देश के अनैतिक सौदों में राजनीतिक प्रभाव का दंड क्या हो

देश के अनैतिक सौदों में राजनीतिक प्रभाव का दंड क्या हो
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देश  के अधिकांश विदेशी सौदों में किसी न किसी रुप में बिचौलियों का प्रभाव रहा है, यह बात धीरे धीरे स्पष्ट होती जा रही है।

इसलिए अब सार्वजनिक तौर पर इस बात पर भी बहस होनी चाहिए कि देश का पैसा बिचौलियों के माध्यम से

जिन राजनेताओं के काम आ रहा है, वैसे राजनेताओं के खिलाफ क्या दंड का कोई अतिरिक्त प्रावधान होना चाहिए।

देश में सौदेबाजी की कहानी तो प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के कार्यकाल में ही प्रारंभ हो गयी थी।

उस वक्त एक रक्षा सौदे में लगे आरोप की वजह से तत्कालीन रक्षा मंत्री ने अपने पद से त्यागपत्र दे दिया था।

लेकिन वह दूसरा दौर था। उस दौर का प्रभाव सत्तर के दशक तक रहा, जबकि रेल दुर्घटना की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए

रेल मंत्री लाल बहादुर शास्त्री पद छोड़ देना चाहते थे।

अब तो हालत यह है कि जब तक कुर्सी से किसी को धकियाकर बाहर नहीं निकाला जाता, वह कुर्सी से चिपका रहता है।

इसलिए तमाम ऐसे सौदों में बिचौलिया होने के अलावा राजनीतिक लाभान्वितों के बारे में नये सिरे से कोई राय बननी चाहिए।

इस बात पर संदेह की कोई गुंजाइश नहीं है कि बड़े रक्षा सौदों में अनेक किस्म की गोपनीयता बरतने की जरूरत होती है।

इसलिए कई बार इनमें बिचौलियों का होना भी गलत बात नहीं होती।

इस बात-चीत और सौदों को अंतिम अंजाम तक पहुंचाने के बीच कई ऐसे घटनाक्रम होते हैं, जिनमें बिचौलियों को दलाल नहीं विशेषज्ञ के तौर पर माना जाना चाहिए।

लेकिन पिछले तीन दशकों में राजनीतिक स्तर में आयी कमी की वजह से

ऐसे सौदे भी अतिरिक्त काली कमाई का जरिया बनकर रह गये हैं।

ऐसा नहीं हैं कि देश को इसकी भनक नहीं होती। कई बार राजनीतिक उथलपुथल का कारण भी

यही सौदे बनते हैं, जिसका जीता जागता नमूना देश का बोफोर्स तोप सौदा है।

उस तोप सौदे की वजह से राजीव गांधी चुनाव हार गये थे।

लेकिन इस किस्म के घटनाक्रमों में कई बार ऐसे निरर्थक आरोप भी लग जाते हैं,

जो देश की सुरक्षा को नुकसान पहुंचाने वाले साबित होते हैं।

बोफोर्स तोप की गुणवत्ता पर भी सवाल उठाये गये थे।

जिसका नतीजा था कि बोफोर्स तोप कहां तैनात किये जा रहे हैं, उसकी भनक मिलने के बाद

पाकिस्तान ने सबसे पहले उरी सेक्टर पर हमला कर भारत के तीन बोफोर्स तोप उड़ा दिये थे।

लेकिन दरअसल बोफोर्स तोप की खरीद का फैसला बिल्कुल सही था, यह तो कारगिल युद्ध के दौरान साबित हुआ।

इस युद्ध में पहाड़ के शिखरों पर कब्जा जमाये बैठे घुसपैठियों और पाकिस्तानी सेना को मार गिराने में

इस बोफोर्स तोप की अहम भूमिका रही।

इसलिए यह माना जाना चाहिए कि रक्षा खरीद के तकनीकी विषयों पर

हमारे जैसे आम लोग चर्चा न करें और उसे शुद्ध तौर पर सेन्य विशेषज्ञों पर छोड़ दें।

लेकिन फिर भी सवाल खरीद मूल्य का है, जिस पर देश को जानने का अधिकार है।

गोपनीयता की आड़ में इन सौदों के बहाने कमाई करने वाले किसी भी शख्स

खासकर अगर वह भारतीय राजनीति में है तो क्षमादान का कोई प्रावधान नहीं होना चाहिए।

यह दरअसल देश की सुरक्षा के नाम पर दुकानदारी नहीं बल्कि देश की सुरक्षा के साथ खिलवाड़ है।

इसलिए अब ऐसे प्रावधान  होने चाहिए, जिनमें ऐसे सौदों में लिप्त पाये जाने वालों के खिलाफ

वर्तमान कानून से अधिक कड़ाई वक्त की मांग है।

नये पुराने सौदों पर निरंतर राजनीति होती रहे, यह दरअसल देश को बहलाने का एक असफल नुस्खा है।

पिछले कई दशकों से एक दूसरे पर आरोप लगाने का खेल अब पुराना पड़ चुका है।

जनता को अब स्पष्ट तौर पर परिणाम  चाहिए।

लिहाजा इसकी शुरुआत को सार्वनजिक चर्चा से भी हो सकती है।

जिस तरीके से अन्ना हजारे के लोकपाल के आंदोलन का प्रभाव पूरे देश में फैला था।

इसी आंदोलन की वजह से देश में कांग्रेस विरोधी एक माहौल भी बना था और चुनाव में उसका लाभ भाजपा को मिला।

ठीक उसी तरह रक्षा सौदों में दलाली के नाम पर जनता का पैसा अपनी जेब में भरने वालों के खिलाफ भी एक जनमत बनाने की जरूरत है।

इस पहल से और कुछ नहीं तो कमसे कम निरर्थक बहस से देश को भरमाने की कोशिशों पर विराम लगेगा।

देश की जनता अब राजनीतिक तौर पर इतनी सक्षम हो चुकी है कि वह सही गलत का फैसला कर सकती है।

इसलिए हर बार जनता को ऊंगली पकड़कर अपनी मर्जी से चलाने की कोशिशों को

रोकने की दिशा में भी जनता की तरफ से पहल होने की आवश्यकता है।

इससे काला धन पैदा होने का एक बड़ा स्रोत समाप्त होगा

तथा चकाचक कपड़ों में देश को लूटने वालों में भी भय पैदा होगा।

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