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शुक्र ग्रह की धरती पर भी लगातार हलचल होती है

रडार के आंकड़ों से वैज्ञानिकों ने निकाला निष्कर्ष

कई स्थानों पर रगड़ के कारण पहाड़ बन गये

लगातार वहां यह बदलाव होता ही रहता है

गर्म बादलों ने घेर रखा है इस ग्रह को

राष्ट्रीय खबर

रांचीः शुक्र ग्रह भी भले ही हमारी नजरों में निर्जीव हो लेकिन वहां गति मौजूद है। वहां की

सतह में लगातार हलचल होती रहती है। इसका पता लगाने वाले वैज्ञानिकों ने कहा है कि

यह स्थिति पृथ्वी पर मौजूद किसी बर्फखंड के टूटकर समुद्र में तैरने जैसी ही है।वहां यह

बदलाव लगातार हो रहा है। दूसरे शब्दों में यह भी माना जा सकता है कि शुक्र ग्रह की सतह

पर भी लगातार वहां के टेक्टोनिक प्लेटों की स्थिति में बदलाव हो रहा है। इस बारे में एक

नया शोध प्रबंध नेशनल एकाडेमी ऑफ साइंस की पत्रिका में प्रकाशित किया गया है। इस

स्थिति की वजह से ऐसा भी माना जा रहा है कि इस ग्रह के भूगर्भ में शायद निरंतर

हलचल होती रहती है। इसी वजह से ऊपर का हिस्सा लगातार अपना स्थान बदल रहा है।

शुक्र ग्रह की स्थिति पर खगोल वैज्ञानिक लगातार अनुसंधान करते आ रहे हैं। यह पहले

भी देखा गया था कि वहां कई पहाड़ जैसी इलाके हैं। अब माना जा रहा है कि वहां के

टेक्नोनिक प्लेटों के आपसी टकराव के दौरान यह इलाके घर्षण के बीच ही ऊपर की तरफ

उठ गये हैं। इनमें भी बदलाव होता रहता है। इस वजह से ऐसा माना जा सकता है कि वहां

की धरती गतिमान है। अब शोध वैज्ञानिक यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि आखिर

लगातार ऐसा होने का वास्तविक कारण क्या है। वहां की स्थिति का अध्ययन करने वालों

का कहना है कि यह कुछ वैसी स्थिति है मानों कोई सीमेंट का बहुत बड़ा चबूतरा जगह

जगह से टूट गया हो और लगातार अपना स्थान भी बदल रहा हो। अलग अलग सतह के

आपसी रगड़ से जो इलाके ऊपर की तरफ उठ गये हैं, उनमें से कुछ तो काफी लंबे भी हैं।

शुक्र ग्रह की यह स्थिति पृथ्वी के टेक्टोनिक प्लेटों के जैसी

शुक्र ग्रह में सिर्फ पहाड़ जैसी ऊंचाई ही नहीं है। एक तरफ जहां पहाड़ जैसी सतह ऊपर उठी

है तो इसके विपरीत कुछ इलाकों में गहराई भी पैदा हो गयी है। वहां के सैटेलाइट चित्र

लगातार यह दर्शाते हैं कि शुक्र ग्रह की धरती पर हर बार स्थिति कुछ बदली हुई नजर

आती है। इससे निष्कर्ष निकाला गया है कि वहां यह बदलाव निरंतर जारी है। यह हमारी

धरती पर ग्लेशियरों के पिघलकर समुद्र में आकर तैरते रहने और स्थान बदलने जैसी ही

है। वैसे पृथ्वी पर यह निरंतर बदलाव काफी गहराई में होता रहता है, जहां टेक्नोनिक प्लेटें

लगातार आपस में टकराती रहती हैं। जब कभी यह घर्षण बड़ा होता है तो हम भूकंप के

तौर पर उसे महसूस कर पाते हैं। कई बार समुद्र के नीचे किसी बड़े ऐसे टकराव की वजह से

विस्फोट के बाद सूनामी जैसी स्थिति भी पैदा होती है। इस निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए

वैज्ञानिकों ने तीस वर्षों के आंकड़ों का बारिकी से अध्ययन किया है। हर बार के चित्र में

नजारा अलग नजर आने का यही कारण समझा गया है। इसलिए अब यह कहा जा रहा है

कि करीब 471 डिग्री तापमान होने की वजह से वहां की धरती पर पृथ्वी के मुकाबले एक

सौ गुणा अधिक दबाव है। फिर भी शुक्र ग्रह भौगोलिक तौर पर निरंतर सक्रिय है। इस

स्थिति की वजह से कुछ वैज्ञानिक मान रहे हैं कि शायद इस ग्रह पर भी कभी जीवन रहा

होगा या बदले स्वरुप में वहां कोई जीवन अब भी मौजूद है। इस वजह से वैज्ञानिक उसे

मृत ग्रह मानने के लिए तैयार नहीं हैं। पृथ्वी में भी टेक्टोनिक प्लेटों की रगड़ की वजह से

ही पर्वत और समुद्र बने हैं।

लगातार बदलाव होने के चित्र दर्ज किये गये हैं

कई स्थानों पर ज्वालामुखी का होना भी इसी का परिणाम है। अब शुक्र ग्रह की धऱती पर

ऊपरी सतह पर भी लगातार यह बदलाव होने और उसकी वजह से पहाड़ और खाई के

बनने की स्थिति देखी गयी है। शुक्र ग्रह की इस स्थिति के साथ साथ वहां बादलों का

जबर्दस्त घेरा होने की वजह से भी अंतरिक्ष के रडार स्टेशन और चक्कर लगाने वाले

सैटेलाइट उसकी साफ साफ तस्वीर हर बार नहीं ले पाते हैं। वहां के बादलों के बारे में भी

अनुमान है कि वे इतने गर्म हैं कि उससे गुजरने वाला कोई भी अंतरिक्ष यान गर्मी से

पिघलने की स्थिति में आ जाएगा। शुक्र ग्रह का चक्कर काटने वाले मैगेलान प्रोव लगातार

उसके आंकड़े भेजता रहा है। यह अंतरिक्ष यान वर्ष 1990 से 1094 तक पूरे इलाके के आंकड़े

अपने रडार के जरिए भी भेज चुका है। वहां के भूखंडों के बारे में अनुमान है कि यह

तकरीबन अलास्का के बराबर हो सकते हैं। यह सारे इलाके आपस में टकराते हुए इधर

उधर भटकते रहते हैं। इस शोध से जुड़े कोलंबिया विश्वविद्यालय के सीन सोलोमन कहते

हैं कि ऐसा क्यों हो रहा है, अभी इस बारे में कोई निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता है। इन

तथ्यों के आधार पर माना जा रहा है कि नासा का प्रस्तावित शुक्र ग्रह का अभियान अब

नये तथ्यों की खोज में निकलेगा। पूर्व घोषित कार्यक्रम के अनुसार इसी दशक में नासा

इस अभियान को अंजाम देने वाला है।

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