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दुनिया में मौसम के बदलाव से पहले भी विलुप्त हुई थी कई मानव प्रजातियां

  • पहले भी इंसानी प्रजाति मौसम के बदलाव से विलुप्त हुई है

  •  खुद को मौसम के हिसाब से बदल नहीं पायी प्रजातियां

  •  फॉसिल्स के नमूनों का भी वैज्ञानिक परीक्षण किया गया

  •  वर्तमान दौर के लिए खतरनाक संकेत है यह बदलाव

राष्ट्रीय खबर

रांचीः दुनिया में पहले भी इंसानी प्रजाति इसी मौसम के बदलाव की वजह से विलुप्त हो

गयी है। इसलिए अब जो बदलाव तेजी से नजर आने लगा है वह भी आने वाले दिनों में

इंसान के लिए ही सबसे बड़ा खतरा बन सकता है। विश्व में जीवन की उत्पत्ति से लेकर

आज के दौर के इंसान के विकास तक अनेक घटनाक्रम हुए हैं। इंसानों की वर्तमान प्रजाति

के विकास का भी एक क्रमिक चरण रहा है। इसके पहले की इंसानी प्रजाति क्यों दुनिया से

गायब हो गयी, इसकी खोज में मौसम के बदलाव का कारण वैज्ञानिकों की समझ में आता

है। अभी भी दुनिया फिर से उसी दौर से गुजर रही है। फर्क सिर्फ इतना है कि प्राचीन काल

के मुकाबले अभी का हमारा विज्ञान और मेडिकल साइंस बहुत विकसित है। इस वजह से

वैज्ञानिक दुनिया में घटित होने वाली छोटी छोटी घटनाओं की गंभीरता को बेहतर तरीके

से समझ पा रहे हैं।

प्राचीन पृथ्वी की बात करें तो विशाल उल्कापिंड के गिरने से पलक झपकते ही डायनासोर

काल की समाप्ति के बाद इंसान का क्रमिक विकास हुआ था। दुनिया में मिले अवशेषों

और अन्य विज्ञान सम्मत साक्ष्यों के आधार पर छह किस्म की इंसानी प्रजाति इस दुनिया

में विकसित हुई थी।

दुनिया में पहले के इंसानों की जेनेटिक संरचना भिन्न थी

प्रारंभिक काल के इंसान से हमारी संरचना में बहुत कुछ बदलाव आये हैं। शारीरिक

संरचना के अलावा जेनेटिक तौर पर भी पहले के इंसान से काफी कुछ बदला है। इस बारे में

जब वैज्ञानिकों ने अनुसंधान किया तो यह बात सामने आयी कि इंसान की छह अलग

अलग प्रजातियों में मौसम के बदलाव यानी पर्यावरण असंतुलन का प्रभाव पड़ा था। इस

बात को प्रमाणित करने के लिए शोधकर्ताओं ने पंद्रह अलग अलग मॉडल तैयार किये और

प्राचीन पृथ्वी के मौसम की स्थिति से इंसानों पर पड़ने वाले प्रभावों का अध्ययन किया।

इंसानों की मूल प्रजाति यानी होमो सैपियंस के अलग अलग खंडों में इसका असर

एक जैसा ही पाया गया है। यहां तक कि प्राचीन इंसानों के फॉसिल्स में भी इस शोध को

परखा गया है, जो सही साबित होता है। उस दौरान के सभी प्रजाति के इंसान मौसम के

बदलाव के दौरान अपन अंदर बदलाव नहीं कर सके और मौसम की मार के शिकार हो

गये। इनमें वे प्रजातियां भी शामिल हैं जो विकसित होने के दौर में आग का इस्तेमाल

करने तथा पत्थर से बने औजारों का प्रयोग करना सीख गये थे। खासकर ऐसी प्रजाति में

नियनडरथाल्स भी थे, जो अपने तरीके से कपड़ा भी पहनने लगे थे। उनका यह पोशाक पेड़

की छाल अथवा पशु के चमड़े की होती थी जो ठंड से बचाव करने में सक्षम थी। इस शोध से

जुड़े नेपोल विश्वविद्यालय नेपोली के पास्कल राइया कहते हैं कि इस काल में मौसम के

बदलाव की मार को झेलने के दौरान ही अलग अलग प्रजाति के इंसानों के बीच संपर्क होने

लगा था। इस मिश्र प्रजाति का विकास हो रहा था। इस दौर में भी इंसानों से खुद को मौसम

के बदलाव से बचाने का भरसक प्रयास किया था लेकिन वे असफल रहे थे।

शोध में प्राचीन मानव प्रजाति के नमूनों की भी जांच हुई है

शोध में हाविलिस, इर्गास्टर, इलेक्टस, हेइडलबरजेनिस, नियनडरथाल्स और सैपियंस भी

थे। सभी पर मौसम के बदलाव का कहर एक जैसा टूट पड़ा था। अपनी बात को परखने के

लिए वैज्ञानिकों ने 2750 से अधिक फॉसिल्स के नमूनों की जांच भी की है। इस दौर में कई

बार पृथ्वी का मौसम अत्यधिक तेजी से बदला था, जिसे इंसानों की प्रजाति के अलावा भी

उस कालखंड में मौजूद कई अन्य जीव नहीं झेल पाये और अंततः विलुप्त हो गये।

वैज्ञानिकों की चिंता इसलिए अधिक है क्योंकि हाल के दिनों में पृथ्वी पर मौसम के

बदलाव का कुछ वैसा ही नजारा नजर आने लगा है। समुद्री प्रवाल के कई बड़े इलाकों के

पूरी तरह तबाह होने की वजह से ऐसा समझा जा रहा है कि समुद्र का पानी गर्म हो रहा है।

इससे ग्लेशियरों के पिघलने की गति तेज हो रही है। समुद्र में ग्लेशियर के बर्फ के पिघलने

से जो अधिक पानी आ रहा है वह भाप बनकर दूसरे किस्म की बेमौसम बरसात की

परिस्थितियां पैदा कर रहा है। यह सारा कुछ मौसम के बदलाव से मानव जाति के

प्रभावित होने की कड़ी में महत्वपूर्ण मोड़ हैं।


 

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