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सुप्रीम कोर्ट और प्रधानमंत्री का जाहिर तौर पर अलग अलग रुख

  • किसान आंदोलन पर अदालत की टिप्पणी के बाद बोले मोदी

  • अदालत ने कहा अभी लागू ना करें तीनों कानून

  • अहिंसक आंदोलन का अधिकार है किसानों को

  • तीन जजों की पीठ ने दिया है यह आदेश

राष्ट्रीय खबर

नईदिल्लीः सुप्रीम कोर्ट और प्रधानमंत्री की बातों में साफ अंतर नजर आने लगा है। आज

शीर्ष अदालत ने सरकार से बात चीत होने तक कृषि कानून को लागू नहीं करने का सुझाव

दिया। इसी क्रम में मध्यप्रदेश के किसानों को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने

साफ कर दिया कि काफी सोच समझकर और दो दशकों के विचार विमर्श के बाद इन्हें

लागू किया गया है। इसलिए इन कानूनों को वापस लेने का कोई सवाल ही नहीं है। इससे

जाहिर है कि किसानों के आंदोलन के मुद्दे पर अन्य नेता क्यों नहीं आगे बढ़ पा रहे थे और

कृषि कानूनों के मुद्दे पर सीधे प्रधानमंत्री की सोच ही काम कर रही है।

आज चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया एसए बोबडे, जस्टिस ए एस बोपन्ना और जस्टिस

रामासुब्रमणियन की पीठ ने अपने आदेश में लिखा है कि कोर्ट किसी भी तरह से किसानों

के आंदोलन में दखल नहीं देगा। विरोध करना उनका अधिकार है जब तक कि वो अहिंसक

रहे। याचिकाओं पर गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई थी। जिसमें अदालत ने किसान

आंदोलन में दखल देने से इंकार कर दिया था। अदालत द्वारा इस मुद्दे पर समिति बनाये

जाने का उल्लेख किये जाने के बाद आज प्रधानमंत्री ने इसी मुद्दे पर फिर से अपनी बात

रखी। इधर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को आदेश दिया कि सभी संगठनों को आधिकारिक

तौर पर नोटिस दिया जाए और सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई में शामिल होने को कहा जाए। अब

इस मामले की सुनवाई अगले 15 दिनों में सर्दी की छुट्टियों में होगी जिसके लिए अलग बेंच

का गठन किया जाएगा।

सुप्रीम कोर्ट और नरेंद्र मोदी का अंतर मोदी के बयान से

इन अदालती कार्रवाइयों के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मध्य प्रदेश में एक किसान

सम्मेलन में किसानों को संबोधित करते हुए कहा कि ये जो कृषि कानून लाए गए हैं, वो

रातों-रात नहीं लाए गए, पिछले 20-22 सालों में हर सरकार ने इसपर व्यापक चर्चा की है।

पीएम ने कहा कि ‘बीते कई दिनों से देश में किसानों के लिए जो नए कानून बने, उनकी

बहुत चर्चा है। देश के किसान, किसानों के संगठन, कृषि एक्सपर्ट, कृषि अर्थशास्त्री, कृषि

वैज्ञानिक, हमारे यहां के प्रोग्रेसिव किसान भी लगातार कृषि क्षेत्र में सुधार की मांग करते

आए हैं। सचमुच में तो देश के किसानों को उन लोगों से जवाब मांगना चाहिए जो पहले

अपने घोषणापत्रों में इन सुधारों की बात लिखते रहे, किसानों के वोट बटोरते रहे, लेकिन

किया कुछ नहीं, सिर्फ इन मांगों को टालते रहे।

उन्होंने इस आंदोलन का समर्थन कर रहे विपक्षी दलों पर हमला करते हुए कहा कि ‘अगर

आज देश के सभी राजनीतिक दलों के पुराने घोषणापत्र देखे जाएं, उनके पुराने बयान सुने

जाएं, पहले जो देश की कृषि व्यवस्था संभाल रहे थे उनकी चिट्ठियां देखीं जाएं, तो आज जो

कृषि सुधार हुए हैं, वो उनसे अलग नहीं हैं, जबकि किसानों के लिए समर्पित हमारी सरकार

किसानों को अन्नदाता मानती है। हमने फाइलों के ढेर में फेंक दी गई स्वामीनाथन कमेटी

की रिपोर्ट बाहर निकाला और उसकी सिफारिशें लागू कीं, किसानों को लागत का डेढ़ गुना

एमएसपी दिया है।

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