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ममता वनाम मोदी की लड़ाई अब रोचक होती जा रही




नईदिल्लीः ममता बनर्जी फिर से दिल्ली दौरे पर हैं। इस दौरे में उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की है। वहां से निकलने के बाद सुश्री बनर्जी ने कहा है कि प्रधानमंत्री से उनकी बात राज्य की समस्याओं और राज्य में बीएसएफ के कार्यक्षेत्र के विस्तार को लेकर हुई है।




इसमें पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ने अपने राज्य में सीमा सुरक्षा बल को अधिक दायरा देने का विरोध जताते हुए कहा है कि यह देश के संघीय ढांचे को कमजोर करने वाला है। लेकिन मसला सिर्फ ममता बनर्जी का नरेंद्र मोदी से मिलना ही नहीं है।

दिल्ली दौरे के पहले ही दिन तीन बड़े नेताओं को पार्टी में शामिल कर उन्होंने साफ कर दिया है कि बंगाल चुनाव के वक्त उन्होंने जो बात कही थी, वह उसपर न सिर्फ टिकी हुई हैं बल्कि अपनी तरफ से इसी बात को और मजबूती से स्थापित करने की पुरजोर कोशिश कर रही हैं।

याद दिला दें कि जब पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव का प्रचार चल रहा था तो भाजपा के अनेक नेताओं ने उनका जबर्दस्त मजाक उड़ाया था। यहां तक कि जब नंदीग्राम में उनकी टांग टूटी तब भी भाजपा की तरफ से यह हार से बचने का एक बहाना कहा गया है।

ममता बनर्जी दरअसल टीएमसी तो एक क्षेत्रीय पार्टी है

ममता बनर्जी पहले बंगाल भाजपा के नेता हर बार पर यही कहते थे कि दरअसल टीएमसी तो एक क्षेत्रीय पार्टी है, जिसका कोई जनाधार पश्चिम बंगाल के बाहर नहीं है।

चुनाव प्रचार के दौरान ममता बनर्जी ने भाजपा के इस किस्म के आरोपों का उत्तर देते हुए कहा था कि इस बार बंगाल में कुछ नहीं बदलेगा लेकिन यह तय हो गया है कि अगले लोकसभा चुनाव से पहले दिल्ली में बहुत कुछ बदल जाएगा। ममता वनाम मोदी की लड़ाई में सुश्री बनर्जी दिल्ली में तंबू गाड़कर अपनी ताकत बढ़ाने का काम लगातार जारी रखी हुई हैं।

पश्चिम बंगाल के बाद टीएमसी ने पहले असम और उसके बाद त्रिपुरा में अपना संगठन विस्तार प्रारंभ किया था। उसके बाद ही गोवा में भी पार्टी ने अपनी उपस्थिति दर्ज करा दी है।

त्रिपुरा के घटनाक्रम यह बताते हैं कि वहां भाजपा वाकई तृणमूल कांग्रेस की सक्रियता से परेशान है और इसी वजह से लगातार वहां टकराव की स्थिति बनी हुई है।

पश्चिम बंगाल में भी यह टकराव पैदा करने की कोशिश तो हुई थी लेकिन अपने मुख्य इलाके में ममता बनर्जी का वजन भाजपा के तमाम नेताओं के मुकाबले अधिक भारी पड़ गया था।




हर विरोधी दल की नजर अब टीएमसी प्रमुख पर लगी है

नतीजा है कि चुनाव संपन्न होने के बाद अनेक भाजपा विधायक पार्टी छोड़कर फिर से टीएमसी में शामिल हो गये हैं। यही हाल भाजपा के संगठन का भी है।

पार्टी के पदाधिकारी लगातार पार्टी छोड़कर जा रहे हैं जबकि भाजपा के प्रदेश संगठन में गुटबाजी अब कोई छिपी हुई बात नहीं है। यानी सामने से दबाव पड़ने के बाद भाजपा का संगठन भी दरारों वाला नजर आने लगा है।

अब तो तीन किसान कानूनों की वापसी का फैसला पहली बार यह जता रहा है कि अत्यधिक दबाव में नरेंद्र मोदी को भी अपने फैसले से पीछे हटना पड़ा है। इसका पूरे देश में एक स्पष्ट संकेत गया है कि जिसे अजेय समझा गया था वह भी अंदर से सत्ता जाने के भय से डरता है।

दूसरी तरफ किसान भी अपनी अन्य मांगों के लिए अड़े हुए हैं। जिससे यह स्पष्ट होता जा रहा है कि दिल्ली की सीमाओं पर खींची राजनीतिक युद्ध की सीमा रेखा अभी मिटने नहीं जा रही है।

वैसे औपचारिक तौर पर संसद से तीनों कृषि कानूनों की वापसी के बाद हो सकता है कि माहौल बदले। लेकिन असली मुद्दा तो ममता वनाम मोदी की राजनीतिक लड़ाई का है।

बंगाल चुनाव से अब तक बहुत कुछ बदल गया

इसमें पश्चिम बंगाल के चुनाव से पहले से लेकर अब तक माहौल में जो तब्दीली आयी है वह वाकई भारतीय राजनीति के उतार-चढ़ाव को ही रेखांकित करती है, जिसमें बाजी कब पलट जाएगी, कोई नहीं जानता।

लेकिन यह याद रखना होगा कि अभी देश में भाजपा के खिलाफ संयुक्त मोर्चा बनाने के रास्ते में अनेक दिक्कतें हैं। इनमें प्रमुख तो राजनीतिक नेताओ की व्यक्तिगत राजनीतिक महत्वाकांक्षा है और दूसरे अनेक नेता फिर से अपने खिलाफ भ्रष्टाचार के मामलों की जांच में तेजी आने से डरे हुए हैं।

लिहाजा वे खुलकर मोदी के विरोध में मैदान में तुरंत कूद पड़ेगे, इसका उम्मीद फिलहाल नहीं है। ममता वनाम मोदी की राजनीतिक लड़ाई में यह तय हो गया है कि पहले दो दौर की बाजी ममता के पक्ष में रही है। विधानसभा का चुनाव जीतने और भाजपा का किला कमजोर करने के बाद वह वाकई दिल्ली की गद्दी में भाजपा के लिए एक बड़ी चुनौती के तौर पर उभर रही है।



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