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तेल अबीब विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओ ने बहरापन दूर करने की नई विधि खोजी

  • कान के बहरेपन का ईलाज भी जीन थेरेपी से

  • चूहों पर आजमायी गयी विधि पूरी तरह सफल

  • एक खास जीन को केंद्र में रखकर हुआ प्रयोग

  • ईलाज से बहरापन पूरी तरह समाप्त हो गया

राष्ट्रीय खबर

रांचीः तेल अबीब विश्वविद्यालय में यह प्रयोग काफी समय से चल रहा था। अब जाकर

उसकी नतीजा निकला है। इस नयी जेनेटिक थेरेपी की पद्धति से अब बहरेपन का ईलाज

किया जाना संभव होगा।खास तौर पर इस किस्म की परेशानी से ग्रस्त नवजात शिशुओं

के बहरेपन के ईलाज में यह अत्यंत कारगर विधि साबित होगी, ऐसी उम्मीद की गयी है।

इसके लिए वैज्ञानिकों ने उन क्षतिग्रस्त जीनों को बदलने का काम किया है, जो बहरेपन के

असली कारण है। इन्हें बदल दिये जाने की वजह से स्वाभाविक तौर पर सुनने की क्षमता

लौट आयी है। खास तौर पर बच्चों के बहरेपन के ईलाज के लिए यह पद्धति अत्यंत सहज

साबित होने जा रही है। यह पहले से ही जानकारी में है कि जन्म के पहले से मौजूद विकारों

की वजह से से कई शिशु ऐसे बहरेपन के साथ ही पैदा होते हैं। प्रारंभिक अवस्था में अगर

इसका पता चल जाए तो जेनेटिक पद्धति से जीनों को बदलकर इस बहरेपन को दूर किया

जा सकेगा। तेब अबीब विश्वविद्यालय की प्रोफसर कारेन अब्राहम ने इस शोध दल का

नेतृत्व किया है। विश्वविद्यालय के डिपार्टमेंट ऑफ ह्यूमन मॉलिक्यूलर जेनेटिक्स एंड

बॉयोकेमिस्ट्री विभाग ने चूहों पर इसका प्रयोग सफलतापूर्वक कर लिया है। जीन थेरेपी के

दायरे में आये चूहों का यह बहरापन क्रमिक रुप से समाप्त हो गया, यही शोध का निष्कर्ष

है। दुनिया में बहरापन भी अत्यधिक प्रचलित अक्षमता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के

आंकड़ों के मुताबिक 50 मिलियन से अधिक लोग इस बीमारी से पीड़ित हैं। आशंका है कि

आने वाले दशकों मं यह आंकड़ा और कई गुणा बढ़ने वाला है। आंकड़ा बढ़ने के कई कारण

एक साथ है। लेकिन तेल अबीब विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने जीन थेरेपी से उस दोष

को दूर करने का काम किया है।

तेल अबीब विश्वविद्यालय ने खास जीन पर शोध किया

डबल्यूएचओ के आंकड़ों के मुताबिक प्रति दो सौ शिशुओँ में एक इस किस्म के बहरेपन का

दोष लेकर पैदा होता है। वर्तमान में उसे सुनने के लिए अलग से यंत्र देने की आवश्यकता

पड़ती है। प्रति हजार मे एक बच्चा ऐसा पैदा होता है जो पूरी तरह बहरा होता है। शोध में

पाया गया है कि इसकी खास वजह जेनेटिक दोष ही है। जिसे अगर दूर कर दिया गया तो

बहरापन स्वतः समाप्त हो जाता है। लेकिन जीन थेरेपी के माध्यम से इसे किये जाने के

बाद बच्चे की सुनने की क्षमता क्रमिक तौरपर लौटती है। जैसे जैसे जीन का असर बढ़ता

है, वैसे वैसे जो कान के जेनेटिक दोष हैं, वे समाप्त होते चले जाते हैं। जीनों में एक बदलाव

की वजह से उत्पन्न होने वाले इसी बहरेपन को जीन थेरेपी से पूरी तरह समाप्त करने पर

यह सारा अनुसंधान की केंद्रित था। वैसे यह भी पाया गया है कि कई सौ जीनों का संबंध

इस जेनेटिक बीमारी से होता है। शोध दल ने इसे पकड़ने के लिए एक खास जीन

एसवाईएनई4 पर अपना शोध केंद्रित किया था। बहरेपन के साथ इस जीन के संबंध की

पहचान वहां पहले ही कर दी गयी थी। यह पाया गया था कि जेनेटिक दोष की वजह से

सुनने की क्षमता लेकर पैदा होने वाला बच्चा भी आगे चलकर इसी जेनेटिक दोष की वजह

से बहरा होता चला जाता है। इस दोष की वजह से कान के अंदर जो रोएं ध्वनि संकेतों को

दिमाग तक पहुंचाने का काम करते हैं, वे मरते चले जाते हैं। इस वजह से ध्वनि संकेत

कान के अंदर पहुंचने के बाद भी दिमाग तक नहीं जाते।

कृत्रिम हानिरहित वायरस बनाकर जीन को अंदर भेजा

अब्राहम के दल ने प्रयोगशाला में एक कृत्रिम वायरस तैयार किया, जो खतरों से मुक्त था।

इसी वायरस को जेनेटिक ईलाज के लिए अंदर पहुंचने के वाहन के तौर पर इस्तेमाल

कियागया है। चूहों के कान में जब यह वायरस पहुंचाया गया तो वे पहले कान के रोएं में

पहुंचे। वहां पहुंचकर इस दोषरहित वायरस ने अपने साथ लाये हुए जेनेटिक संकेत को वहां

छोड़ा। इसका नतीजा यह हुआ कि वहां पहुंचकर कान के अंदर के रोएं को सक्रिय बनाने का

काम इस जीन ने करना प्रारंभ किया। जैसे जैसे इसकी सक्रियता बढ़ी, सुनने की क्षमता भी

लौटती चली गयी।

इस शोध की समीक्षा करने वाले वैज्ञानिकों ने इस विधि को बहरेपन के ईलाज के लिए

बेहतर तरीका माना है। तेल अबीब विश्वविद्यालय के इस शोध पर बोस्टन चिल्ड्रेंस

हॉस्पिटल के प्रो. जेफ्री हॉल्ट, और यूएस नेशनल इंस्टिट्यूट ऑन डीफनेस एंड अदर

कम्युनिकेशन डिसऑर्डर्स के डॉ वेड चीन भी उत्साहित हैं

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