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आंकड़े कहते हैं कि हम कोरोना पर जीत रहे हैं

  • सितंबर तक स्थिति नियंत्रित की पूरी उम्मीद

  •  सितंबर के अंतिम सप्ताह में उम्मीद

  •  अनेक इलाके बचे हैं उन्हें बचाना होगा

  •  मलेशिया के वायरस को रोकना भी होगा

डॉ एचडी शरण
(लेखक शहर के नामी चिकित्सक हैं)

रांचीः आंकड़े और घटनाक्रम ही कई चीजों का संकेत देते हैं। इसलिए संभव है कि मेरे

अनुमान के साथ कई विद्वान साथी सहमत नहीं हों। लेकिन हर कोई यह अवश्य स्वीकार

करेगा कि कोरोना का विस्तार घट रहा है। इसलिए अगर सब कुछ सही रहा तो सितंबर

माह के बाद हम कोरोना के प्रभाव को कम होते हुए देखने जा रहे हैं।

इस अनुमान के लिए मैंने आंकड़ों का अध्ययन किया है। यह आंकड़े यही दर्शाते हैं कि

संक्रमण की बढ़ोत्तरी का दर अब घट रहा है। पहले यह दर तीन प्रतिशत था जो अब

घटकर 0.7 प्रतिशत रह गया है। यह जान लीजिए कि जिस दिन यह दर नेगेटिव हो

जाएगा हमारे कोरोना के ऊपर चढ़ने का ग्राफ नीचे से आने लगेगा।

वैसे यह सावधान कर देना चाहूंगा कि इस अच्छी उम्मीद के बीच हमें पहले की तरह

बेवकूफी नहीं करना है और संक्रमण से बचाव के प्रावधानों का भी पालन करना है। इसमें

लापरवाही फिर से बड़ा संकट पैदा कर सकती है। प्रतिदिन 75 हजार रोगियों का पाया

जाना आम आदमी की नजर में वाकई खतरनाक स्थिति है। यह खतरनाक स्थिति तो है

लेकिन अब जिस तरीके से देश भर के चिकित्सक और स्वास्थ्यकर्मी दिनरात परिश्रम कर

रहे हैं, उससे इस पर रोक लगने की उम्मीद बढ़ती जा रही है। भारत से ऊपर अभी

अमेरिका के आंकड़े हैं, जहां एक दिन में 78 हजार औऱ दूसरे दिन 76 हजार मामले पाये

गये थे। लिहाजा अगर सब कुछ यथावत रहा तो जांच की निरंतर बढ़ती गति और संक्रमण

से मुक्त होने वालों का आंकड़ा यह बताता है कि सितंबर के अंतिम सप्ताह से स्थिति

सामान्य होने की तरफ लौटने लगेगी।

आंकड़े अच्छे संकेत दे रहे पर सावधानी जरूरी है

वैस इस बेहतर उम्मीद के बीच हमें यह ध्यान रखना होगा कि मलेशिया में इस वायरस का

स्वरुप बदला है। लिहाजा वहां से अगर किसी रास्ते से फिर यह वायरस भारत आया तो

परेशानी बढ़ सकती है। नये किस्म का वायरस थोड़ा अधिक पेचिदा है। दूसरी तरफ देश के

अनेक ग्रामीण इलाकों तक अब तक कोरोना की धमक नहीं है। ऐसे इलाकों को हमें

बचाकर ही रखना है। उसके लिए जागरुकता के जरिए लोगों को बचाव के प्रावधानों का

पालन करते रहना होगा।

और अंत में यह बता देना चाहूंगा कि इस बढ़ोत्तरी के नीचे आने यानी ग्राफ के भी नीचे

आने का अर्थ यह कतई नहीं हैं कि इससे समस्या दूर हो चुकी है। उदाहरण के तौर पर हम

रुस को ले सकते हैं, जहां मई के महीने में कोरोना संक्रमण शीर्ष पर था। अब वहां बहुत

कुछ सुधार होने के बाद भी हर रोज चार से पांच हजार संक्रमण के मामले सामने आ रहे हैं।

वहां भी ग्राफ नीचे जा रहा है लेकिन उसकी गति अब भी काफी धीमी है। साथ ही हमें यह

भी ध्यान देना होगा कि यूरोप के कई देशों में कोरोना की दूसरी लहर चल रही है। भारत को

इन घटनाक्रमों से सबक सीखकर खुद को सावधान और सतर्क रखना होगा।


 

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