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दस रुपये का सबसे सस्ता सुरक्षित मास्क बनाया

  • आम आदमी की जेब भी नहीं कटेगी

  • कोई भी इसे अपने हिसाब से बना लेगा

  • अंतरिक्ष वैज्ञानिकों का देश को तोहफा

  • खादी के प्रति वैज्ञानिकों की आस्था का प्रमाण

प्रतिनिधि

नईदिल्लीः दस रुपये का सबसे सस्ता और सुरक्षित मास्क देश की जरूरतों और आर्थिक

स्थिति को देखते हुए बाजार में आने जा रहा है। इसे विक्रम साराभाई स्पेस रिसर्च सेंटर के

वैज्ञानिकों ने तैयार कर लिया है। भारत के अन्यतम श्रेष्ठ अंतरिक्ष अनुसंधान केंद्र को दो

वैज्ञानिकों अनिता एस और पी वेणुप्रसाद ने इसे तैयार किया है। हर तरीके से इसका

परीक्षण भी कर लिया गया है। उसके बाद ही इस मास्क को कोरोना संक्रमण से बचाव के

लिहाज से सुरक्षित माना गया है। इसे तैयार करते वक्त वैज्ञानिकों ने 130 करोड़ की

भारतीय आबादी और कोरोना लॉक डाउन की वजह से देश के लोगों की आर्थिक स्थिति को

ध्यान में रखा था। इसके तहत ही पूरी डिजाइन कुछ इस तरीके से बनायी गयी ताकि

इसकी कीमत सबसे कम हो और यह वाकई लोगों का बचाव भी कर सके। इसके उत्पादन

पर सिर्फ दस रुपये ही खर्च आ रहा है। इसलिए इसे फिलहाल दुनिया का सबसे सस्ता और

सुरक्षित कोरोना संक्रमण से बचाव करने वाला मास्क माना जा सकता है।

इसकी लागत इतनी कम यानी मात्र दस रुपये के लिए भी वैज्ञानिकों ने पूरी माथापच्ची की

है। इसके तहत अन्य तमाम कपड़ों को दरकिनार करते हुए इसमें खादी का प्रयोग किया

गया है। इसके जरिए इन वैज्ञानिकों ने लंबे समय तक के लिए खादी के कपड़ों के लिए एक

नया अवसर भी खोल दिया है। जाहिर है कि अब इन सबसे सस्ते दस रुपये के मास्क के

उत्पादन के लिए भी खादी के कपड़ों की अतिरिक्त मांग होगी।

दस रुपये का मास्क भी खादी की मांग बढ़ायेगा

इसके बन जाने और परीक्षण हो जाने के बाद ही इसके बारे में विस्तार से जानकारी दी

गयी है। वैज्ञानिकों ने बताया है कि दरअसल यह मास्क दो हिस्सों का है, जिन्हें सुरक्षित

तरीके से आपस में जोड़ा गया है। इस दस रुपये के मास्क का ऊपरी हिस्सा नाक के लिए

है। नीचे वाले हिस्से को मुंह के हिसाब से बनाया गया है। दोनों को इस तरीके से जोड़ा गया

है कि संक्रमण से बचाव हो और दोनों अंगों की जरूरतों के हिसाब से यह मास्क सही काम

कर सके। वर्तमान एन 95 मास्क की तुलना में भी इसका विधिवत परीक्षण किया जा चुका

है। इसके बन जाने के बाद वैज्ञानिकों ने पूरी प्रक्रिया पर ध्यान देते हुए इसकी डिजाइन को

अंतिम रुप दिया है। दरअसल नाक और मुंह की हवा के आने जाने का मार्ग अलग अलग

होने के अलावा दोनों की भूमिका भी अलग अलग होती है। इसीलिए नाक के लिए अलग

और मुंह के लिए अलग हिस्सा बनाया गया है। नाक के ठीक ऊपर से बैठने वाला मास्क

इन दोनों किस्म के हवा को अलग अलग नियंत्रित करता है और दोनों को कुछ इस तरीके

से जोड़ा गया है कि संक्रमण के ड्रापलेट इसके बीच से इंसान को संक्रमित नहीं कर सकते।

दस रुपये के इस मास्क की डिजाइन में नाक वाले हिस्से को मजबूती देने के लिए इस पर

तार लगाये गये हैं। तार का यह हिस्सा नाक के ऊपरी भाग कर बैठता है और यह तार

कपड़े के बीच होने की वजह से पहनने में परेशानी भी नहीं होती।

तीन सतहों पर रोक देगा सारे संक्रमण

इस मास्क पर संक्रमण रोकने के लिए तीन सतह भी लगाये गये हैं। इन तीन सतहों के

बीच में फिल्टर है जो किसी संक्रमण को अपने से आगे नहीं बढ़ने देता है। साथ ही इसमें

एक बदलने लायक कार्टिज भी लगाया गया है, जिसमें आवश्यकता के मुताबिक

आर्युर्वेदिक तेल भी रखा जा सकता है तो नाक के लिए है लेकिन अगर कोई चाहे तो इसे

नहीं भी लगा सकता है। मास्क को अलग अलग चेहरों के लिए भी बनाया गया है। गंदा

होने पर इसे साबुन से दो लेने के बाद उसे फिर से इस्तेमाल किया जा सकता है जबकि

नाम के लिए लगाये गये फिल्टर कार्टिज में खुशबू भी भरा जा सकता है।

बाजार में अभी धड़ल्ले से बिक रहे मास्कों में से अधिकांश चेहरों पर ठीक ढंग से नहीं

बैठते। इसी वजह से लोगों को ऐसे मास्क पहनने में भी दिक्कत होती है। इसमें कान के

पिछले हिस्से पर टंगने वाली डोरी को भी कम या ज्यादा करने की सुविधा है।

वैज्ञानिक वेणुप्रसाद ने कहा कि इसे कुछ इस तरीके से तैयार किया गया है कि कोई

सामान्य दर्जी भी इसे सीलकर तैयार कर सकता है और तब भी उसकी लागत उतनी ही

रहती है। दरअसल इसकी डिजाइन तैयार करते वक्त हमेशा यह ध्यान में रखा गया था कि

यह आम भारतीय की जरूरतों के हिसाब से बने। अभी कोरोना संकट के जारी रहने के

दौरान लोगों को लंबे समय तक मास्क की जरूरत पड़ने वाली है। ऐसे में दस रुपये का

मास्क भी हर व्यक्ति को काफी पैसे की बचत देगा।

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