थे। विदेशी निवेशकों ने उनकी इस बात पर उत्साहजनक प्रतिक्रिया दी। मोदी ने कहा

कि भारत ने इस वर्ष अप्रैल से जुलाई के बीच 20 अरब डॉलर मूल्य का विदेशी निवेश

आकर्षित किया है। यह किसी भी मानक से अत्यंत उल्लेखनीय है।

सरकार को अफसरशाही को सुधारना होगा

एक ऐसे वर्ष में जब वैश्विक अर्थव्यवस्था कोविड-19 महामारी के कारण तेजी से कमजोर

पड़ी है और भारत किसी भी अन्य उभरते बाजार की तुलना में इससे अधिक प्रभावित हुआ

है, ऐसे में यह प्रदर्शन वाकई उल्लेखनीय है। 20 अरब डॉलर का आंकड़ा वित्त वर्ष 2020 के

73.5 अरब डॉलर के 27 फीसदी के बराबर है जो अपने आप में चमत्कृत करने वाला है।

सरकार ने इस उपलब्धि का जश्न भी मनाया क्योंकि यह 2018-19 के आंकड़े से 18

फीसदी की महत्त्वपूर्ण बढ़त दर्शा रहा था। वाणिज्य मंत्रालय की ओर से अभी पहली

तिमाही के प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) के आंकड़े आने शेष हैं। यानी इन ताजातरीन

आंकड़ों की सच्चाई अभी स्थापित होना बाकी है। यदि ऐसा है तो एफडीआई में आई इस

तेजी को भारत में वैश्विक भरोसे के रूप में नहीं देखा जा सकता है। बल्कि यह इस बात को

दर्शाता है कि वैश्विक निवेशक समुदाय को पता है कि भारतीय आर्थिक और कारोबारी

परिदृश्य में रिलायंस इंडस्ट्रीज की हैसियत कितनी मजबूत है। ऐसे में एफडीआई

सत्ताधारी दल के लिए एक हद तक प्रतिष्ठा बचाने का कारण बना रहा। बहुसंख्यक शैली

के ध्रुवीकरण वाले शासन और अर्थव्यवस्था के खराब प्रबंधन के कारण सरकार को न

केवल देश के भीतर बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी भारी आलोचना का सामना करना

पड़ा है। ऐसे में एफडीआई को सत्ताधारी दल के ऐसे प्रचार के रूप में देखा जाता रहा है जो

विचारधारा से संचालित नहीं है। यह एक सीमा तक सही अनुमान हो सकता है क्योंकि

वैश्विक पूंजी अपनी प्रकृति में अनैतिक होती है। परंतु यह भी सही है कि पिछले वर्ष तक

एफडीआई की वृद्धि दर भी अत्यंत कमजोर थी।

वृद्धि दर के गिरने के बाद विदेशी पूंजी आवश्यकता

वित्त वर्ष 2015 और 2016 में 25 और 23 फीसदी की वृद्धि दर हासिल करने के बाद जब

देश के ‘सीईओ’ प्रधानमंत्री शिखर बैठकों को संबोधित कर रहे थे और एक के बाद एक बड़ी

निवेश परियोजनाओं (मेक इन इंडिया, स्टार्ट अप इंडिया वगैरह) की शुरुआत कर रहे थे

तब वित्त वर्ष 2017, 2018 और 2019 में एफडीआई की वृद्धि दर क्रमश: आठ, एक और दो

फीसदी थी। इस दौरान मोदी सरकार ने नोटबंदी, जीएसटी की समय सीमा को पहले करने

और गोवध पर प्रतिबंध लगाने जैसे कदम उठाए जिनका असर अर्थव्यवस्था पर पड़ा। अब

हालत यह है कि औद्योगिक उत्पादन को गति प्रदान करने के लिए जिस अतिरिक्त

संसाधन की जरूरत है, वह विदेशी पूंजी निवेश ही है। इसे लाने के लिए सरकार को हर

स्तर पर अपनी सोच और काम करने के तरीकों को बदलने की आवश्यकता है। वर्तमान

कार्यसंस्कृति में पैसा लगाने वालों के लिए दूसरे देशों का विकल्प का दरवाजा खुला है, इसे

केंद्र सरकार नहीं भूल सकती है। लिहाजा सिर्फ मोदी के भरोसे अगर यह देश विदेशी पूंजी

का इंतजार करता रहा तो असफलता ही हाथ आयेगी।


 

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