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नक्सली हिंसा पर राज्य सरकार का दावा क्या गलत है







नक्सली हिंसा की घटनाएं लगातार घटित हो रही हैं। खास तौर पर चुनाव करीब आने के बाद ही इन घटनाओं में
बढ़ोत्तरी पर नये सवाल खड़े करती है। रांची से डाल्टनगंज जाने वाले राष्ट्रीय उच्च पथ पर नक्सली हिंसा में चार
पुलिस वालों का मारा जाना कोई छोटी बात नहीं है।

ऐसा इसलिए भी है क्योंकि झारखंड राज्य के गठन के वक्त नक्सली हिंसा की कुछ ऐसी स्थिति थी कि रात में रांची
से डाल्टनगंज का रास्ता बंद हो जाया करता था। चंदवा से पहले और लातेहार-मेदिनीनगर के बीच भी नक्सली
लगातार इसी राष्ट्रीय उच्च पथ पर घेराबंदी किये रहते थे।

इसी तरह रांची से निकलने वाली अन्य सड़कों पर भी सूरज डूबने के बाद यातायात बंद हो जाया करता था। वह
स्थिति काफी परिश्रम के बाद किसी तरह सुधरी है। जिन खास इलाकों में नक्सली ज्यादा हमला किया करते थे,
वहां अब स्थायी तौर पर अर्धसैनिक बलों की छावनियां हैं।

लेकिन इसके बाद भी राज्य सरकार की रिपोर्ट पर भरोसा नहीं करते हुए अगर चुनाव आयोग ने इसकी आशंका
जतायी थी तो बाद के घटनाक्रम इस आशंका को सही साबित कर रहे हैं।

प्रथम चरण के मतदान के दौरान भी पुलों को नक्सलियों ने अपना निशाना बनाया है। इसलिए यह सवाल
लाजिमी है कि क्या राज्य सरकार ने नक्सली उन्मूलन के बारे में अब तक सिर्फ जनता को गुमराह किया है।

नक्सली उन्मूलन के नाम पर खास किस्म के अभियान चलाने के नाम पर भी अरबों रुपये खर्च किये गये हैं।

अब चुनाव के मौके पर अगर नक्सली हिंसा सामने आ रही है तो यह सवाल जायज और प्रासंगिक भी है।

कुछ इलाकों में नक्सली हिंसा को साथ साथ मतदान वहिष्कार की धमकी भी दी गयी है।

नक्सली हिंसा पर दो अलग अलग उदाहरण ही पर्याप्त हैं

बड़ी बात यह है कि जैसे जैसे राज्य सरकार नक्सली उन्मूलन का दावा कर रही है। इस मुद्दे पर दो विषय की चर्चा
आवश्यक है।

पहला उदाहरण तो झूमरा पहाड़ का है। यहां नक्सली आतंक कुछ ऐसा था कि पुलिस और सीआरपी भी वहां नहीं
पहुंच पाती थी। बाद में वहां निरंतर अभियान के बाद अब पहाड़ पर सीआरपी का कैंप है।

दूसरा उदाहरण गढ़वा के बूढ़ा पहाड़ का है। जहां के बारे में कहा गया था कि एक प्रमुख नक्सली नेता सुधाकरण
वहां कैंप किये हुए हैं। कई महीनों तक इस पहाड़ की घेराबंदी के बाद भी अंततः वहां क्या कुछ हुआ इसकी कोई
घोषणा पुलिस की तरफ से नहीं की गयी।

नक्सली आतंक का यह आलम है कि जैसे जैसे दिन बीत रहे हैं वैसे वैसे नये नये नक्सली संगठनों का नाम
सामने आ रहा है।

इसलिए राज्य सरकार की तरफ से जो कुछ दावा किया गया है वह कितना सच है और कितना झूठ है, इस बारे में
राज्य सरकार को ही अपना पक्ष रखना चाहिए।

अब अगले चरण के मतदान में भी राज्य सरकार के इसी दावे की फिर से परीक्षा होने वाली है। लेकिन इसके बीच
से जो सवाल उभर रहा है वह भ्रष्टाचार का है।

जैसे जैसे नक्सली संगठनों के नामों की कतार लंबी हो रही है, वैसे वैसे नक्सली लेवी वसूली की प्रक्रिया के बारे में
नई नई जानकारी सामने आ रही है।

इससे स्पष्ट है कि सरकारी विकास कार्यों में लेवी भी भ्रष्टाचार के पनपने का एक नमूना ही है।

इस सच से मुंह मोड़ना दरअसल अपने आप को धोखा देना भी है।

इस किस्म की गतिविधियों का बढ़ना दूसरा संकेत है

अगर नक्सली गतिविधियां कम हुई हैं तो नक्सली संगठनों की संख्या क्यों बढ़ रही है।

इतना तो तय है कि हथियार लेकर घूमने वाले इन गिरोहों में से अधिकांश को माओवाद अथवा लेनिनवाद

या फिर समाजवाद से कोई लेना देना नहीं है।

इनके लिए यह जल्दी से पैसा कमाने का एक आसान रास्ता भर है।

रोजगार के अभाव में तथा अधिक पैसे के लालच में जो इस रास्ते पर कदम बढ़ा देते हैं,

उनके घर की माली हालत सुधरते देख दूसरे भी इसी रास्ते पर चल पड़ते हैं।

यह एक अत्यंत ही खतरनाक स्थिति है, जहां लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर युवकों का विश्वास का डिगना पूरी
लोकतांत्रिक ढांचे को ही ध्वस्त करने वाला साबित हो सकता है।

अभी झारखंड के विधानसभा चुनाव का सिर्फ एक चरण समाप्त हुआ है। अभी चार चरणों का चुनाव होना शेष है।
इस दौरान नक्सलियों के शहादत दिवस का भी एलान हो चुका है।

जाहिर है कि चुनावी प्रक्रिया के बीच इन नक्सली गतिविधियों की वजह से सरकार का दरअसल दूर दराज के
इलाकों में क्या कुछ प्रभाव है, इसकी नये सिरे से भी जांच हो जाएगी।

वैसे इतना तो तय है कि नक्सली हिंसा को खत्म करने के लिए कठोरता के साथ साथ विकास कार्यों में त्वरित
गति से ही ग्रामीण इलाकों तक सरकार का खोया विश्वास फिर से लौट सकता है।



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  1. […] नक्सली हिंसा पर राज्य सरकार का दावा क्… नक्सली हिंसा की घटनाएं लगातार घटित हो रही हैं। खास तौर पर चुनाव करीब आने … […]

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