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कोविड की खाने वाली दवा इसी सप्ताह से बाजार में आ जाएगी




कोविड की खाने वाली दवा का मूल नाम मोलनुपिराविर है। इसके बारे में सूचना है कि यह इसी सप्ताह से भारत के खुले बाजार में बिक्री के लिए उपलब्ध हो जाएगी। वैसे भी इस बार कोरोना के असर पर ओमीक्रॉन के भारी पड़ने से एक फायदा यह नजर आ रहा है कि रोगियों पर वायरस संक्रमण का मारक असर बहुत कम हो रहा है।




वैसे भारत में यह खाने वाली दवा मोलुलाइफ के नाम से लायी जा रही है। जिसकी कीमत के बारे में बताया गया है कि 35 रुपये प्रति गोली या पूरे कोर्स के लिए 1,400 रुपये होगी। जो पूर्व के कोरोना संक्रमण के दौरान अस्पताल में होने वाले खर्च के मुकाबले निश्चित तौर पर कम होगी।

लेकिन चिंता का विषय यह भी है कि देश की एक बहुत बड़ी आबादी अभी इतनी रकम भी खर्च करने की स्थिति में नहीं है। मैनकाइंड फार्मा के अध्यक्ष आर सी जुनेजा ने कहा कि कुछ दवाओं को किफायती रखना महत्त्वपूर्ण था, न कि मुनाफा कमाना। उनका कहना है कि दवा सस्ती हो ताकि हर कोई इसका इस्तेमाल कर सके।

इसकी वजह से अस्पताल में भर्ती होने की संभावना कम हो जाती है। ऐसे में जरूरतमंदों के लिए अस्पताल में भर्ती करने के खर्च का बोझ कम हो जाता है। उन्होंने कहा कि मोलुलाइफ को पहले दिल्ली, मुंबई जैसे शहरों में भेजा जाएगा जहां संक्रमण के मामले अधिक हैं। इसके बाद इसका वितरण छोटे केंद्रों में होगा। फिलहाल पूरे देश में उसके वितरण का काम युद्ध स्तर पर जारी है।

कोविड की खाने वाली दवा का डोज पांच दिन का

कोविड की खाने वाली दवा के बारे में बताया गया है कि मरीजों को पांच दिनों तक एक दिन में आठ गोलियां लेने की आवश्यकता होती है। कंपनी मोलफ्लू ब्रांड के तहत सबसे कम कीमत वाली मोलनुपिराविर गोली 200 एमजी की पेशकश करेगी।

पांच दिनों में 40 गोलियों के फुल कोर्स की कीमत 1,400 रुपये होगी जो मरीजों के लिए उपलब्ध सबसे किफायती इलाज विकल्पों में से एक है। देश की सबसे बड़ी दवा निर्माता कंपनी, सन फार्मा ने अपने ब्रांड मोलक्सविर 38 रुपये प्रति गोली के हिसाब से पेश की है जिससे मरीजों के लिए इलाज की कुल लागत 1,520 रुपये हो गई है।

पुणे का एमक्योर ग्रुप लिजुविरा नाम से मोलनुपिराविर गोली की पेशकश कर रहा है जिसकी मार्केटिंग इसकी सहयोगी कंपनी जुवेंटस फार्मा करेगी। इलाज के पूरे कोर्स के लिए लिजुविरा की कीमत 1,750 रुपये होगी। सिप्ला ने अपने ब्रांड सिपमोलनु की कीमत 2,000 रुपये प्रति कोर्स है।




वहीं हैदराबाद की कंपनी हेटेरो ने पहले ही 40 गोलियों के कोर्स के लिए 2,490 रुपये में अपने ब्रांड मोवफॉर की पेशकश की है। अरबिंदो ने अपने-अपने ब्रांड मोलनुपिराविर के पूरे कोर्स की कीमत 2,000 रुपये तय की है। हालांकि मोलफ्लू जैसे कुछ ब्रांड दवा की दुकानों में अगले सप्ताह के शुरू में उपलब्ध हो जाएंगे।

स्टॉकिस्टों का कहना है कि उन्हें कई ब्रांडों के माल मिलने शुरू हो गए हैं। देश में साढ़े छह लाख से अधिक खुदरा दवा विक्रेताओं के संगठन, ऑल इंडिया ऑर्गेनाइजेशन ऑफ केमिस्ट्स ऐंड ड्रगिस्ट्स (एआईओसीडी) के महासचिव राजीव सिंघल ने कहा, लागत और माल ढुलाई एजेंटों के स्तर पर पिछले कुछ दिनों में माल आए हैं।

अस्पताल के खर्च से तो कम नहीं इसकी कीमत

मुंबई की एक दवा कंपनी के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि 1,500 रुपये से कम कीमत वाले किसी भी ब्रांड में मार्जिन कम हो सकता है लेकिन तीसरी लहर के दौरान ज्यादा मात्रा की वजह से इसकी ज्यादा भरपाई होने की उम्मीद है। विश्लेषकों का मानना है कि तीसरी लहर के कम होने के बाद कीमतें और कम हो जाएंगी।

कोविड की खाने वाली दवा के दाम अलग अलग होने के बाद भी कमसे कम अस्पताल में भर्ती होने से होने वाला आर्थिक खर्च कम होगा। लेकिन उसके साथ ही यह सवाल अब भी विशेषज्ञों द्वारा अनुत्तरित है कि कोरोना के किसी नये वेरियंट के सामने आने की स्थिति में यह दवा कितनी कारगर होगी।

जैसा कि कोरोना के वैक्सिनों के बारे में देखा जा रहा है कि दोनों टीके लगा लेने के बाद अब लोगों को बुस्टर डोज की सलाह दी जा रही है। इसी बीच इजरायल ने दावा किया है कि बुस्टर डोज को मिलाकर चार बार टीका लेने से शरीर की प्रतिरोधक क्षमता पांच गुणी बढ़ जाती है।

इसके बीच यह सवाल गुण होता जा रहा है कि आखिर यह कोरोना महामारी की असली वजह किसी प्रयोगशाला से लीक थी अथवा यह प्राकृतिक तौर पर ही चमगादड़ों से इंसानों तक फैल गया था। इन सवालों के बीच यह राहत भरी खबर है कि भारतवर्ष में टीकाकरण का काम युद्धस्तर पर जारी रहने की वजह से कोरोना के मरीजों की संख्या में तेजी से हो रही बढ़ोत्तरी के बीच भी उसकी मारक क्षमता कम देखी जा रही है।



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