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रूक जाना नहीं तू कहीं हार के




रूक जाना नहीं है, यह तो पहले से तय है लेकिन जो इस विशाल अभियान की विफलता से दुखी हैं,

उन्हें यह अवश्य बताया जाना चाहिए कि इस मौके पर पूरा देश उनके साथ ही खड़ा है।

इसके लिए निश्चित तौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बधाई के पात्र हैं,

जिन्होंने इस मौके पर परिवार के मुखिया के तौर पर अपनी सही भूमिका निभायी

और विफलता से हताश वैज्ञानिकों में नया जोश भरने का काम किया है।

भाई यहां से चांद तक तो सब कुछ ठीक रहा है ना।

यानी यह माना जा सकता है कि गड़बडी वाले करीब दो किलोमीटर की दूरी तक हम सही पहुंचे थे।

इसलिए अब बाकि के दो किलोमीटर की दूरी की गड़बड़ी भर को दूर करना है।

लेकिन इतना तय है कि यह विक्रम लैंडर चांद की धरती पर ही गया है।

इसलिए अंतिम क्षणों में भी उसमें क्या गड़बड़ी रही है, उसे समझते हुए सुधारा जाना चाहिए।

जिन भारतीय वैज्ञानिकों ने कम ईंधन पर इस अंतरिक्ष यान को पांच बार कक्षा बदलकर वहां तक पहुंचा दिया,

उनपर भरोसा रखिये, वे इस गड़बड़ी को भी दूर कर सकते हैं।

इस बात की जानकारी तो पहले से ही थी कि अंतिम पंद्रह मिनट में इस

लैंडर का इसरो के नियंत्रण कक्ष से कोई संपर्क नहीं रहेगा।

इसलिए क्या कुछ हुआ है, उसे वैज्ञानिकों को ही समझने दीजिए।

इस काम की विशेषज्ञता खास तौर पर सक्रिय व्हाट्सएप यूनिवसिर्टी और

फेसबुक विश्वविद्यालय के विशेषज्ञों के पास नहीं है।

आज सुबह से चौक चौराहों पर भी कई लोगों के मुंह से इस बारे में चर्चा सुनी।

जिज्ञासा बढ़ी तो चंद बात-चीत से ही स्पष्ट हो गया कि सारे लोगों ने टीवी देखकर

अथवा सोशल मीडिया का पोस्ट पढ़कर अपना ज्ञान अर्जित किया है।

उनके पास स्पष्ट वैज्ञानिक जानकारी का घोर अभाव था। इसलिए मितरों, जिसका यह काम है, उस पर छोड़ दीजिए।

रूक जाना नहीं है, यह तो पहले से तय है

अलबत्ता यह ध्यान रहे कि यह कोई पहला अभियान नहीं था जो विफल हुआ है।

चांद की कक्ष के बाहर आठ अन्य उपकरणों से लैश आर्बिटर अब भी परिक्रमा कर रहा है।

इसलिए सिर्फ एक लैंडर में अंतिम समय में क्या कुछ गड़बड़ी हुई होगी, इसे वैज्ञानिकों को समझने दीजिए।

इसी बात पर एक पुरानी फिल्म का गीत याद आ रहा है।

इस गीत को लिखा था मजरूह सुलतानपुरी ने और इसे सुरों में ढाला था लक्ष्मीकांत प्यारे लाल ने।

फिल्म इम्तेहां के इस गीत को स्वर दिया था किशोर कुमार ने। गीत के बोल कुछ इस तरह हैं।

रुक जाना नहीं तू कहीं हार के
काँटों पे चलके मिलेंगे साये बहार के
ओ राही, ओ राही…
सूरज देख रुक गया है तेरे आगे झुक गया है
जब कभी ऐसे कोई मस्ताना
निकले है अपनी धुन में दीवाना
शाम सुहानी बन जाते हैं दिन इंतज़ार के
ओ राही, ओ राही…
साथी न कारवां है ये तेरा इम्तिहां है
यूँ ही चला चल दिल के सहारे
करती है मंज़िल तुझको इशारे
देख कहीं कोई रोक नहीं ले तुझको पुकार के
ओ राही, ओ राही…
नैन आँसू जो लिये हैं ये राहों के दिये हैं
लोगों को उनका सब कुछ देके
तू तो चला था सपने ही लेके
कोई नहीं तो तेरे अपने हैं सपने ये प्यार के
ओ राही, ओ राही…
हां इसी क्रम यह बात याद आ रही है कि इसी अभियान को दोबारा

प्रारंभ करने के लिए धन का प्रबंध कैसे होगा।लेकिन रूक जाना नहीं है

इसके लिए तो सरकार ने पहले से ही यातायात नियमों के फेरबदल से

कोष संग्रह का अभियान प्रारंभ कर दिया है।

आपलोग कितनी भी आलोचना करें लेकिन मुझे तो नजर आ रहा है कि

सड़कों पर से वाहनों का दबाव इसी वजह से अचानक कम होता हुआ दिख रहा है।

अगर अकेले रांची से एक दिन में पांच लाख का फाइल लिया जा सकता है

तो पूरे देश के इसी कोष संग्रह से दोबारा से हजार करोड़ की परियोजना तुरंत चालू की जा सकती है।

साथ ही चुनाव लड़ने को इच्छुक लोगों के लिए भी नया नियम बना दीजिए कि

हरेक को चुनाव के नामांकन के वक्त अलग से पांच हजार रुपये रूक जाना नहीं अभियान के लिए देने होंगे।

हो सकता है कि एक हजार करोड़ के बदले अधिक धन इकट्ठा हो जाए।

अगर और जरूरत हो तो वर्तमान और पूर्व सांसदों और विधायकों के पेंशन से भी

मात्र एक हजार रुपये मासिक काटे जा सकते हैं।

लेकिन हर बार अतिरिक्त धन जुटाने के लिए सिर्फ पब्लिक को ही बलि का बकरा मत बनाइयेगा हुजूर।

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