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सृजन घोटाले की जांच आखिर सीबीआई कब तक पूरा करे पायेगी

सृजन घोटाले की जांच की गाड़ी उम्मीद से काफी धीमी चल रही है। इसका पर्दाफाश

भागलपुर से हुआ। इसके बाद क्रमवार तरीके से इस बात का खुलासा होता चला गया कि

कई अन्य इलाकों में भी सरकारी कोष को इस संस्था के जरिए लुटाया गया है। इस क्रम में

जिन्हें प्रथमदृष्टया अपराधी ठहराया गया, वह मनोरमा देवी अब दिवंगत हैं। उनके पुत्र

और पुत्रवधु फरार अभियुक्त हैं। लेकिन अब तक बिहार पुलिस अथवा सीबीआई यह

स्पष्ट करने से बच रही है कि आखिर सरकारी कोष इस निजी संस्था को देने का फैसला

किसका था। जाहिर है कि इस बात को समझने के लिए किसी विशेष ज्ञान की कतई

आवश्यकता नहीं है। या तो जिला के अफसरों की मिलीभगत से अथवा चंद कर्मचारियों

की साजिश के तहत सरकारी कोष को इस तरीके से अन्यत्र भेजा गया था। अब इस मूल

मुद्दे को सुलझाने के बदले सीबीआई की टीम बैंक अधिकारियों को पकड़कर जेल भेज रही

है। अपवाद स्वरुप एकाध प्रशासनिक अधिकारी भी पकड़ में आये हैं।

लेकिन असली मगरमच्छों पर जाल डालने से सीबीआई कतरा रही है, इसे समझने के लिए

किसी रॉकेट साइंस के ज्ञान की कोई आवश्यकता ही नहीं है। जाहिर है कि जब बड़े अफसरों

के फंसने का खतरा होता है तो ऐसे अधिकारियों से निजी लाभ लेने वाले राजनीतिज्ञ भी

उन्हें बचाने में जुट जाते हैं। सृजन घोटाले की जांच प्रारंभ होने के बाद से ही यह बात बार

बार खुलकर सामने आ रही है। सीबीआई के पास जांच की जिम्मेदारी सौंपे जाने के पहले

जो कुछ तथ्य सामने आ चुके हैं, उन्हें गलत साबित नहीं किया जा सकता।

सृजन घोटाले की जांच में कौन नेता फंस सकते हैं

इसलिए तय है कि इस पूरे घोटाले में बिहार और झारखंड के कुछ नेता भी शामिल हैं, जो

अपनी सत्ता की वजह से न सिर्फ खुद को बचाने में कामयाब हुए हैं बल्कि अपने लिए

काम करने वाले अफसरों को भी बचाने की भरसक कोशिश कर रहे हैं। इस गिरोहबंदी से

जो अफसर बाहर रहे हैं, उनका नाम सामने आ रहा है और कुछ आइपीएस अफसरों को

खिलाफ कार्रवाई की प्रक्रिया प्रारंभ होने की बाद अपुष्ट तौर पर आयी है। लेकिन असली

सवाल यह जस का तस खड़ा है कि जिन आइएएस अफसरों ने सरकारी कोष को निजी

संस्था के खाते में ट्रांसफर किया, उनके खिलाफ क्या कार्रवाई हो रही है। सीबीआई द्वारा

अब तक की गयी पूरी जांच प्रक्रिया में यह मुद्दा लगातार पर्दे के पीछे धकेलने की साजिश

हो रही है। लेकिन सृजन घोटाला चूंकि बिहार के लिए बहुत बड़ा घोटाला है, इसलिए उसे

भूला देने की तमाम साजिशें अब तक नाकामयाब रही हैं। सृजन घोटाला में फायदा उठाने

वाले कुछ व्यापारियों के खिलाफ भी पहली बार कार्रवाई हुई है। इस घोटाले में सीबीआई

द्वारा किंग पिन बनाये गये एमवी राजू की संपत्ति जब्त करने की औपचारिकता पूरी की

गयी है। लेकिन सीबीआई ने यह कार्रवाई करने में इतनी देर क्यों की, यह सवाल

अनुत्तरिता है। यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इस बीच उसी अभियुक्त को

अपनी शेष संपत्ति ठिकाने लगाने का पूरा अवसर मिल गया। सृजन घोटाले का खुलासा

होने के बाद भी वह न सिर्फ भागलपुर आया बल्कि बाजार में अपनी देनदारी और अन्य

कारोबारी हित को समेटता रहा। इस दौरान पुलिस सिर्फ इस वजह से मूकदर्शक बनी रही

क्योंकि जांच सीबीआई को सुपुर्द हो चुकी थी।

सीबीआई की असलियत तो वर्मा और अस्थाना विवाद से दिखी

जब जांच सीबीआई को सुपुर्द हुई थी तभी से यह संदेह उपजा था कि कहीं मामले की

लीपापोती के लिए इसे वहां भेजा जो नहीं गया है। अक्सर ही यह देखा जाता है कि जब

सत्ता किसी मामले को ठंडे बस्ते में डाल देना चाहती है तो उसकी जांच सीबीआई को सुपुर्द

कर दी जाती है। लेकिन अब सीबीआई का वास्तविक चरित्र क्या कुछ रह गया है वह तो

आलोक वर्मा और राकेश अस्थाना के विवाद में स्पष्ट हो चुका है। साथ ही सीबीआई की

स्वायत्तता के मामले में भी सरकार दरअसल क्या सोचती है, यह भी इसी मामले में

उजागर हुआ है। इसलिए सृजन घोटाले के मामले में सीबीआई की सुस्ती को राजनीतिक

दबाव से जुड़ा हुआ माना जा सकता है। इस सोच की वजह से जो एक और सवाल खड़ा

होता है, वह यह है कि दरअसल सृजन घोटाले की जांच को लटकाये रहने से किन नेताओं

को फायदा है। सामान्य समझदारी और पुलिस की जांच में मिले साक्ष्यों के आधार पर इसे

भी समझना कठिन नहीं है। एक अंतर से इस बात को और बेहतर तरीके से समझा जा

सकता है कि जो नेता चारा घोटाला में सजायाफ्ता लालू प्रसाद के बारे में बोलने से जरा भी

परहेज नहीं करते. वैसे नेता सृजन घोटाले के मामले में कुछ भी बोलने से कतराते नहीं

घबड़ाते हैं। इसलिए माना जा सकता है कि एक संगठित गिरोह सरकारी धन को लूट लेने

के बाद मामले को रफा दफा करने की पूरी कोशिश कर रहा है।

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