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रीढ़ की चोट का भी स्थायी ईलाज खोजा वैज्ञानिकों ने

  • अस्थि मज्जा से विकसित किये गये थे
  • सभी को गिरने या फिसलने से चोट लगी थी
  • इंजेक्शन लगने के बाद उल्लेखनीय सुधार देखा गया
  • जापान की येल विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों का सफल परीक्षण
राष्ट्रीय खबर

रांचीः रीढ़ की चोट के बारे में यह मान्यता है कि इस किस्म की चोट से उपजने वाली

परेशानियां स्थायी तौर पर खत्म नहीं होती। एलोपैथी में दवा के सहारे इससे होने वाले दर्द

को नियंत्रित किया जाता रहा है। लेकिन इस किस्म की दर्द निवारक दवाइयों का भी

अपना साइड एफेक्ट होता है, जो रोगी के आंतरिक अंगों को नुकसान पहुंचाते हैं। पहली

बार रीढ़ की चोट के स्थायी ईलाज का नया माध्यम खोजने के बाद उसका सफल प्रयोग

भी किया गया है। वैज्ञानिकों ने मरीज के अपने शरीर से स्टेम सेल निकालकर उससे इस

किस्म के चोटों को ठीक करने में सफलता पायी है।

वीडियो में समझिये रीढ़ के इस ईलाज पद्धति को

येल विश्वविद्यालय के इस अनुसंधान से संबंधित रिपोर्ट जर्नल ऑफ क्लीनिकल

न्यूरोलॉजी एंड न्यूरोसर्जरी में प्रकाशित किया गया है। इस स्टेम सेल की विधि से रीढ़ के

अंदर की गतिविधियों को बेहतर बनाया जा सका है।

उपलब्ध जानकारी के मुताबिक जिन मरीजों पर इस विधि को आजमाया गया है, उनमें से

पचास प्रतिशत इस पद्धति के कारगर होने का सबूत दे रहे हैं। इन सभी मरीजों ने अपनी

रीढ़ की चोट से होने वाली परेशानियों के कम होने की बात स्वीकार की है। साथ ही

वैज्ञानिक जांच में भी रीढ़ की हालत में सुधार देखा गया है। वैज्ञानिक परीक्षण में यह देखा

गया कि स्टेम सेल का इंजेक्शन दिये जाने के बाद रीढ़ से संचालित होने वाली अनेक

प्रक्रियाओं मे तेजी से सुधार होता चला गया। इस दौरान किसी किस्म का साइड एफेक्ट

भी नहीं देखा गया, जो एक बहुत बड़ी बात थी। जिन मरीजों के रीढ़ की चोट को इस विधि

से ठीक किया गया उन सभी को किसी न किसी वजह से रीढ़ में बाहरी चोट से नुकसान

पहुंचा था। इनमें से कई लोगों को गिरने से और कुछ लोगों को चलने के दौरान संतुलन

बिगड़ने की वजह से ऐसी चोट आयी थी। काफी पहले लगी चोट की वजह से बाद में उनकी

परेशानियां धीरे धीरे बढ़ती चली गयी। इनमें से कई लोगों को कमर के साथ साथ हाथ में

तथा अन्य लोगों को पैरों में परेशानी अधिक थी। स्टेम स्टेल के सक्रिय होने के बाद यह

सारी परेशानियां धीरे धीरे कम होती चली गयी। यहां तक कि जिन लोगों की आंत और

ब्लाडर में भी परेशानी थी, वे भी दूर हो गयीं।

रीढ़ की चोट का स्टेम सेल मरीज के बोन मैरो से बनाया

इस स्टेम सेल को तैयार करने के लिए मरीज के बोन मैरो, यानी हड्डी के अंदर के तरल का

एक हिस्सा निकाला गया था। यानी जिन्हें यह स्टेम सेल इंजेक्शन दिया गया वह उनके

अपने ही शरीर से तैयार सेल था। इसी वजह से शरीर के अंदर बाहरी अंग अथवा कोष के

प्रवेश से होने वाली प्रतिक्रियाएं भी नहीं हुई। शरीर का हिस्सा समझे जाने की वजह से

शरीर की आंतरिक संचरना ने उन्हें अस्वीकार नहीं किया था। वरना अंग प्रत्यारोपण के

दौरान भी शरीर के अंदर ये ऐसी प्रतिक्रियाओं की वजह से रोगियों को काफी परेशानियों

का सामना करना पड़ता है। कई बार इन प्रतिक्रियाओं को रोकने के लिए भी अतिरिक्त

दवाइयों का सहारा लेना पड़ता है तो साइड एफेक्ट भी देते हैं। मरीजों को उनके अपने

अस्थि मज्जा से तैयार स्टेम सेल के इंजेक्शन ही दिये गये थे।

शोध प्रबंध में इस पूरी विधि को स्पष्ट किया गया है

येल विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक जेफ्री डी कोसिस और स्टीफन जी वैक्समैन ने इस शोध

का नेतृत्व किया था। वे दोनों ही प्रकाशित शोध प्रबंध के मुख्य लेकर हैं। दोनों ने जापान के

साप्पोरो मेडिकल यूनिवर्सिटी में इस पूरे परीक्षण को अंजाम दिया। इनलोगों का सहयोग

ओसामू होनमोऊ और मासानोरी सासाकी ने किया था। इंजेक्शन दिये जाने के पहले और

बाद में हर मरीज का नियमित परीक्षण भी किया जाता रहा ताकि शरीर के अंदर जो कुछ

बदलाव दिख रहे हैं, उनका रिकार्ड दर्ज किया जा सके।

इस जांच के बारे में वैज्ञानिकों ने बताया कि अंदर की यह सारी गतिविधियां दरअसल

स्टेम सेल से विकसित होने वाले अंगों की वजह से ही होती है। इसीलिए हर मरीज के

अपने स्टेम सेल का प्रयोग इसमें किया गया। इसके माध्यम से रीढ़ की चोट का ईलाज

सफल होने बाद अब वैज्ञानिक दिमागी चोट को भी इसी तरीके से ठीक करना चाहते हैं।

पहला प्रयोग सफल होने के बाद शोधदल को उम्मीद है कि इससे अन्य चोटजनित

बीमारियों का ईलाज भी किया जा सकेगा, जो पूरी तरह साइड एफेक्ट से रहित होंगे।

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