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सूर्य के आगे भी पहुंचना अब संभव होगा महाकाश अभियान में

  • नासा ने तैयार की प्रकाश की गति के इंजन की डिजाइन
  • एक सेकंड में चांद और 13 मिनट में मंगल ग्रह
  • इस अंतरिक्ष यान के लिए ईंधन नहीं लगेगा
  • अलबामा में चल रही है यान बनाने की तैयारी
प्रतिनिधि

नईदिल्लीः सूर्य के आगे एवं हमारे इस सौर मंडल से बाहर भी निकल पाना अब शायद वैज्ञानिकों के लिए संभव हो

पायेगा। पहले से ही यह पता था कि इस दूरी को तय करने के लिए अत्यंत तेज गति के यान की आवश्यकता है।

अब नासा ने ऐसे इंजन की डिजाइन तैयार की है, जो लगभग प्रकाश की गति को प्राप्त कर सकता है।

इसके पहले भी नासा सूर्य के लिए एक पार्कर सोलर प्रोव भेज चुका है, जो सूर्य के चक्कर काट रहा है।

साथ ही इसे कुछ ऐसे तरीके से प्रस्तुत किया जाने वाला है, जिसकी वजह से इसमें ईंधन की खपत भी नहीं होगी।

वैज्ञानिकों का मानना है कि अगर यह प्रयोग सफल हुआ तो उसके आधार पर जो इंजन तैयार होगा वह मात्र 13 मिनट

में किसी अंतरिक्ष यान को मंगल ग्रह तक पहुंचा सकेगा।

वर्तमान में मंगल ग्रह पर नये सिरे से इंसान और पृथ्वी के जीवन को विकसित करने पर शोध चल रहा है।

इसी तरह आदमी इस तकनीक से सिर्फ एक सेकंड में चांद पर पहुंच जाएगा।

वैसे प्रयोग सफल होने के बाद वैज्ञानिक सूर्य और सुदूर के ग्रहों के अलावा हमारे सौर मंडल के बाहर की घटनाओं को

देखने समझने के विषय में ज्यादा उत्साहित हैं।

वे मानते हैं कि वर्तमान तकनीक से तो इस दूरी को तय कर पाना संभव नहीं है।

अलबत्ता प्रकाश की गति से चलने वाला कोई यान बने तो सुदूर महाकाश की सैर कर नई जानकारी हासिल करना

एक बहुत बड़ी बात होगी। सूर्य के लिए पहले से ही कई मानवरहित यान रवाना किये गये हैं।

सूर्य के आगे निकलने लायक इंजन को बनाया है डॉ डेविड बर्न्स ने

यह कमाल कर दिखाया है नासा के वैज्ञानिक डॉ डेविड बर्न्स ने। उन्होंने ही इस इंजन की डिजाइन बनायी है।

इस बारे में सामान्य समझ की भाषा में लोगों को काफी कुछ बताया गया है।

ताकि आम लोग भी यह समझ सकें कि दरअसल प्रकाश की गति को प्राप्त करने वाली यह इंजन काम कैसे करेगी।

डॉ बर्न्स नासा के साथ काफी समय से काम कर रहे हैं।

उन्होंने बिना ईंधन की डिजाइन बनाने के काम में ही अत्यंत तेज गति के इस इंजन की डिजाइन का दावा किया है।

उनके मुताबिक यह लगभग प्रकाश की गति के बराबर की स्पीड हासिल कर पायेगी।

यह बताया गया है कि दरअसल इस इंजन को न्यूटन के तीसरे सिद्धांत के आधार पर बनाया गया है।

न्यूटन के तीसरे सिद्धांत में यह बताया गया है कि प्रत्येक क्रिया के विपरित और बराबर प्रतिक्रिया होती है।

अब इसी प्रतिक्रिया को जारी रखते हुए इंजन को आगे बढ़ाने का काम किया गया है।

इसी आंतरिक प्रक्रिया की वजह से वैज्ञानिक यह मान रहे हैं कि यान के इंजन को सक्रिय बनाने के लिए

किसी बाहरी ऊर्जा यानी ईंधन की आवश्यकता नहीं होगी।

यह अपने अंदर की क्रिया और प्रतिक्रिया से ही आगे बढ़ने के लिए ऊर्जा हासिल कर सकेगा।

इस इंजन का नाम वर्तमान में हेलिकल इंजन बनाया गया है।

वैसे बर्न्स का यह इंजन भौतिकी विज्ञान के सामान्य विज्ञान पर काम नहीं करेगी, इसे स्पष्ट कर दिया गया है।

इस इंजन का डिजाइन नासा के अलबामा स्थित मार्शल स्पेस फ्लाइट सेंटर में बनाया गया है।

इस इंजन से बने रॉकेट को बिना किसी अतिरिक्त ईंधन के सीधे अंतरिक्ष में भेजने का प्रयोग करने पर

काम फिलहाल चल रहा है।

इसे न्यूटन के तीसरे सिद्धांत पर तैयार किया जा रहा है

इस इंजन की बनावट के बारे में बताया गया है कि यह दरअसल आम समझ की भाषा में एक बक्से के अंदर रखे हुए

एक रिंग की तरह है जो एक तरफ से उछलकर दूसरी तरफ जाता है और प्रतिक्रिया स्वरुप वापस उछलकर

पहले स्थान पर लौटता है। इसके साथ लगे स्प्रिंग ही उसे आगे बढ़ाते चले जाते हैं।

इस वजह से यह प्रक्रिया निरंतर चलती रहती है। बक्से के अंदर मौजूद रिंग के आगे बढ़ने में जो ऊर्जा उत्पन्न होती है,

वही इसे गति प्रदान करती है।

यह क्रम इतनी तेजी से होता है कि इससे प्रकाश की गति के बराबर की गति हासिल की जा सकती है।

इसे सक्रिय बनाने के लिए किसी ईंधन की आवश्यकता नहीं होगी। यह सिर्फ किसी पार्टिकल जेनरेटर

और ऑयन पार्टिकल्स की मदद से यह काम करता जाएगा।

चूंकि यह हमेशा वहां मौजूद होंगे, इस वजह से ईंधन की यह जरूरत निरंतर पूरी होती रहेगी।

सिर्फ उसे बंद करने के लिए बाहरी निर्देश की आवश्यकता पड़ेगी।

वर्तमान में नासा के वैज्ञानिक बर्न्स की डिजाइन पर दो सौ मीटर लंबा और 12 मीटर चौड़ा इंजन तैयार करने का

काम चल रहा है। वैसे काम में जुटे वैज्ञानिकों ने स्पष्ट कर दिया है कि परीक्षण के बाद आवश्यकतानुसार इसके

आकार में बदलाव किया जा सकता है ताकि यह अंतरिक्ष में भेजा जा सके।

इस बारे में वैज्ञानिक डॉ बर्न्स मानते हैं कि प्रयोग के दौरान प्रारंभिक सफलता नहीं भी मिल सकती है।

सैद्धांतिक तौर पर जो कुछ तैयार किया गया है, उसके प्रयोग से ही खामियों का पता चलेगा

और इंजन में उसके मुताबिक संशोधन भी किये जाएंगे।

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