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राज्यों को कृषि मसले सुलझाने को छोड़ क्यों नहीं देती केंद्र सरकार

राज्यों को अपने अपने इलाके में कृषि मुद्दों को सम्मानजनक तरीके से हल करने की

जिम्मेदारी भी केंद्र सरकार छोड़ सकती है। वैसे भी कृषि दरअसल राज्य सूची का ही एक

विषय है। वर्तमान में तीन कृषि कानूनों पर टकराव की वजह से जो परिस्थितियां उत्पन्न

हुई है, वह देश के लिए अभूतपूर्व परिस्थिति है। वैसे इस बात पर भी पूरे देश को गौर करना

चाहिए कि स्वर्गीय महेंद्र सिंह टिकैत के किसान आंदोलन के बाद यह दूसरा अवसर है

जबकि ऐसी विकट स्थिति उत्पन्न हुई है। वैसे तुलनात्मक तौर पर मान लें कि किसान

आंदोलन का यह स्वरुप पूर्व के किसान आंदोलन से कहीं अधिक बड़ा और प्रभावी है। इस

आंदोलन ने कृषि के संबंध में जो बुनियादी सवाल खड़े कर दिये हैं, उसके मुताबिक केंद्र

सरकार को सिर्फ किसानों को ही नहीं बल्कि देश की जनता को भी इस मुद्दे पर जवाब देना

पड़ रहा है। अगर ऐसी स्थिति नहीं होती तो केंद्र के सारे मंत्री बार बार मीडिया से न तो

मुखातिब होते और न ही प्रधानमंत्री के हर भाषण में किसानों का जिक्र ही होता। अब

केंद्रीय स्तर पर इस कृषि के विषय पर गौर करें तो हम पाते हैं कि बजट में इसके लिए

आवंटन भी तमाम विभागों से अधिक होता है। वर्ष 2020 में कृषि मंत्रालय को बजट में

1.42 लाख करोड़ रुपये आवंटित किए गए थे। संसद पर कृषि संबंधी मुद्दों से बहुत फर्क

नहीं पड़ता है क्योंकि कृषि से जुड़े असली मसले इतने स्थानीय होते हैं कि अधिकांशत:

उनका निपटारा वहीं हो जाता है और राज्य विधानसभाओं में ही उन्हें सुलझा लिया जाता

है।

राज्यों को पहले से भी इन समस्याओं को निपटाना पड़ता रहा है

यह भी नहीं समझा जाता है कि यह मंत्रालय न तो वित्त या वाणिज्य मंत्रालय की तरह

विशुद्ध रूप से अर्थशास्त्र पर केंद्रित मंत्रालय है और न ही गृह मंत्रालय की तरह विशुद्ध रूप

से राजनीति पर ही केंद्रित है। असल में यह मंत्रालय सत्ता में बैठी सरकार की किसानों को

लेकर अधिक फिक्रमंद होने वाली छवि का निर्माण करने में ही लगा रहता है। लेकिन

असल में ऐसा हुआ नहीं है। सच है कि कृषि उत्पादन कई गुना बढ़ा है। लेकिन यह अभी

तक असंतुलित ढंग से ही बढ़ा है। इस दौरान किसान तो गरीब ही बना हुआ है। इसकी

वजह यह है कि प्रति एकड़ औसत आय शायद ही 20,000 रुपये से अधिक होती है और

करीब 10 करोड़ परिवारों के पास महज 2-3 एकड़ कृषि-योग्य जमीन ही है। लिहाजा एक

संशयग्रस्त एवं दुविधा के शिकार मंत्रालय के तौर पर कृषि मंत्रालय को मात दे पाना

मुश्किल है। फिर भी यह मंत्रालय 1947 से ही वजूद में बना हुआ है।

एक अहम कारण है कि इस मंत्रालय द्वारा खर्च किए जाने वाले भारी-भरकम खर्च पर

संसद में सवालों के जवाब देने के लिए एक मंत्री की दरकार है। लेकिन दूसरा अहम कारण

क्या है? शायद इसका जवाब कोई नहीं जानता है। इससे भी बुरा यह है कि कोई भी इसकी

फिक्र नहीं करता है।

कृषि संबंधी केंद्रीय ढांचा प्रारंभ से विकेंद्रित ही रहा है

ऐसी स्थिति में क्या करना है? कम-से-कम इस मंत्रालय का पुनर्गठन कर आकार में

कटौती तो की ही जानी चाहिए। अगर इस प्रस्ताव को सिद्धांत रूप में स्वीकार किया जाता

है तो प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) इसे बेहतर ढंग से अंजाम देने के लिए एक निगरानी

समिति बना सकता है। इसकी शुरुआत इस बात को साफ तौर पर स्वीकार कर की जा

सकती है कि कृषि संबंधी समस्याओं का निपटारा सिर्फ राज्यों को दिये जाने से समस्या

और समाधान का बेहतर विकेंद्रीकरण हो सकता है। सभी राज्य ही यह काम सही तरीके से

कर सकते हैं क्योंकि वे इसके लिए सबसे अच्छी स्थिति में होते हैं।

हमारे संविधान-निर्माताओं ने भी यही सोचा था। उन्होंने कृषि को राज्य सूची का विषय

बनाया लेकिन इसे समवर्ती सूची में भी जगह दी गई थी। कृषि कानूनों में बदलाव को

लेकर जारी तनातनी इस बात का माकूल उदाहरण है कि गलत एजेंसी किस तरह सही

काम कर रही है? इस तरह, फसलों के समर्थन मूल्य का निर्धारण राज्य सरकारों पर छोड़

दिया जाना चाहिए। पंजाब इसका माकूल उदाहरण है। वहां पर पानी के पूरी तरह या

लगभग मुफ्त होने से किसान अपनी जमीन के लिए पूरी तरह मुफीद नहीं रहने वाली

फसलें भी उगाने लगे हैं। पंजाब के कृषक परिवार की औसत आय भारत में सबसे अधिक

है। असल में देश के भीतर एक औसत कृषक परिवार की आय से पंजाब के किसान की

आय लगभग ढाई गुनी है।

किसानों की आर्थिक असमानता के अनेक उदाहरण मौजूद हैं

इस असमानता से बचने का केवल एक तरीका है। राज्यों को वह काम खुलकर करने दें

जिनके लिए वे सक्षम हैं। और अगर वे इन नीतियों को लागू करने पर आमादा रहते हैं तो

उन्हें इनकी खामियों का खामियाजा खुद ही भुगतने दें।

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