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दस हजार लोगों की हत्या की गयी थी स्टटथोफ यातना शिविर में

  • 95 वर्षीय नाजी महिला अब जर्मनी की जेल जाएंगी

  • नाजी कैंप की सचिव थी हिटलर के काल में

  • फिलहाल पौलेंड की वृद्धाश्रम में रहती हैं वह

  • नाजी यातना के दौरान 17 साल की थी वह

विशेष प्रतिनिधि

हैमबर्गः दस हजार लोगों की हत्या के लिए जिम्मेदार ठहरायी गयी एक वृद्धा को जर्मनी के

जेल में भेजने की तैयारी हो रही है। वह फिलहाल यहां के एक वृद्धाश्रम में रहती हैं। उनकी

उम्र 95 वर्ष है। उस पर आरोप है कि अपने युवावस्था में वह स्टटथोफ यातना शिविर की

प्रभारी सचिव थी। इस शिविर में दस हजार लोगों की हत्या का आरोप उसी पर लगा है।

उसके खिलाफ जर्मनी की अदालत में नाजियों की मदद करने का मुकदमा चलाया गया है।

नाजियों द्वारा स्थापित यह यातना शिविर पौलेंड के इलाके में था। इस यातना शिविर को

अब सरकार ने एक संग्रहालय के तौर पर तब्दील कर दिया है। इस म्युजियम में दूसरे

विश्वयुद्ध के पहले नाजियों द्वारा किये गये अत्याचार के साक्ष्यों को संजोकर रखा गया है।

जिसे देखने हर साल हजारों लोग आते हैं और नाजियों के अत्याचार की कहानी को

समझकर लौटते हैं। जिस वृद्धा को अब जर्मनी भेजने की तैयारी हो रही है, उसके बारे में

आधिकारिक तौर पर कोई विशेष जानकारी नहीं दी गयी है। दूसरी तरफ स्थानीय मीडिया

ने इस महिला की पहचान इरगमार्ड एफ के तौर पर की है। जो जर्मनी के कब्जे वाली पौलेंड

के इलाके में यातना शिविर की प्रभारी सचिव थी। यह इलाका पौलेंड के डांस्क के करीब है।

अदालत में चल रही प्रक्रिया के बारे में जो कुछ जानकारी यहां तक पहुंची हैं, उसके

मुताबिक उस महिला ने अपने प्रभार के दिनों में जर्मनी के नाजी कैंप का संचालन करते

हुए यहूदियों के साथ साथ पौलेंड के नागरिकों के अलावा सोवियत रूक के कैदियों को भी

इस याचना शिविर में मौत के घाट उतारा था। मात्र 17 साल की आयु में वह इस यातना

शिविर के कैंप कमांडर की सचिव और स्टेनोग्राफर थी।

दस हजार लोगों की हत्या का यह शिविर अब म्युजियम है

जून 1943 से 1945 तक उसके इस यातना शिविर से सीधे तौर पर जुड़े रहने के प्रमाण

मिले हैं। सरकारी बयान में बताया गया है कि महिला पर 10 हजार से अधिक लोगों की

हत्या के मामलों में मदद करने और उनके अपहरण का आरोप है। वैसे यह भी बताया गया

है कि इस यातना शिविर में लोगों को लगातार मार डालने की साजिशों के बाद भी अनेक

लोग वहां से बच निकलने में कामयाब हो गये थे। वहां से बचकर निकलने वाले लोगों से ही

इस महिला के बारे में जानकारी मिली और काफी समय से उसकी तलाश चल रही थी।

अभियोजकों के प्रवक्ता पीटर मुलर-रोको ने कहा, जांचकर्ताओं ने एक बहुत विस्तृत जांच

की थी, जिसमें अमेरिका और इजरायल में रहने वाले गवाहों के इंटरव्यू शामिल थे। जर्मनी

में नाजी लोगों की मदद करने वाले जीवित बचे लोगों को अब सजा दी जा रही है। इतिहास

के पन्नों में दर्ज साक्ष्यों के आधार पर नाजी अत्याचार का अंत होने के बाद अपने लोग

अपनी पहचान बदलकर दूसरे देशों में जाकर छिप गये थे।

दूसरे देश में छिपे नाजियों की तलाश अब भी जारी है

लगातार ऐसे लोगों की तलाश का काम जारी है। इसी क्रम में वर्ष 2011 में एक जॉन

डेमजानजुक नामक व्यक्ति को सजा दी गई थी, जिस पर आरोप था कि उसने नाजियों की

यहूदियों की हत्या करने में मदद की थी। तब से, अदालत ने इस तरह के मामलों के

जीवित बचे आरोपियों को सजा दी है। हाल ही में कोर्ट ने 93 वर्षी ब्रूनो डे को नाजी कैंप का

गार्ड होने की सजा देते हुए दो साल कैद में रहने की सजा सुनाई है। डे ने होलोकॉस्ट के बचे

हुए लोगों से माफी भी मांगी है. याद दिला दें कि उस दौर में हिटलर की अगुवायी में

यहूदियों के खिलाफ जारी हुआ आंदोलन अंततः नाजी अत्याचार में बदल गया था। इस

दौर में करीब 60 लाख यहूदियों को मौत के घाट उतार दिया था।

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