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सीआईए ने अपनी एक अति गोपनीय रिपोर्ट में इसका उल्लेख किया







वाशिंगटन: सीआईए ने अपनी अति गोपनीय रिपोर्ट में किया खुलासा अफगानिस्तान में तालिबानी

कब्जा के बाद के घटनाक्रमों से अमेरिकी गुप्तचर संस्था चिंतित है। सीआईए ने अपनी एक अति

गोपनीय रिपोर्ट में इसका उल्लेख किया गया। दुनिया भर में स्थापित सीआईए के तमाम कार्यालयों

को इस बारे में निर्देश भेजे गये हैं। इसमें कहा गया है कि खास तौर पर वैसे लोग, जो दूसरे देशों के

नागरिक हैं और सीआईए के लिए काम करते हैं, उनकी पहचान से संबंधित सारी सूचनाएं इंटरनेट से

हटा दी जाए। सीआईए के मुताबिक हाल के दिनों में अनेक देशों में उसके ऐसे जासूसो की हत्या हुई

है, जिनकी पहचान अब तक अज्ञात थी। दूसरी तरफ चर्चा है कि काफी एहतियात बरतने के बाद भी

अमेरिकी सरकार अफगानिस्तान से अपनी सेना हटाने के दौरान अपने समर्थकों की पूरी सूची को

समाप्त नहीं कर पायी थी। इसी वजह से अब कंप्यूटरों में दर्ज आंकड़ों को खंगालते हुए तालिबान

उन चेहरों की पहचान कर रहा है जो अमेरिका के लिए काम करते रहे हैं। इनमें से अधिकांश वैसे

दुभाषिये हैं, जिन्हें अमेरिका ने अफगानिस्तान में काम करने के लिए बहाल किया था। वैसे उनके

अलावा कुछ अन्य लोग भी थे जो दरअसल अमेरिका के लिए जासूसी का ही काम करते थे। वैसे

अफगानिस्तान में तालिबानी शासन के बाद भी अन्य देशों में कार्यरत सीआईए के जासूसों का

रहस्य दूसरों को कैसे हुआ, इस बात ने अमेरिकी एजेंसियों को सतर्क कर दिया है। दुनिया भर में फैले

सीआईए के दफ्तरों में भेजे गये एक अति गोपनीय संदेश में इस बारे में सबसे अधिक सतर्कता

बरतने की हिदायत दी गयी ह ।

सीआईए ने के जासूसों की पहचान खुलने लगी 

सीआईए ने  पिछेल कुछ समय से यानी अफगानिस्तान में तालिबानी कब्जे के पहले से भी अन्य

देशों में सीआईएके जासूसों की पहचान खुलने लगी है। अन्य विरोधी देशों के द्वारा ऐसे जासूसो की

हत्या किये जाने की घटना से सीआईए मुख्यालय न सिर्फ चिंतित हैं बल्कि किस माध्यम से यह

सूचनाए विरोधियों तक पहुंच रही है, उस बारे में गोपनीय जांच भी कर रहा है। अब तक दुनिया भर

में ऐसे एक दर्जन से अधिक जासूस मारे गये हैं। सीआईएकी गोपनीय रिपोर्ट में इस बात का हवाला

दिया गया है कि रुस और चीन की जासूसी एजेंसियां पहले से ही सीआईए के खिलाफ काम करती

रही है। अब ईरान और पाकिस्तान को भी इसमें जोड़ दिया गया है। अफगानिस्तान में तालिबानी

कब्जे के बाद से ही पाकिस्तानी सक्रियता के बारे में सीआईएखास तौर पर सतर्क हुआ है जबकि पूर्व

में इसी अमेरिकी एजेंसी को पाकिस्तानी सेना का पूर्ण समर्थन प्राप्त हुआ करता था।

 



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