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आंदोलन को लेकर सरकार का खेल पकड़ चुके हैं किसान




आंदोलन को जल्द से जल्द समाप्त करने के अलावा इस पर विफलता की सारी जिम्मेदारी किसान




संगठनों पर डालने की केंद्र सरकार की चाल को शायद किसान समझ चुके हैं। इसी वजह से जब

अमित शाह ने फोन पर किसान नेताओं से एक कमेटी बनाने की बात कही तो उसे बहुत गंभीरता से

लिया गया। किसान संगठनों की बैठक में लंबी चर्चा के बाद पांच सदस्यीय कमेटी बनाने की घोषणा

कर दी गयी और केंद्र सरकार को भी इस कमेटी के सदस्यों की सूचना भेज दी गयी। वरना यह सोच

रही होगी कि यह कमेटी बनाने में भी अपने मतभेदों की वजह से किसान संगठन अधिक समय लेंगे

और केंद्र सरकार को फिर से यह प्रचारित करने का मौका मिल जाएगा कि दरअसल यह लोग वाकई

आंदोलन समाप्त करना ही नहीं चाहते हैं। केंद्र सरकार या यूं कहें कि यह भाजपा की मजबूरी हो गयी

है कि वह किसान आंदोलन से अब निपटे। इसके पहले की सारी चालें बेकार पड़ चुकी हैं और जैसे

जैसे उत्तरप्रदेश का चुनाव करीब आ रही है, भाजपा की परेशानियां बढ़ती नजर आ रही हैं। तीनों

कृषि कानूनों को लेकर किसानों का आंदोलन प्रारंभ होने के पहले ही चरण में अपने पूर्व परिचित

अंदाज में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने किसान नेताओं को धमकाने की कोशिश की थी। शायद

अमित शाह को इन किसानों की राजनीतिक ताकत का अंदाजा नहीं था क्योंकि उनके पास राष्ट्रीय

राजनीति का कोई अनुभव भी नहीं था। वह अपने गुजरात के तेवर के आधार पर इन किसानों को भी

उसी लाठी से हांक लेने की सोच के साथ जितनी तेजी से मैदान में उतरे उससे अधिक तेजी से मैदान

से बाहर चले गये थे।

आंदोलन को धमकाने में आये अमित शाह अब संभले हुए हैं

अब जाकर उन्हें फिर से किसानों को फोन करना पड़ रहा है। उन्होंने फोन किया तो किसान संगठनो

की बैठक में इसकी जानकारी दी गयी और किसान संगठनों के नेताओं ने इस चाल को समझते हुए

तुरंत कमेटी का गठन भी कर दिया। बैठक की समाप्ति के बाद किसान नेता राकेश टिकैत ने कहा

कि पांच सदस्यीय कमेटी में बलवीर सिंह राजेवार, शिव कुमार कक्का, गुरनाम सिंह चढ़ूनी, युद्धवीर

सिंह और अशोक ढावले शामिल है। सिंघु बॉर्डर पर चालीस किसान संगठनों की आज की बैठक में

यह राय निकलकर आयी कि अगर केंद्र सरकार के साथ उनकी वार्ता सही रही तो वे निश्चित तौर पर




अपना आंदोलन समाप्त कर देंगे। श्री शाह ने किसान नेताओं से उनकी सभी मांगों पर वार्ता की बात

कही है। केंद्रीय गृह मंत्री की इस पहल के बाद किसानों ने भी अपनी तरफ से पांच सदस्यीय कमेटी

का गठन कर दिया है, जो सरकार से अपनी मांगों के मुद्दों पर बात करेगी। आज की बैठक में अन्य

मुद्दों के अलावा कल रात केंद्रीय गृहमंत्री के फोन की सूचनाओं पर विस्तार से चर्चा हुई। श्री शाह ने

किसान नेताओं से यह कहा कि तीनों कृषि कानूनों की वापसी हो चुकी है और सरकार उनकी अन्य

मांगों पर खुले मन से विचार करने के लिए भी तैयार है। दरअसल तीनों कृषि कानूनों की वापसी के

बाद एमएसपी और शहीद किसानों के मुआवजा पर आंदोलनकारी किसान अड़े हुए हैं जबकि मांग में

इस एक साल के आंदोलन के दौरान विभिन्न समय में किसानों पर दर्ज हुए मुकदमों की वापसी भी

शामिल है। केंद्रीय गृह मंत्री ने किसानों को वह कमेटी देने को कहा था, जिससे सरकार इन तमाम

मुद्दों पर बात करेगी।

किसानों ने फिर से गेंद सरकार के पाले में डाल दी

किसान संगठनो की बैठक के बाद किसान नेता युद्धवीर सिंह ने यह जानकारी दी। उन्होंने कहा कि

इस कमेटी का सदस्यों का नाम अंतिम हो चुका है। इसलिए ऐसा हो सकता है कि केंद्र सरकार और

किसानों के पांच प्रतिनिधियों के बीच आगामी 7 दिसंबर को बात-चीत हो। अगर इस बात चीत से

सुलह का कोई रास्ता निकल आया तो आंदोलन समाप्त भी किया जा सकता है।केंद्र सरकार की

तरफ से इस पहल की असली वजह भी उत्तरप्रदेश में होने वाले चुनाव की मजबूरी है, ऐसा साफ

होता जा रहा है। चुनाव प्रचार प्रारंभ होने के बाद भी भाजपा को अनेक इलाकों में अब भी किसानों के

विरोध का सामना करना पड़ रहा है। खास तौर पर पश्चिमी उत्तरप्रदेश के उन इलाकों में भाजपा को

भारी परेशानी है जहां उन्हें थोक में वोट मिलते रहे हैं। इस खतरे को भांपते हुए ही मजबूरी में कृषि

कानूनों को वापस लेने जैसा फैसला लेना पड़ा है। इसके अलावा लखीमपुर खीरी की घटना से भी

भाजपा की चुनावी सेहत बिगड़ गयी है। इसलिए किसानों पर जिम्मेदारी डालने की चाल चली गयी

थी लेकिन किसान नेताओं की पहल से यह गेंद फिर से अब भाजपा के पाले में है।



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