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जीएसटी परिषद में मुंह चुराने से समस्या हल नहीं होगी

जीएसटी परिषद की एक और बैठक क्षतिपूर्ति के मसले पर किसी सर्वसम्मत फैसले के

बगैर ही खत्म हो गयी। इस गतिरोध का असर महामारी से निपटने में जुटे राज्यों पर

जरूरी खर्चों का इंतजाम करने की क्षमता पर पड़ेगा। दरअसल केंद्र सरकार द्वारा

जीएसटी में राज्यों को उनका हिस्सा अभी देने में असमर्थता व्यक्त करने की वजह से यह

स्थिति बिगड़ी है। गैर भाजपा शासित राज्य लगातार यह आरोप लगा रहे हैं कि केंद्र

सरकार कर संग्रह का पैसा भी अपनी इच्छा के उन राज्यों को उपलब्ध करा रही हैं, जहां या

तो उनकी सरकार है अथवा चुनाव में वहां फायदा उठाने की तैयारी है। लेकिन इस

राजनीतिक विवाद के बीच भी यह तय है कि आर्थिक स्थिति सभी की बिगड़ी हुई है। जिस

तरीके से परिवारों का बजट बिगड़ गया है ठीक उसी तरीके से सरकारों को भी कोरोना के

खिलाफ लड़ने में जो धन खर्च करना पड़ा है, उससे कोष पर प्रभाव पड़ा है। लेकिन

जीएसटी परिषद में मामला नहीं सुलझ पाने की वजह से स्थिति और बिगड़ रही है। इससे

न केवल महामारी के खिलाफ जारी जंग में भारत कमजोर पड़ेगा बल्कि आर्थिक बहाली में

भी देर होगी। यूं तो वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने महज ‘मतभेद’ बताकर इसे अधिक

तूल न देने की कोशिश की है लेकिन साफ है कि यह गतिरोध ऐसे समय में केंद्र एवं राज्यों

के संबंधों को प्रभावित कर रहा है जब उन्हें तमाम चुनौतियों से निपटने के लिए मिलकर

काम करना चाहिए। इससे फर्क नहीं पड़ता है कि इस पर किसी की क्या राय है, बात यह है

कि इससे किसी की भी मदद नहीं हो रही है। जीएसटी संग्रह में राज्यों की हिस्सेदारी में इस

साल 3 लाख करोड़ रुपये तक की कमी आने की आशंका है।

जीएसटी परिषद को एक नजर से सभी को देखना होगा

लेकिन राज्यों को नुकसान होने पर दिए जाने वाले मुआवजे के लिए संकलित उपकर

महज 65,000 करोड़ रुपये ही होगा जिससे 2.35 लाख करोड़ रुपये की कमी रह जाएगी।

केंद्र ने राज्यों के समक्ष दो विकल्प रखे हैं। पहले विकल्प में केंद्र 1.1 लाख करोड़ रुपये की

उधारी जुटाने में मदद करेगा। इस उधारी पर मूलधन एवं ब्याज दोनों का ही पुनर्भुगतान

क्षतिपूर्ति उपकर को 5 वर्षों की अधिकतम सीमा से आगे बढ़ाकर किया जाएगा। दूसरे

विकल्प के तहत राज्य समूची राशि उधार ले सकते हैं लेकिन उन्हें ब्याज का बोझ उठाना

होगा। केंद्र सरकार का कहना है कि 30 में से 21 राज्यों ने पहले विकल्प को चुना है और वे

इस प्रक्रिया में तेजी लाना चाहते हैं। वहीं बाकी राज्य इसके पक्ष में नहीं हैं। कुछ राज्यों ने

तो यह जानना चाहा है कि उधारी की रकम 1.1 लाख करोड़ रुपये से अधिक क्यों नहीं हो

सकती है? ऐसी खबरें हैं कि कुछ राज्य सरकारें इस मुद्दे के समाधान के लिए सर्वोच्च

न्यायालय का रुख करने के बारे में भी सोच रही हैं। लेकिन इससे परहेज करना चाहिए

क्योंकि यह मसले के समाधान में और देर करेगा जो राज्यों की फौरी जरूरत के माकूल

नहीं होगा। राज्यों को यह विवाद जीएसटी परिषद के भीतर ही निपटाने की कोशिश करनी

चाहिए क्योंकि यह एक राजनीतिक समाधान भी है। वैसे भी सर्वोच्च न्यायालय में पहले

रिजर्व बैंक और बाद में सरकार ने अपनी अपनी तरफ से अब तक किये गये उपायों के बारे

में जानकारी देते हुए साफ कर दिया है कि कर्ज में इससे अधिक की छूट देना बैंकों की

सेहत के लिए खतरनाक होगा। लेकिन यह दलील देने वाले कोरोना काल में बट्टा खाता में

68 हजार करोड़ कैसे डाले गये, इस पर कुछ बोलने से बचते नजर आ रहे हैं।

वर्तमान विवाद में राज्यों की अपनी शिकायतों में दम है

जीएसटी परिषद के वर्तमान विवाद में राज्य सरकारों के पास ऐसी शिकायत करने के

वाजिब कारण भी हैं क्योंकि केंद्र ने मुआवजे के विकल्प तैयार करते समय उनसे समुचित

विचार-विमर्श नहीं किया। सरकार की इस दलील को मान लेना भी गलत है कि केंद्र द्वारा

उधारी जुटाने का वृहद-आर्थिक पहलुओं पर गहरा असर होगा। केंद्र एवं राज्य सरकारें

दोनों वित्तीय बचत के एक ही समूह से उधारी जुटाते हैं लेकिन तमाम वजहों से केंद्र

सरकार को अनुकूल दरों पर उधार मिल जाता है। इसी के साथ कुछ राज्यों की यह मांग भी

गैरवाजिब है कि कोविड महामारी जैसी अभूतपूर्व एवं असाधारण स्थिति में भी जीएसटी

राजस्व पर उन्हें पूर्ण संरक्षण दिया जाए। इस वित्त वर्ष में राज्यों का जीएसटी से इतर

राजस्व 14 फीसदी की दर से नहीं बढ़ रहा है। इस तरह केंद्र एवं राज्यों दोनों को ही अधिक

व्यावहारिक रुख अपनाते हुए बीच का रास्ता तलाशने की जरूरत है। वरना जीएसटी

परिषद का यह विवाद सिर्फ सरकारों को ही नहीं बल्कि आम जनता को भी प्रभावित करने

जा रही हैं। वर्तमान में देश को ऐसे विवादों की आवश्यकता नहीं है।


 

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