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बिना बिजली के भी तापमान कम करने की विधि विकसित

  • सिर्फ एक खास पर्त से होता है काम
  • इस तकनीक में घूमने वाला कोई यंत्र नहीं
  • निर्माण में किफायती और इस्तेमाल में काफी सरल
  • चिली के तपते रेगिस्तान में कम किया 13 डिग्री तापमान
प्रतिनिधि

नईदिल्लीः बिना बिजली के किसी भी उपकरण को ठंडा करने के बारे में अब

तक हम सोच भी नहीं सकते थे। अब वैसी तकनीक आयी है, जिसकी वजह से

चमकती धूप में रखा यंत्र भी किसी भी सामान को ठंडा करने में प्रमुख भूमिका

निभायेगी। परीक्षण में इस पद्धति से करीब 23 डिग्री फॉरेटहाइट तक तापमान

में कमी करने में सफलता पायी गयी है।

चिली देश और एमआइटी के विशेषज्ञों ने इस विधि को विकसित किया है।

इस विधि के सफल होने के बाद ऐसा माना जा रहा है कि इसके व्यापक

इस्तेमाल से दुनिया में ग्रीन हाउस गैसों को उत्सर्जन में उल्लेखनीय कमी आ

सकती है। वर्तमान में तापमान कम करने के बिजली चालित तमाम संयंत्रों से

इस गैस का सबसे अधिक उत्सर्जन होता है।

इस यंत्र के बारे में वैज्ञानिकों ने साफ कर दिया है कि इस पूरे यंत्र में कोई भी

ऐसा हिस्सा नहीं है जो घूमता हो। इसलिए किसी भी हिस्से को घूमाने के

लिए लगने वाली ऊर्जा की जरूरत नहीं पड़ती। यह सूर्य की रोशनी से

मिलने वाली ऊर्जा को अपने काम में लगाता है। इसलिए यह बिना बिजली

के संचालित होने वाले उपकरणों की श्रेणी में है।

दरअसल इस विधि में सूर्य की रोशनी में शामिल इन्फ्रा रेड किरणों को

लौटा दिया जाता है। इसी किरण में सबसे अधिक गरमी होती है।

चूंकि यह रोशनी अंदर नहीं आ पाती और वापस वातावरण होते हुए

अंतरिक्ष में चली जाती है, इसलिए यह यंत्र अंदर के हिस्से के ठंडा करने

लगता है। परीक्षण में बिना बिजली के भी इसे काफी कम तापमान पर

लाने में शोधकर्ताओं को सफलता मिली है।

बिना बिजली का सफल प्रयोग सिर्फ पतली सी पर्त से

इसे बनाने के लिए वैज्ञानिकों ने साधारण किस्म के एक पर्त का इस्तेमाल

किया है। पोलिइथाइलेन के फेन से बने इस पर्त को एयरोजेल कहा जाता है।

यह वजन में भी अत्यंत हल्का है। यह पर्त अपने अंदर की किसी भी चीज

को गर्म नहीं होने देता। सूर्य की रोशनी की इंफ्रा रेड किरणों को यह लगातार

परावर्तित करता रहता है। इससे अंदर का तापमान कम होता चला जाता है।

इसे तैयार करने में एमआइटी और चिली के पोंटिफकल कैथोलिक

विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने मिलकर काम किया है।

इसके बारे में वैज्ञानिक पत्रिका जर्नल साइंस एडवांसेज में जानकारी दी

गयी है। एमआइटी के शोध दल का नेतृत्व एवलिन वांग कर रहे थे।

उनके साथ सात अन्य लोगों ने इस परियोजना पर काम किया है।

परीक्षण के बाद ऐसा माना गया है कि यह पद्धति खास तौर पर सब्जियों

और फलों को नष्ट होने से बचा सकती है क्योंकि इस पर्त के अंदर बिना

बिजली के संचालित होने वाले यंत्र का तापमान कम रहता है।

इससे नष्ट होने वाली चीजें बच जाती हैं। दूसरी तरफ अत्यधिक शीतल

नहीं होने की वजह से उनका ताजापन भी बना रहता है।

इस विधि की परिकल्पना करीब एक वर्ष पहले इसी दल द्वारा की गयी थी।

तब से इसकी संरचना के निर्माण पर काम चल रहा था। अब जाकर उसे तैयार

करने में सफलता मिली है। जिसके बाद उसका परीक्षण किया गया है।

इंफ्रा रेड किरणों को आसानी से लौटा देता है यह यंत्र

इस विधि की विशेषता यही है कि यह अन्य उपकरणों की तरह इंफ्रा रेड

किरणों को लौटा देती है। इंफ्रा रेड किरणें हमारी वायुमंडल के पारदर्शी

वातावरण से होते हुए वापस अंतरिक्ष में लौट जाती हैं। इसके पहले भी

इस शोध दल ने कुछ और परीक्षण किये थे लेकिन उनमें अपेक्षित सफलता

नहीं मिल पायी थी। इस बार जिस पर्त का इस्तेमाल बिना बिजली के

कूलिंग के लिए किया गया है, वह उल्लेखनीय तौर पर कामयाब साबित

हुआ है।

इसे तैयार करने के लिए वैज्ञानिकों ने उन कारणों का गहन अध्ययन किया,

जिनकी वजह से कोई भी वस्तु अथवा स्थान गर्म होता है। दरअसल इंफ्रा रेड

किरणों के प्रभाव की वजह से किसी वस्तु के गर्म नहीं होने के बाद भी उसके

अंदर मौजूद हवा गर्म होने लगती है। इसी वजह से नये किस्म की पर्त से

इस कमी को भी दूर करने का प्रयास किया गया है। यह पर्त अपने अंदर

किसी भी तरीक से इंफ्रा रेड को प्रवेश नहीं करने देती। इस वजह से अंदर

मौजूद हवा को भी गर्म होने का कोई अवसर नहीं मिलता। उल्टे तापमान

में कमी आने की वजह से धीरे धीरे हवा भी ठंडी होती चली जाती है।

इस्तेमाल के लिहाज के किफायती और काफी आसान है

जिस पर्त का इस्तेमाल इस काम के लिए किया गया है, वह काफी हल्का है

और सूर्य की रोशनी के ताप को रोकने में अत्यंत कारगर साबित हो रहा है।

यह किसी भी वस्तु के ऊपर एक पतला सा आवरण बना देता है। इसी आवरण

की वजह से वस्तु गर्म नहीं होती क्योंकि सूर्य की किरणों का इंफ्रा रेड किरण

उस गर्म ही नही कर पाता है। अंदर मौजूद हवा भी इंफ्रा रेड की गर्मी नहीं होने

की वजह से ठंडी होती चली जाती है। परीक्षण के आंकड़ों के विश्लेषण से ऐसा

पाया गया है कि यह तकरीबन 90 फीसदी रोशनी को लौटा देने में सक्षम है।

जिस पदार्थ से इसे तैयार किया गया है, उस पोलिइथालिन का इस्तेमाल खास

तौर पर प्लास्टिक के बैग बनाने में किया जाता है।

चिली के तपती रेगिस्तान में कारगर साबित हुई विधि

इसे तैयार करने के बाद इसका प्रयोग चिली के एटाकैमा रेगिस्तान की गर्मी में

किया गया है। यह पृथ्वी का अन्यतम सबसे सूखा इलाका है। चमकते सूर्य के

बीच इसकी जांच की गयी थी। पर्त लगाने उपकरण के प्रारंभिक आंकड़े ही यह

साबित कर गये कि विधि सफल है क्योंकि इस तकनीक की वजह से वहां

सीधी पड़ती सूर्य की रोशनी में भी तापमान करीब 13 डिग्री कम हो गया था।

वैज्ञानिक मानते हैं कि किसी भी संयंत्र को ठंडा रखने की प्रारंभिक अवस्था में

इस विधि का उपयोग ऊर्जा के खर्च को कम करने के साथ साथ ग्रीन हाउस

गैसों के उत्सर्जन को भी काफी हद तक कम कर देगा।

इस विधि से 50 डिग्री तक तापमान में कमी किया जाना संभव है। साथ ही यह

शीतलीकरण के कारोबार को सस्ता भी बना देगा। कई वैज्ञानिक मानते हैं कि

इस विधि के अत्यंत सरल और किफायती होने की वजह से यह शीघ्र ही

लोकप्रिय भी हो जाएगा।

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9 Comments

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