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मकड़े की जाली की संरचना बताती है ओस की बूंदे

  • वैज्ञानिकों ने मजबूत यौगिक के बारे में जानकारी दी

  • मोतियों की लड़ी जैसी नजर आती है सुबह को

  • इसकी संरचना एक खास प्रोटिन पर आधारित

  • यह झेल सकता है अधिक वजन और दबाव भी

राष्ट्रीय खबर

रांचीः मकड़े की जाली कई बार हमारी नजरों में नहीं आती। खास तौर पर जब हम

अचानक इससे टकरा जाते हैं तो अपने चेहरे पर जाली होने का एहसास ही हमें बताता है

कि यहां मकड़े की जाली है। इसके ठीक विपरीत खास तौर पर जंगली इलाकों में सुबह

चलते वक्त इस मकड़े की जाली पर बिछी ओस की बूंदों से हमें दूर से इस जाली के होने का

पता चल जाता है। इन जालियों पर ओस की बूंदे मोती के जैसी नजर आती हैं। पहली बार

ओस की बूंदों से मकड़े की जाली की संरचना के संबंध में बेहतर जानकारी मिलने का दावा

किया गया है। वैसे भी यह माना जाता है कि मकड़े की जाली जिस रेशम से तैयार होती है

वह दुनिया की अन्यतम मजबूत यौगिकों में से एक है। इसी वजह से अत्यंत हल्के आकार

का होने के बाद भी यह अपने अंदर काफी वजन और दबाव झेल पाती है। इन जालियों में

फंसने वाला कीड़ा भी इसी वजह से जाली से नहीं निकल पाता है। बाद में वह मकड़े का

भोजन बन जाता है। मकड़े की जाली की रासायनिक संरचना का अध्ययन करने वाले

अनुसंधान दल ने बताया है कि इन जालियों पर पड़ने वाली ओस से ही उनकी संरचना की

विविधता का पता चलता है। पहली बार यह बात समझ में आयी है कि दरअसल इस जाली

में प्रोटिन के अत्यंत सुक्ष्म कण एक दूसरे से पूरी तरह नहीं मिलते। इसी वजह से उनका

सुक्ष्म आकार भी छोटा-बड़ा होता है। ओस की बूंदे जब इस पर रात में लगातार पड़ती हैं तो

इन सुक्ष्म लेकिन भिन्न आकारों की वजह से वे सुबह के उजाले में मोती की तरह अलग

अलग चमकते हुए नजर आते हैं। इस पर लेविस सिग्लर इंस्टिट्यूट फॉर इंट्रीग्रेटेड

जिनोमिक्स में काम चल रहा है।

मकड़े की जाली का प्रोटिन कई काम करता है

यह बताया गया है कि जिस तरीके से दो अलग अलग घनत्व के तरल एक दूसरे से

सामान्य तरीके से मेल नहीं खाते हैं। ठीक उसी तरह जाली में भी यह अंतर होता है। चूंकि

यह अंतर अत्यंत सुक्ष्म स्तर पर होता है इसी वजह से जाली के अंदर की यह बनावट खुली

आंखों से नजर नहीं आती है। लेकिन ओस की बूंदों के उस पर चमकने से यह पता चल

जाता है कि संरचना में क्या कुछ अंतर है क्योंकि जहां यह जाली मोटी होती है, वहां पर

ओस की मोटी बूंदे एकत्रित होती हैं जबकि पतले हिस्से में ओस की बूंदों का आकार छोटा

होता है। शोध संस्थान के प्रोफसर सैबिना पेट्री के साथ काम करने वाले शोधार्थी सागर

सेतु ने कहा है यह कई प्रोटिनों में एक जैसा ही होता है लेकिन अत्यंत सुक्ष्म स्तर पर होने

की वजह से खुली आंखों से नजर नहीं आता है। यह प्रोटिन आपस में मिलते नहीं है। वे

दरअसल अपने घनत्व को और घना करते हुए दूसरे प्रोटिनों के साथ बने रहते हैं। मकड़े की

जाली में यही संरचना होती है, जो उसे मजबूती देती है। इसी आधार पर वहां मौजूद एक

खास प्रोटिन पर ही शोधदल ने काम किया है। तरल जैसा यह प्रोटिन टीपीएक्स 2 है। यह

प्रोटिन अजीब किस्म के आचरण करता है। यह प्रोटिन कोशिकाओँ के विभाजन में

महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। खुली आंखों से यह किसी लकीर अथवा धागा के जैसा

दिखता है लेकिन यह वास्तव में वैसा नहीं होता। यह वहां मौजूद दूसरे प्रोटिनों की मदद से

इसके आकार को बढ़ाने में मदद करता है। कैंसर में भी इसकी भूमिका होती है, जिसकी

वजह से कई इलाकों में अत्यधिक कोशिकाओँ का इतना विकास हो जाता है कि शरीर की

बेहतर कोशिकाएं इनसे घिरकर मर जाती हैं।

खास माइक्रोस्कोप से इनकी संरचना को लगातार देखा गया

खास किस्म के माइक्रोस्कोप पर इस पूरी प्रक्रिया को देखा गया था। जिससे उसके

आचरण के बारे में नई जानकारी मिल पायी है। इसके बारे में पहली बार पता चला कि

दूसरे प्रोटिन के साथ काम करते वक्त पहले यह अपने आस पास के सारे इलाके में अपनी

एक परत बना लेता है। उसके बाद यह छोटे छोटे टुकड़ों में बंट जाता है। इसी वजह से जब

ओस की बूदों को हम इनके ऊपर देखते हैं तो वे एक जैसा नजर नहीं आते।

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