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आंखों में रोशनी बचाने वाले स्टेम सेल की पहचान हुई

  • प्रयोगशाला में कृत्रिम कोष विकसित किया गया

  • आंख की ग्लूकोमा बीमारी इसी कोष के जुड़ी

  • इंसानी आंख में कोष डालकर रोशनी लौटेगी

  • दिमाग तक संकेत पहुंचाती है यह कोशिका

प्रतिनिधि

नईदिल्लीः आंखों में रोशनी यानी हम कैसे देख पाते हैं, इसका रिसर्च काफी समय से ही

चल रहा है। यह पहले से पता है कि आंखों की नसों से जो संकेत हमारे दिमाग तक जाता

है, उसके आधार पर हम सामने के किसी भी वस्तु अथवा आकार के साथ साथ उसके रंग

और दूरी तक की पहचान कर पाते हैं। अब यह काम दरअसल होता कैसे है और किस

तरीके से होता है, इसकी भी खोज हुई है। वैज्ञानिकों ने लंबे अनुसंधान के बाद यह पाया है

कि इंसानी आंख के अंदर मौजूद नस में मौजूद एक खास किस्म की कोशिकाएं यह

जिम्मेदारी निभाती हैं। आंखों में रोशनी को दिमाग तक पहुंचाने का संकेत पैदा करने की

जिम्मेदारी इन स्टेम सेलों की होती है। जिस तरीके से सौर ऊर्जा के सेल सूर्य से ताप ग्रहण

कर उसे बिजली में बदलते हैं, ठीक उसी तरह यह स्टेम सेल सामने के संकेतों को ग्रहण

कर उसे देखने लायक बनाने के लिए दिमाग की समझ के लायक संकेतों में बदल देते हैं।

आंखों में रोशनी का यह प्रयोग मेरीलैंड विश्वविद्यालय में

मेरीलैंड विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ मेडिसीन में यह शोध चल रहा है। इस शोध का

एक मकसद लगातार उम्र के साथ साथ रोशनी कम होने की शिकायत करने वाले लोगों के

लिए बेहतर नजर का विकल्प तैयार करना है। इस शोध और उसकी उपलब्धियों के बारे में

एक शोध प्रबंध प्रकाशित किया गया है। इसमें बताया गया है कि इंसानी आंख के अंदर

मौजूद खास प्रकार का ऑप्टिक नस ही इसके मूल आधार की जिम्मेदारी निभाते हैं। इन

नसों में मौजूद स्टेम सेल ही रोशनी के संकेतों के वे वाहक हैं, जो उन्हें दिमाग तक ले जाते

हैं। वैज्ञानिकों ने इन सेलों को न्यूरॉल प्रोजेनिटर सेल करार दिया है। इस शोध दल के नेता

स्टीफन बर्नस्टेइन कहते हैं कि यह सेल इंसान के जन्म के समय से ही उसके पास मौजूद

होता है। इन सेलों की मदद से ही ऑप्टिक नस की संरचना तैयार होती है जो इंसान को

दृष्टि देती है। इन कोशों के मौजूद नहीं रहने की स्थिति में नसों की संरचना ही नष्ट हो

जाएगी। जिसका परिणाम यह होगा कि ऑप्टिक नस को नुकसान होगा और अंततः

इसकी परिणति ग्लूकोमा जैसी बीमारी होगी। अमेरिका के लिए इस शोध को काफी

महत्वपूर्ण समझा गया है। वहां के नेशनल आई इंस्टिट्यूट ने इस शोध को प्रायोजित

किया था। इसकी खास  वजह से इस किस्म की परेशानियों से करीब तीस लाख अमेरिकी

नागरिकों का जूझना है। शोधकर्ताओं के पास इस बात के आंकड़े हैं कि अकेले अमेरिकी में

इस खास वजह से एक लाख बीस हजार लोग दृष्टि दोष के शिकार हो रहा हैं। जब ऑप्टिक

नस को नुकसान पहुंचता है तो उसकी वजह से आंख के अंदर का दबाव बढ़ने लगता है।

इसकी वजह से आंख के अंदर वैसे इलाके बन जाते हैं, जो देख नहीं पाते। समय के साथ

यह दायरा और बढ़ता चला जाता है।

इस खास कोष और उसके काम की पहली बार पहचान हुई

यह पहला मौका है जब इस न्यूरॉल कोश की पहचान कर उसकी भूमिका की भी पहचान

हुई है। शोध में वैज्ञानिकों ने यह पाया है कि इन कोशिकाओं के बिना आंख खुद की

मरम्मत नहीं कर पाया और आंख के अंदर ग्लूकोमा की बीमारी पैदा हो जाती है। दूसरी

तरफ जब यह प्रोजेनिटर कोष वहां मौजूद होता है तो वह क्षतिग्रस्त इलाके की मरम्मत

और बेहतरी का काम करता है। इस बात को और अच्छी तरह समझने के लिए डॉ

बर्नस्टेइन और उनकी टीम ने आंख के अंदर मौजूद लैमिना ऑप्टिक नस का अध्ययन

किया था। यह बहुत ही सुक्ष्म हिस्सा है। यह हिस्सा रेटिना के टिश्यू के पीछे रहता है। यह

पाया गया कि यही पूरे इलाके को सुरक्षा प्रदान करता है। इसका सीधा जुड़ाव दिमाग तक

होता है। इसलिए इसके जरिए ही इंसान की आंख का दिमाग तक सीधा संपर्क बन पाता

है।

परीक्षण को और बेहतर बनाने के लिए शोधकर्ताओं ने जेनेटिक तौर पर परिवर्तित

जानवरों पर एंटीबॉडी का परीक्षण भी किया है। इसमें मौजूद प्रोटिन संकेत के जरिए इन

खासकिस्म की कोशिकाओं की पहचान की गयी है। इसे बेहतर तरीके से समझने के लिए

एक एक कर 52 बार परीक्षण करना पड़ा। इसका नतीजा यह हुआ कि वैज्ञानिक इस कोष

को कृत्रिम तरीके से विकसित करने में भी सफल हो गये। अब इसी वजह से समझा जा रहा

है कि इस विधि को और विकसित कर लेने के बाद इंसान की आंखों के लिए भी यह कोष

कृत्रिम तरीके से बना पाना संभव होगा। ऐसा होने पर इंसान को इस किस्म की परेशानियों

से मुक्ति मिल जाएगी। उसे इस किस्म का दृष्टिदोष होने की स्थिति में नई कोशिकाओं

के जरिए उसके आंख की रोशनी को फिर से यथावत बनाया जा सकेगा।


 

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