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टीचर्स ट्रेनिंग का राहत शिविर भागलपुर के अनेक लोगों का सहारा

दीपक नौरंगी

भागलपुरः टीचर्स ट्रेनिंग कॉलेज में स्थापित जिला प्रशासन की राहत शिविर वाकई अनेक

लोगों के लिए राहत भरी है। आज रविवार का दिन होन के बाद भी इस शिविर में विभिन्न

इलाकों से आये तथा किन्हीं कारणों से भागलपुर में फंसे लोगों की अच्छी खासी भीड़ रही।

वीडियो में देखिये इस राहत शिविर में आये लोगों ने क्या कहा

इस क्रम में पहली बार रविवार का दिन इस बात का भी खुलासा हो गया कि शहर के अंदर

भी अनेक इलाकों में गरीब परिवार के लोगों को भोजन की कठिनाई है। टीचर्स ट्रेनिंग

कॉलेज के इस शिविर में भोजन के लिए आयी अनेक महिलाओं और बच्चियों से हुई बात-

चीत में यह जानकारी सामने आयी है। इससे यह भी स्पष्ट हो गया है कि जिला और

पुलिस प्रशासन की अथक परिश्रम के बाद अब भी सामाजिक संगठनों और जन

प्रतिनिधियों को अपने अपने स्तर पर अधिक काम करते हुए ऐसे भूखे परिवारों की

पहचान करनी होगी और उन तक भोजन पहुंचे इसके लिए प्रयास करना होगा। इस शिविर

में मौजूद प्रशासनिक अधिकारी और प्रभारी भागलपुर सीईओ ने भी इसे दुखद माना और

कहा कि इन तमाम लोगों तक कमसे कम भोजन की व्यवस्था हो, इसके लिए और

जागरुकता फैलाने की जरूरत है। शिविर के बारे में जैसे जैसे लोगों तक जानकारी पहुंच

रही है, लोग यहां भोजन के लिए आ रहे हैं। लेकिन इसके बाद भी वहां मौजूद महिलाओं

और बच्चियों की कहानी निश्चित तौर पर दुखद है। सामूहिक प्रयास से ही कोरोना की

वजह से जारी राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन के दौरान इस किस्म की कठिनाइयों से पार पाना

गरीब और असहाय लोगों के लिए संभव होगा

टीचर ट्रेनिंग कॉलेज के शिविर से खुशी को मिली खुशी

खुशी नाम की लड़की भी भागलपुर की रहने वाली है। वह आज पहली बार इस टीचर्स

ट्रेनिंग के राहत शिविर में भोजन करने आयी थी। उसने बताया कि उसे चार दिन से भरपेट

भोजन नहीं मिला था। बात –चीत में उसने अपने परिवार के अन्य लोगों की भी ऐसी ही

विकट स्थिति की जानकारी दी। इसक अलावा भोजन करने आयी अनेक महिलाओं ने भी

अपने अपने परिवार में इस संकट से उपजी परेशानियों का उल्लेख किया। यह सभी सूचना

मिलने के बाद पहली बार इस शिविर में भोजन करने आयी थी। इनके जरिए ही इस बात

का भी पता चला कि शहर में अब भी लोगों तक भोजन नहीं तो सूखा राशन पहुंचाने की

जरूरत है। अनेक संगठनों द्वारा चलाये जा रहे अभियान के बीच भी यह स्पष्ट हो गया

कि अभी और मेहनत सामाजिक संगठनों को ही करना चाहिए।

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