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मंहगाई का असर सभी किस्म के उत्पादनों पर पड़ना स्वाभाविक

मंहगाई का असर अब भीषण तौर पर दिखने लगा है। कोरोना संकट में लोगों की जेब

खाली होने के बाद भी उपभोक्ता सामग्रियों का निर्माण करने वाली कंपनियों ने अपने

अपने उत्पादों के दाम बढ़ाये हैं। यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया है क्योंकि पेट्रोल और डीजल

की कीमतों मे लगातार बढ़ोत्तरी होने के बाद उसकी वजह से परिवहन लागत के बढ़ जाने

का असर उत्पादन लागत पर पड़ना स्वाभाविक है। देश में पेट्रोल और डीजल के दामों में

वृद्धि के मुद्दे पर कभी जोरदार आंदोलन करने वाली भाजपा अब इस मुद्दे पर चुप है। यह

स्पष्ट है कि इन इंधनों के दाम बढ़ने से सरकार के खाते में भी पैसे अधिक आते हैं। इसी

वजह से जनता पर यह लगातार बोझ बढ़ता ही जा रहा है। यह स्वाभाविक प्रक्रिया भी है

कि किसी भी वस्तु के उत्पादन लागत में पेट्रोल डीजल के दामों का असर होता है। ऐसे में

अब हालत यह है कि टिकाऊ उपभोक्ता सामान, पेंट और रोजमर्रा की वस्तुओं समेत सभी

श्रेणियों की कंपनियां अपने उत्पादों की कीमतें 2 से 5 फीसदी बढ़ा रही हैं क्योंकि उन पर

कच्चे माल की लागत का दबाव बढ़ रहा है। हालांकि पिछले एक महीने के दौरान पाम तेल

के दाम अपने सर्वोच्च स्तर से थोड़े नीचे आए हैं और धातुओं के दाम भी ठंडे पडऩे के

संकेत नजर आ रहे हैं, लेकिन कच्चे तेल की कीमतों में लगातार उतार-चढ़ाव बना हुआ है।

पाम तेल का इस्तेमाल साबुन बनाने में होता है। एल्युमीनियम और तांबे जैसी धातुएं

टिकाऊ उपभोक्ता सामान बनाने में काम आती हैं। कच्चे तेल से बनने वाले रसायन जैसे

टाइटिनियम डॉइऑक्साइड और लिनियर एल्काइल बेंजीन का उपयोग क्रमश: पेंट और

डिटर्जेंट बनाने में होता है।

मंहगाई का असर परिवहन लागत बढ़ने से होता ही है

कच्चे तेल से बनने वाले हाई डेंसिटी पॉलिएथीलीन का इस्तेमाल साबुन, डिटर्जेंट, बालों का

तेल, क्रीम, शैंपू और टूथपेस्ट समेत सभी आवश्यक उत्पादों की पैकजिंग सामग्री के रूप में

होता है। मंहगाई का असर यह है कि पिछले एक महीने के दौरान बेंचमार्क कच्चे तेल के

दाम सात फीसदी बढ़े हैं। पिछले तीन से छह महीने की अवधि में कच्चे तेल की कीमतों में

तेजी से बढ़ोतरी हुई है। यह पिछले तीन महीने में 17 फीसदी और पिछले छह महीने में

करीब 41 फीसदी महंगा हुआ है। एल्युमीनियम, सीसा, निकल और टिन जैसी धातुएं

पिछले तीन महीने में सात से 13 फीसदी तक और पिछले छह महीने में पांच से 55 फीसदी

तक महंगी हुई हैं। तांबा पिछले तीन महीने में सपाट रहा है, लेकिन छह महीने में 14

फीसदी चढ़ा है।

कंपनियों के लिए यह उतार-चढ़ाव कीमतों के मोर्चे पर सही नहीं है। कारोबारी सूत्रों के

मुताबिक एशियन पेंट्स जुलाई मेंं उत्पादों की कीमतें दो फीसदी तक बढ़ाएगी। यह दो

महीनों में दूसरी बढ़ोतरी होगी। इसने मई में उत्पादों के दाम करीब तीन फीसदी बढ़ाए थे।

दूसरी तरफ टिकाऊ उपभोक्ता सामान बनाने वाली कंपनियां रेफ्रिजरेटर, वाशिंग मशीन

और टेलीविजन जैसी श्रेणियों में दाम 3 से 5 फीसदी बढ़ाएंगी। गोदरेज अप्लायंसेज के

बिज़नेस हेड और कार्यकारी उपाध्यक्ष कमल नंदी ने कहा, कुछ समय से कच्चे माल की

लागत का दबाव बना हुआ है। हालांकि चालू कैलेंडर वर्ष में कई किस्तों में 10 से 12 फीसदी

कीमतें बढ़ाई गईं, लेकिन वह बढ़ोतरी पर्याप्त नहीं थीं। करीब 7 से 8 फीसदी का अंतर है,

जिसे ग्राहकों पर डालना होगा। ऐसा जुलाई से चरणबद्ध तरीके से किया जाएगा।

हर उपभोक्ता सामग्री की कीमतों में बढ़ोत्तरी की एक वजह

कुछ मुख्य कार्याधिकारियों का कहना है कि कीमतें नहीं बढ़ाना उद्यमों की सेहत के लिए

नुकसानदेह साबित हो सकता है। पैनासोनिक के अध्यक्ष और मुख्य कार्याधिकारी (भारत

एवं दक्षिण एशिया) मनीष शर्मा ने कहा, जिंस महंगाई काफी तेज है। इसके विपरीत

कीमतों में जितनी बढ़ोतरी के बारे में विचार किया जा रहा है, वह कम है। हम जितना बोझ

वहन कर सकते थे, उतना कर चुके हैं। इसका कुछ हिस्सा ग्राहकों पर डालना ही होगा।

विशेषज्ञों का कहना है कि अनलॉक के समय कीमतों में बढ़ोतरी से उपभोक्ता रुझान

बिगड़ सकता है। दूसरी तरफ कंपनियों का कहना है कि वे कीमतों के मोर्चे पर अपने

कदमों को लेकर सतर्क हैं। एफएमसीजी कंपनियों के मामले में देश की सबसे बड़ी

उपभोक्ता उत्पाद कंपनी हिंदुस्तान यूनिलीवर ने वित्त वर्ष 2022 की जून तिमाही में

साबुन, डिटर्जेंट, घरेलू उत्पादों और चाय की कीमतें बढ़ाई हैं। इससे पहले वित्त वर्ष 2021

की दिसंबर और मार्च तिमाही में भी कीमतें बढ़ाई गई थीं। मंहगाई का असर अब

राजनीतिक और सामाजिक संगठनों को भी विरोध करने पर मजबूर कर रहा है। कभी डॉ

मनमोहन सिंह को हर बात पर कोसने वाले अब चुप्पी साधकर बैठे हैं। इनमें खास तौर पर

डॉक्टरों से सीधा पंगा लेने वाले बाबा रामदेव के नाम का उल्लेख प्रासंगिक है। कुल

मिलाकर मंहगाई का असर देश की जनता को तो प्रभावित कर रहा है लेकिन पहले जो

इसकी लिए सरकार को कोसा करते थे, अब उनकी जुबान पर ताले लगे हुए हैं।

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