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ताइवान के वैज्ञानिकों ने कोरोना वायरस में छिपा हुआ जीन खोजा

  • इस विशेषता को वायरस छिपाए रहता है

  • कई जीनों के बीच से सक्रिय होता है यह

  • कंप्यूटर प्रोग्राम से पता लगाने का प्रयास

  • सातवी जेनेटिक विशेषता अधिक घातक है

राष्ट्रीय खबर

रांचीः ताइवान के वैज्ञानिकों ने पूरी दुनिया को फिर से कोरोना के बारे में चौंका दिया है।

वहां के एकाडेमिया सिनिका के वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि इस वायरस में एक गुप्त

जीन भी है। अब तक इस कोरोना वायरस के सिर्फ छह किस्मों का पता चला था। इन

वैज्ञानिकों के दावों के मुताबिक इसमें सातवां जीन भी है। शोधकर्ता मान रहे हैं कि अब

तक वैज्ञानिकों की नजरों से ओझल रहा यह जीन भी इस संक्रमण के पूरी दुनिया में इतनी

तेजी से फैलने का मुख्य कारण रहा है। यह नया जीन अपने छह अन्य जीनों से काफी

भिन्न है।

सामान्य वैज्ञानिक परिकल्पना के मुताबिक हर वायरस में कुल पंद्रह जीन ही हुआ करते

हैं। लेकिन यह जीन उनसे अलग है। साथ ही यह जेनेटिक विशेषता इसलिए भी जटिल है

क्योंकि यह दूसरे जीनों के बीच ही छिपा हुआ है। वैज्ञानिकों का मानना है कि इसी गुप्त

हथियार की वजह से यह वायरस एक शरीर से दूसरे शरीर तक पहुंचने के बाद तेजी से

अपनी वंशवृद्धि करता है। इस बात का दावा किये जाने के बाद ऐसा माना जा रहा है कि

इसी छिपे हुए जेनेटिक विशेषता से लड़ने का उपाय कर कोरोना वायरस की कारगर दवा

बनायी जा सकती है।

जिस नये जीन को इस क्रम में खोजा गया है उसे ओआरएफ3डी नाम दिया गया है। इसमें

यह विशेषता है कि यह किसी भी प्रोटिन की संरचना को बदल सकती है। वैज्ञानिक पत्रिका

जर्नल ईलाइफ में इसके बारे में जानकारी प्रकाशित की गयी है। उन्होंने कहा कि इससे पूर्व

पैंगोलीन के कोरोना वायरस में भी यह जीन पाये गये थे।

ताइवान के वैज्ञानिकों ने कहा पैंगोलीन में यही वायरस था

इस जीन की विशेषता यह भी है कि यह सामान्य किस्म की एंटीबॉडी के प्रभाव में नहीं

आती है। शायद इसी वजह से कोविड 19 के मरीजों की बीमारी दूर होने में कठिनाई होती

है। संक्रमण के दौर में यह जेनेटिक विशेषता ही कोरोना के मरीजों में नये प्रोटिनों का

निर्माण करती चली जाती है जो वायरस को अपने अंदर छिपाये रहते हैं। वैज्ञानिकों ने यह

भी कहा है कि सामान्य ए टी सेल की जांच में उनके होने का पता भी नहीं चलता है। यह

विशिष्टता इसलिए भी जांच में पकड़े जाने के लिए कठिन है क्योंकि यह कई जीनों के बीच

छिपा हुआ है। लेकिन जब इन्हें पढ़ा जा रहा है तो उनका पता चलना आसान हो जाता है।

ताइवान के वैज्ञानकों का यह भी मानना है कि वर्तमान जेनेटिक विज्ञान में काम आने

वाले कंप्यूटर संचालन विधि इसे पढ़ नहीं सकते हैं। वे सामान्य किस्म के वायरसों के बीच

ही छिपे हुए हैं। यह वैज्ञानिक तथ्य है कि कोई भी ऐसी विशेषता अपने होने की वजह से

कई काम एक साथ कर सकती है। साथ ही यह आम जांच में पकड़ में आने से भी छिपी

रहती है। इस जेनेटिक विशेषता में यह भी पाया गया है कि यह वायरस दूसरों से अलग है।

उसकी आरएनए संरचना काफी जटिल है। इसी जटिलता और अन्य जीनों के बीच छिपे

होने की वजह से अब तक उसका पता नहीं चल पाया था। दूसरी तरफ इसी गुप्त जेनेटिक

विशेषता की वजह से ही संक्रमण का दायरा निरंतर बड़ा होता चला गया है।

जेनेटिक वैज्ञानिक नई गुत्थी को सुलझाने में जुटे

उल्लेखनीय है कि ताइवान के शोध दल के इस शोध प्रबंध के मुख्य लेखक चेज नेल्सन ने

कहा है कि एक दूसरे के बीच से क्रियाशील होने वाले जेनेटिक विशेषताओं को जेनेटिक

साइंस पहले से जानता है। लेकिन पहली बार कोरोना वायरस में भी यह शामिल होने का

पता चला है। नेल्सन खुद अमेरिकन म्युजियम ऑफ नेचरल हिस्ट्री से भी जुड़े हुए हैं।

उनके मुताबिक इसे समझने के लिए अलग से एक कंप्यूटर प्रोग्राम को तैयार किया गया

है। इस कंप्यूटर प्रोग्राम को तैयार करने में उनके साथ टेक्निकल यूनिवर्सिटी ऑफ

म्युनिख एवं यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया (बर्कले) के वैज्ञानिक भी शामिल रहे हैं।

इसका पता लगाने के बाद इसके जेनेटिक गुणों का विश्लेषण किया जा रहा है। जिसका

खुलासा होने के बाद कोरोना वायरस की रोकथाम का नया और त्वरित मार्ग भी प्रशस्त हो

सकता है।


 

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