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कर संग्रह के बढ़े आकार से राज्यों को कितना हिस्सा




कर संग्रह के आंकड़े अब केंद्र सरकार को हिम्मत बंधा रहे हैं। लेकिन इस बढ़े हुए कर से

राज्यों को उनका हिस्सा कितना और कब मिलेगा, यह सवाल भी महत्वपूर्ण बनता जा रहा

है। दरअसल यह सवाल इसलिए खड़ा हुआ है क्योंकि झारखंड सरकार का सीधा सीधा

आरोप है कि भाजपा की केंद्र सरकार ने इस राज्य में भाजपा की सरकार होने के दौरान भी

जीएसटी में राज्य का हिस्सा नहीं दिया है। झारखंड की बात करें तो कोयले की रॉयल्टी,

जमीन अधिग्रहण का मुआवजा जैसे बकाये भी केंद्र के माथे पर होने का आरोप राज्य

सरकार की तरफ से लगता आ रहा है। इसमें से कोयले के बकाये की एक किश्त तो राज्य

सरकार को दी गयी थी लेकिन साथ ही डीवीसी का बकाया का उल्लेख कर उससे अधिक

रकम काट भी लगी गयी है। इसलिए कर संग्रह अगर बढ़ रहा है तो राज्यों के माध्यम से

आम जनता तक इसका कितना फायदा पहुंचेगा, यह देखने वाली बात होगी। कोरोना

संकट की वजह से वित्तीय दबाव का सामना कर रही केंद्र सरकार को प्रत्यक्ष कर एकत्र

होने के बढ़े हुए आंकड़ों से बड़ी राहत मिली है। 2020-21 में एडवांस टैक्स संग्रह बढऩे से

चार साल में पहली बार प्रत्यक्ष कर संशोधित बजट लक्ष्य से ज्यादा रहा है। वित्त वर्ष

2021 के लिए सोमवार तक जमा अग्रिम कर की अंतिम किस्त का संग्रह पिछले की तुलना

में करीब 7 फीसदी ज्यादा रहा है। 16 मार्च तक शुद्ध प्रत्यक्ष कर संग्रह 9.18 लाख करोड़

रुपये रहा, जो 9.05 लाख करोड़ रुपये के संशोधित बजट अनुमान से ज्यादा है। मगर

पिछले साल के 9.56 लाख करोड़ रुपये की तुलना में यह करीब 4 फीसदी कम है। बेंगलूरु,

मुंबई और जयपुर सर्कल में प्रत्यक्ष कर का आंकड़ा बढ़ा है।

कर संग्रह पर विशेषज्ञों ने अपनी राय पहले ही दी है

बेंगलूरु में कर संग्रह में 10 फीसदी, मुंबई में 3.5 फीसदी और जयपुर में 2.2 फीसदी इजाफा

हुआ है। वित्त वर्ष खत्म होने में अभी 15 दिन बाकी है और संग्रह बढऩे के कारण सरकार

के पास इस दौरान खर्च करने के लिए अतिरिक्त रकम होगी। चार साल में यह पहला

मौका है जब केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड ने संशोधित बजट लक्ष्य से ज्यादा कर जुटाया है।

इससे पहले 2016-17 में डाइरेक्ट टैक्स कलेक्शन 8.49 लाख करोड़ रुपये रहा था, जो

संशोधित अनुमान से ज्यादा था। एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी ने कहा, चालू वित्त वर्ष

के लिए संशोधित लक्ष्य वास्तविकता के करीब था। आर्थिक गतिविधियों में तेजी आई

और अग्रिम टैक्स कलेक्शन के आंकड़े भी अच्छे रहे। अगर टैक्स कलेक्शन ज्यादा नहीं

होता तो भी हम पिछले साल जितना कर जुटा लेते। अर्थव्यवस्था पर महामारी का असर

देखते हुए पिछले महीने पेश बजट में वित्त वर्ष 2021 के लिए प्रत्यक्ष टैक्स कलेक्शन का

लक्ष्य पहले के 13.19 लाख करोड़ रुपये के अनुमान से काफी कम कर दिया गया था। 15

मार्च तक शुद्ध प्रत्यक्ष कर संग्रह पिछले साल की तुलना में 4 फीसदी कम रहा, जो जनवरी

में 9 फीसदी कम था। 2019-20 में आयकर विभाग संशोधित अनुमान से करीब 70,000

करोड़ रुपये कम कर जुटा पाया था।सरकारी अधिकारी द्वारा साझा किए गए अंतरिम

आंकड़ों में 2020-21 में अग्रिम कर संग्रह करीब 4.7 लाख करोड़ रुपये रहा। 11 प्रमुख क्षेत्रों

में से सात में अग्रिम कर संग्रह बढ़ा है, जिनमें मुंबई में सबसे ज्यादा 17 प्रतिशत की

बढ़ोत्तरी हुई है। लेकिन पिछले साल की तुलना में दिल्ली में 1 फीसदी, बेंगलूरु में 6

फीसदी और चेन्नई में 7 फीसदी कम अग्रिम कर संग्रह हुआ।

पिछले साल के मुकाबले रिफंड भी बढ़ गया है

पिछले साल की तुलना में रिफंड 13 फीसदी बढऩे से सकल संग्रह 1 फीसदी कम रहा।

मंगलवार तक सकल संग्रह 11.20 लाख करोड़ रुपये रहा जो पिछले साल 11.34 करोड़

रुपये रहा था। इस दौरान 2.02 लाख करोड़ रुपये रिफंड किए गए, जबकि पिछले साल

1.78 लाख करोड़ रुपये रिफंड किए गए थे। एक सरकारी अधिकारी ने कहा कि विवाद से

विश्वास तक योजना से भी कर संग्रह बढ़ाने में मदद मिली। विवाद से विश्वास के जरिये

इस साल 54,346 करोड़ रुपये कर जुटा। अग्रिम कर का भुगतान आय का अनुमान

लगाकर किया जाता है और इसके लिए वित्त वर्ष खत्म होने का इंतजार नहीं किया जाता

है। इससे अर्थव्यवस्था की स्थिति का भी संकेत मिलता है। अब कारोबार की गति तेज

होगी तो तय है कि सरकार की झोली में पैसे भी अधिक आयेंगे। यानी कर संग्रह का

आंकड़ा ऊपर जाएगा। साथ ही अब धान की फसल के मंडियों तक पहुंचने की वजह से ही

ग्रामीण अर्थव्यवस्था में धीरे धीरे तेजी आ रही है। इसके बीच जो सबसे बड़ी अड़चन बन

रही है वह किसानों का आंदोलन है। यह आंदोलन सरकार के कर संग्रह के साथ साथ

राजनीतिक भविष्य के लिए भी बहुत तेज चूभने वाला कांटा बन चुका है, इसमें भी संदेह

की कोई गुंजाइश नहीं है।



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