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अदालत की चौखट पर सुलझेगी सुशांत सिंह के मौत की जांच

अदालत की कार्रवाइयों में हम बहुत जल्दी ही सुशात सिंह की मौत की जांच की याचिका

को देख समझ सकते हैं। दरअसल कल रात के घटनाक्रमों के बाद यह स्पष्ट होता जा रहा

है कि इस मुद्दे पर महाराष्ट्र सरकार और बिहार सरकार की बीच तनातनी है। ऐसा क्यों हैं,

इस पर सोशल मीडिया में इतना कुछ आ चुका है, जितना तो शायद जांच अधिकारी भी

नहीं जानते होंगे। लेकिन मुंबई पुलिस की जांच चलने तक चुप्पी रखने के बाद बिहार के

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने जिस तरीके से हस्तक्षेप किया है वह सराहनीय है। जिस मुद्दे

पर बिहार ने जांच की गाड़ी को आगे बढ़ाया है, उस पर पहले चर्चा क्यों नहीं हुई, यह भी

संदेह पैदा करने वाली बात है। एक व्यक्ति की मौत चाहे वह आत्महत्या हो अथवा हत्या,

उसके बैंक खाते की जांच एक सामान्य प्रक्रिया है। मुंबई पुलिस की मानें तो आत्महत्या

करने के पहले सुशांत ने अपने घर के नौकरों को वेतन भी दिया था। इसलिए मुंबई पुलिस

को सबसे पहले ही इसे जांच लेना चाहिए था। वैसे हो सकता है कि मुंबई पुलिस ने सामान्य

प्रक्रिया के तहत इसकी जांच भी कर ली हो लेकिन किसी दूसरे कारण से इसका उल्लेख

अपनी जांच रिपोर्ट में नहीं किया। बिहार पुलिस द्वारा सुशांत सिंह राजपूत के बैंक खाते से

पंद्रह करोड़ की निकासी का मामला प्रकाश में आते ही आनन फानन में प्रवर्तन निदेशालय

ने भी इस पर अपनी कार्रवाई प्रारंभ कर दी है। लेकिन बाद के घटनाक्रम संदेह पैदा करने

के लिए पर्याप्त संकेत दे रहे हैं। कल रात को इस मामले में सबसे पहले बिहार के डीजीपी

ने अपने आईपीएस अफसर को मुंबई में क्वारेंटीन किये जाने की जानकारी दी थी।

अदालत की चौखट पर रिया की याचिका पहले से पहुंची

कनीय अफसरों के साथ मुंबई पुलिस के आचरण के बाद मामले की जांच आगे बढ़ाने के

लिए बिहार की तरफ से आईपीएस अधिकारी विनय तिवारी को वहां भेजा गया था। उनके

मुंबई पहुंचते ही बृहन मुंबई महानगरपालिका ने जबरन क्वारंटीन कर दिया है। वहीं बिहार

के डीजीपी गुप्तेश्वर पांडेय का कहना है कि वे मुंबई के डीजीपी और अन्य अधिकारियों के

साथ बातचीत करने की कोशिश कर रहे हैं। दूसरी ओर इस मामले पर मुख्यमंत्री नीतीश

कुमार का कहना है कि जो हुआ वो ठीक नहीं है। इससे पहले रविवार को भी बिहार पुलिस

ने मुंबई पुलिस पर जांच में सहयोग न करने का आरोप लगाया था। घटनाक्रम ही बताते हैं

कि महाराष्ट्र में कोई एक लॉबी बिहार पुलिस की इस जांच को रोकना चाहती है। क्वारेंटीन

किये गये अधिकारी को आईपीएस मेस में भी जगह नहीं दी गयी है। उन्होंने निजी तौर पर

अपने रहने की व्यवस्था की है। यह हमारे देश की व्यवस्था की उस खामी को भी दर्शाता है,

जिसमें सुधार की लगातार मांग होती आ रही है। आखिर सुशांत सिंह के जांच कोई दूसरी

सरकारी एजेंसी अलग से कर लेगी, इससे मुंबई पुलिस को कोई आपत्ति नहीं हो सकती।

लेकिन जो घटनाक्रम हैं, उससे तय है कि अब अदालत की चौखट तक यह मामला पहुंचने

के बाद भी जांच की गाड़ी आगे बढ़ पायेगी। जिस तरीके से पहले बिहार के जांच अफसरों

को मुंबई पुलिस के लोग धकियाते हुए ले गये और बाद में बीएमसी ने आईपीएस अफसर

को पहुंचते ही क्वारेंटीन कर दिया, उससे साफ है कि पुलिस नहीं किसी और को इस जांच

की गाड़ी के आगे बढ़ने से परेशानी है। जाहिर है कि जिस तरीके से दो राज्यों के बीच यह

टकराव की स्थिति बनी है, उसमें अदालत का हस्तक्षेप ही न्यायसंगत रास्ता बनता है।

टकराव की इस स्थिति में अब यही रास्ता बचा है

ऐसा इसलिए भी है क्योंकि महाराष्ट्र सरकार ने पहले से ही इस मामले की सीबीआई जांच

से इंकार कर दिया है। इसलिए सोशल मीडिया में जो बाते चर्चा के केंद्र में हैं, उनमें कुछ

सच्चाई हो अथवा नहीं हो लेकिन इतना स्पष्ट है कि बिहार पुलिस द्वारा इस मामले की

जांच करना किसी को तकलीफ दे रहा है। शायद इसी वजह से जांच की प्रक्रिया को बाधित

करने की भरसक कोशिश की जा रही है। लेकिन इससे यह भी स्पष्ट होता जा रहा है कि

इसके बीच अगर साक्ष्यों से छेड़छाड़ होती है तो मुंबई पुलिस की फाइलों में दर्ज तथ्यों के

आधार पर भी कमसे कम सुशांत सिंह राजपूत के बैंक खाते से हुई निकासी के आधार पर

जांच की गाड़ी आगे बढ़ने से कोई रोक नहीं सकता क्योंकि बैंक के इन दस्तावेजों को

गायब नहीं किया जा सकता। अदालत की चौखट पर जाहिर तौर पर बिहार को ही जाने की

पहल कर देनी चाहिए। इससे कमसे कम जांच में रोड़े अटकाने के पीछे कौन सी ताकतें हैं,

वे भी खुलकर सामने आ जाएंगी। अगर खुद महाराष्ट्र सरकार अदालत में बिहार के

खिलाफ खड़ी होती है तो यह भी स्पष्ट होगा कि सोशल मीडिया में चल रही चर्चाओं में

कितना दम है।

 


 

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