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शीर्ष अदालत की कमेटी से मान के हटने के मायने

शीर्ष अदालत ने किसान आंदोलन से जुड़े मसलों पर अपनी जानकार के लिए एक कमेटी

का गठन किया है। इस कमेटी में जो सदस्य शामिल किये गये थे, उनमें से एक भूपिंदर

सिंह मान इससे अलग होने का एलान कर चुके हैं। लेकिन कमेटी में शामिल किये जाने के

पूर्व ही वह केंद्र सरकार के कृषि कानूनों का समर्थन कर चुके थे। इसलिए किसानों ने इस

कमेटी में सिर्फ सरकार के कृषि कानून का समर्थन करने वालों को सदस्य बनाये जाने का

विरोध करते हुए इस कमेटी के सामने अपना पक्ष रखने से इंकार कर दिया है। लेकिन

भूपिंदर सिंह मान के इस कमेटी से अलग होने के पहले ही भारतीय किसान यूनियन और

अखिल भारतीय किसान समन्वय समिति से श्री मान को पद से हटा दिया गया था। खुद

को सुप्रीम कोर्ट की कमेटी से अलग करने के बाद श्री मान ने कहा कि वह पंजाब और

किसानों के साथ खड़े हैं। मान का यह फैसला आंदोलित किसानों और केंद्र के बीच नौवें

दौर की वार्ता से एक दिन पहले आया है। मान ने अपने बयान में कहा कि वह किसानों के

हितों से समझौता रोकने के लिए किसी भी पद का त्याग करने को तैयार हैं क्योंकि

किसान संगठनों और राजनीतिक दलों ने समिति के सदस्यों पर संदेह जताया है। मान के

कदम का स्वागत करते हुए आंदोलनरत किसानों ने कहा कि यह उनके आंदोलन की

नैतिक जीत है। उन्होंने मान को अन्य किसानों के साथ आंदोलन में शामिल होने के लिए

आमंत्रित किया है। भारतीय किसान यूनियन के अध्यक्ष राकेश टिकैत ने कहा, ‘यह

आंदोलनरत किसानों की नैतिक जीत है और हम मान को आंदोलन में शामिल होने को

आमंत्रित करते हैं।’

शीर्ष अदालत की कमेटी के सदस्यों पर पहले से सवाल

आंदोलन में हिस्सा ले रहे समूहों में से एक जय किसान आंदोलन के संस्थापक योगेंद्र

यादव ने चार सदस्यीय समिति के एक अन्य सदस्य- प्रख्यात कृषि अर्थशास्त्री अशोक

गुलाटी को इस्तीफा देने का आग्रह किया। यादव ने कहा कि वह उस मैच में अंपायर नहीं

हो सकते, जिसमें वह एक खिलाड़ी के रूप में हिस्सा ले चुके हैं। यादव ने एक ट्वीट में कहा,

हम असहमति के लिए सहमत हो सकते हैं। लेकिन मुझे उम्मीद है कि वह (गुलाटी) इस

बात से सहमत होंगे कि वह उस मैच में अंपायर नहीं हो सकते, जिसमें वह खिलाड़ी के रूप

में भाग ले चुके हैं। शीर्ष अदालत ने मंगलवार को अगले आदेश तक तीन कृषि कानूनों को

लागू करने पर रोक लगा दी। अदालत ने एक समिति के गठन की घोषणा की है, जो

किसानों की शिकायतें और सरकार की राय जानेगी। भूपिंदर मान और अशोक गुलाटी के

अलावा शेतकरी संघटना (महाराष्ट्र) के अध्यक्ष अनिल घनावत और इंटरनैशनल फूड

पॉलिसी रिसर्च इस्टीट्यूट के प्रमोद कुमार जोशी समिति के अन्य दो सदस्य हैं। मान के

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा गठित समिति से हटने की घोषणा उस दिन हुई है, जब उनके

संगठन की राज्य इकाई ने खुद को उनसे दूर करने का फैसला लिया। बीकेयू (पंजाब) के

अध्यक्ष बलदेव सिंह मियांपुर ने कहा, हमने खुद को मान से अलग करने का फैसला

इसलिए किया क्योंकि उन्होंने समिति के एक सदस्य के रूप में काम करने को लेकर हमसे

विचार-विमर्श नहीं किया। इसलिए ऐसा समझा जा रहा है कि आंदोलन के अगले चरण

यानी 26 जनवरी के ट्रैक्टर परेड से पहले ही सरकार और सुप्रीम कोर्ट की तरफ से भी कोई

निर्देश जारी हो सकता है।

किसान आंदोलन का सबसे लंबा इतिहास रच गया इस बार

देश के इतिहास में इतना लंबा और बड़ा किसान आंदोलन इससे पहले कभी नहीं हुआ था।

साथ ही इतने संगठित और अनुशासित तरीके से कोई आंदोलन भी जारी नहीं रह पाया है।

आंदोलन के पूरी तरह शांतिपूर्ण होने की वजह से ही किसी अन्य पक्ष को विधि व्यवस्था

का सवाल खड़ा करने का अवसर नहीं मिल पा रहा है। दूसरी तरफ अब पंजाब और

हरियाणा के गांवों भाजपा के नेताओं का चलना दूभर होने की वजह से पार्टी के अंदर से भी

दबाव की स्थिति बन रही है। हरियाणा मे सरकार में साझेदार दल के अंदर भी इस मुद्दे पर

भीषण विरोध की स्थिति है। भाजपा और केंद्र सरकार के लिए किसान आंदोलन के साथ

साथ इन मोर्चों को संभालना भी प्राथमिकता के विषय बन चुके हैं। किसान दिल्ली की

सीमाओं पर कई सप्ताह से डेरा डाले हुए हैं। उनकी मांग है कि कृषि कानून रद्द किए जाएं

और फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमसपी) की कानूनी गारंटी दी जाए। इस बीच पूर्व

कृषि मंत्री शरद पवार ने कहा कि नए कृषि कानूनों पर गतिरोध खत्म करने के लिए

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा गठित समिति में सही मायनों में स्वतंत्र लोगों को शामिल किया

जाना चाहिए। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने भी कहा कि देर-सबेर केंद्र को इन कानूनों को

वापस लेना होगा और यह किसानों की बड़ी जीत होगी।

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