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डॉलफिन भी कभी बहुत बड़ा और आक्रामक जलचर हुआ करता था

  • प्राचीन काल में समुद्र में भी मौजूद थे भीमाकार प्राणी

  • दक्षिण कैरोलिना में मिला था पूरा कंकाल

  • काफी आक्रामक प्राणी था शोध से पता चला

  • बाद में दो अलग प्रजातियों में बंट गया यह

प्रतिनिधि

नईदिल्लीः डॉलफिन को हम अपने लिए बहुत प्यारा और समझदार प्राणी मानते हैं।

अनेक अवसरों पर उनके द्वारा इंसानों अथवा पानी में गिरे अन्य प्राणियों की जान बचाने

की घटनाएं भी देखी सुनी गयी है। प्रशिक्षित डॉलफिन अपने अपने आश्रय केंद्रों में अपने

शो के माध्यम से दर्शकों को आनंद देते हैं। लेकिन यह प्राणी प्राचीन काल में बहुत विशाल

हुआ करता था। उस दौरान यह पानी के अंदर का अन्यतम आक्रामक प्राणी भी था। इस

बारे में एक शोध में इन बातों का उल्लेख किया गया है। यह शोध प्रबंध करंट बॉयोलॉजी

नामक अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका में प्रकाशित भी हो चुका है।

दरअसल इस बार में शोध की गाड़ी एक काफी लंबे कंकाल की फॉसिल मिलने से प्रारंभ हुई

थी। साउथ कैरोलिना में करीब 15.7 फीट लंबा यह अवशेष पाया गया था। इससे प्रारंभिक

तौर पर यह साबित हो गया था कि प्राचीन पृथ्वी में यह प्राणी इसी इलाके का निवासी था।

इस अवशेष पर प्रारंभिक शोध से इस बात के संकेत मिले कि यह करीब 25 मिलियन वर्ष

पुराना है। जैसे जैसे इस पर शोध की गाड़ी आगे बढ़ी यह साबित होता गया कि यह कंकाल

दरअसल उस प्राचीन काल के विशाल आकार के डॉलफिन का है। बाद में उसके शरीर के

सारे ढांचों और दांत की बनावट से साफ हो गया कि यह एक भीषण तौर पर आक्रामक

प्राणी ही था। उसके दांत काफी मजबूत और हाथी के दांत जैसे थे। इसके जरिए ही वह

अपने शिकार पर जानलेवा हमला किया करता था।

डॉलफिन बाद में चलकर दो प्रजातियों में बंट गयी है

अब इसका पता चल जाने के बाद वैज्ञानिक इस कड़ी को सुलझाना चाहते हैं कि आगे

चलकर इसकी दो प्रजातियां अलग अलग क्यों हो गयी। वर्तमान में छोटे आकार के

डॉलफिन और ह्वेल की अन्य विशालकाय प्रजातियां पृथ्वी पर मौजूद हैं।

दरअसल प्राचीन काल के डॉलफिन की यह फॉसिल वर्ष 1990 में ही पायी गयी थी। लेकिन

उस वक्त इसे समझने में वैज्ञानिकों को चूक हो गयी थी। वे इसे कोई और प्राणी समझ बैठे

थे। बाद में उसके शरीर के सारे हिस्सों की अलग अलग व्याख्या की गयी तो आंकड़ों का

निष्कर्ष यही निकला कि यह दरअसल एक भीमाकार डॉलफिन है। इससे साफ हो गया है

कि इस काल के बाद ही ह्वेल प्रजाति के जलचरों में बदलाव की प्रक्रिया हुई है, जिसकी

वजह से दो अलग अलग मूल प्रजातियां अब भी दुनिया में देखी जाती है। इस शोध से जुड़े

चार्लस्टन कॉलेज के वैज्ञानिक रॉबर्ट बोयेसनेकर ने कहा कि इससे पानी में पायी जाने

वाली दोनो ह्वेल प्रजातियों के पूर्वज के एक होने की पुष्टि होती है। इसलिए वैज्ञानिकों के

लिए यह एक बड़ा सवाल है कि आखिर एक ही पूर्वज से दो अलग अलग किस्म की

प्रजातियों का विकास क्यों और कैसे हुआ। साथ ही इस रहस्य को भी समझा जाना शेष है

कि इस विशाल आकार के डॉलफिन आखिर समुद्र से पूरी तरह गायब क्यों हो गये।

जल से जीवन की उत्पत्ति स्थापित तथ्य है

इसका पता चलने पर बीच के दौर में पृथ्वी में क्या कुछ घटित हुआ था अथवा प्राणियों के

क्रमिक विकास के बारे में कुछ नई जानकारी भी मिल सकती है। इतना तो पहले से ही पता

है कि पृथ्वी पर जीवन का विकास जल के बाद ही हुआ था। इसलिए पानी से ही जीवन

निकल कर जमीन पर आया था। अब पानी के जीवन में लगातार क्या कुछ बदलाव हुए हैं

और कैसे हुए हैं, उसके आधार पर पृथ्वी पर जीवन कैसे आगे बढ़ा है, इसके बारे में

वैज्ञानिक एक एक कर सारी कड़ियों को जोड़ने के क्रमिक अभियान में लगे हुए हैं। इसलिए

शोध से जुड़े वैज्ञानिक इस किस्म के अन्य अवशेषों पर भी नये सिरे से अनुसंधान की

वकालत कर रहे हैं ताकि अगर पहले के शोध में कई विषय छूट गया हो तो उसकी समीक्षा

कर अन्य कड़ियों को भी इस शोध में जोड़ा जा सके।

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