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बेड़ो के किसानों को नहीं मिल रही है अपनी सब्जी की लागत भी

  • मिर्ची का भाव अभी आठ से दस रुपये प्रति किलो
  • फसल बेचकर पूंजी भी नहीं निकाल पा रहे किसान
  • सब्जियों के भाव गिरे हैं तो कोई समर्थन नहीं देता
संवाददाता

बेड़ो: बेड़ो के किसानों को अपनी फसल की लागत भी कीमत में नहीं मिल रही है। झारखंड

के सबसे बड़े सब्जी उत्पादक इस क्षेत्र समेत राज्य के कई बाजारों में सब्जी के फसलों की

खरीद बिक्री जोरों पर चल रही है। जिसमें केवल सब्जी दलाल कहने वाले लोग ही सब्जी

बेच मालामाल हो रहे हैं। जबकि किसान के द्वारा लगाए गए खेती में जमा पूंजी भी

किसानों का नहीं निकल पा रहा है। बाजार में आने वाले अधिकतर सब्जियों के दाम कम

होने से किसानों के समक्ष एक बड़ी समस्या उत्पन्न हो गई है। जो किसान पूर्व में मिर्चा की

खेती कर 35 से 40 रुपए प्रति केजी के दर पर बेचा करते थे। लेकिन आज वहीं किसान

मिर्चा को मात्र 8 से 10 रुपए प्रति केजी के दर पर बेचने को विवश है। जिसमें किसानों

द्वारा खेती में लगाए गए हजारों रुपए का नुकसान किसानों को उठाना पड़ रहा है। फसल

के दाम कम होने से किसानों द्वारा लगाए गए लागत तो दूर तीन माह की खेती में

किसानों के पॉकेट से ही जमा पूंजी के पैसा को भरना पड़ रहा है। इसे लेकर किसान हरि

कुमार ने बताया कि किसान हजारों रुपए लगाकर खेती करते हैं। जिसमें भी उन्हें हमेशा

नुकसान ही उठाना पड़ रहा है। आज मिर्चा का भाव 8 से 10 रुपए प्रति केजी हो गया है।

वही एक क्विंटल मिर्चा बाजार में बेचने पर मात्र एक हजार रुपए ही हो रहा है। जबकि एक

क्विंटल मिर्चा को तोड़ने में कुल सात मजदूर खेत में लगाए जाते हैं।

बेड़ो के किसान मानते हैं कि मजदूरी की लागत भी नहीं मिलती

वही सातों मजदूर द्वारा अगर दिन भर में एक क्विंटल मिर्चा भी तोड़ा गया तो उन्हें 150

रुपये की दर से मजदूरी देनी पड़ती है। जो एक क्विंटल मिर्चा बेच कर भी मजदूरों के लिए

पैसा नहीं निकलता है। उसके अलावा किसानों को खेती करने में सबसे पहले खेत को

ट्रैक्टर के माध्यम से जोता जाता है। जिसके बाद फसल बोने के साथ ही लगातार पानी

पटवन के साथ दवा का छिड़काव किया जाता है। जिसमें किसानों की हजारों रुपए की

लागत होती है। लेकिन फसलों के दाम कम होने से किसानों द्वारा लगाए गए पैसा भी

नहीं निकल पाता है। यही सब कारण है कि किसान कर्ज के बोझ तले दबकर आत्महत्या

को विवश होते हैं। किसान ने बताया कि मिर्चा, टमाटर, भिंडी व फ्रेंच बीन समेत अन्य

हल्का फसल के मूल्य 20 रुपये से अधिक जब तक बाजार में नहीं होती है। तब तक

किसानों को लगातार ही नुकसान ही नुकसान उठाना पड़ता है। कभी भूल से सब्जियों के

दाम बाजार में अधिक होती है तो सरकार से लेकर ग्रामीण तक सब्जियों के दाम बढ़ने का

विरोध करते हैं। वही किसानों द्वारा उपजाए हुए फसल के दाम कम होने से किसानों की

हो रही नुकसान का कोई आवाज नहीं उठाता है। अन्नदाता कहने वाला किसान को लेकर

आखिर सरकार कब चिंतित होगी।


 

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