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बिजली भी खाता है खास किस्म का बैक्टेरिया शोध में खुलासा

  • अपने जीवन के लिए बिजली ही इसका भोजन
  • वाशिंगटन विश्वविद्यालय में हुआ है इस पर शोध
  • सुक्ष्म जीवों के नये गुण का पता चला वैज्ञानिकों को
  • प्रोटिन की संरचनाओं में बदलाव से अंदर जाती है बिजली
प्रतिनिधि

नईदिल्लीः बिजली खाने वाले बैक्टेरिया की जानकारी मिलने से वैज्ञानिक उत्साहित है।

दरअसल सुक्ष्म जीवों पर हो रहे शोध में हर रोज कुछ न कुछ नई जानकारी सामने आ रही

है। इसी क्रम में सुक्ष्माणुओं के इस गुण का भी पता चला है। अनुसंधान में पाया गया है

कि यह खास किस्म के बैक्टेरिया सीधे ऊर्जा के स्रोत से ही बिजली को बतौर ऊर्जा ग्रहण

करने में सक्षम है।

इस शोध के निष्कर्ष को सरल बनाते हुए वैज्ञानिकों ने बताया है कि जिस तरीके से इंसान

अथवा अन्य जानवर अपने भोजन से ऊर्जा प्राप्त करते हैं, ठीक उसी तरह इस प्रजाति की

बैक्टेरिया का भोजन ही बिजली है। वह ऊर्जा से अपनी ऊर्जा सीधे हासिल कर लेता है।

इस लिहाज से यह कहा जा सकता है कि यह जीवाणु बिजली खाता है और उसी के सहारे

जीवित रहता है।

बिजली खाने वाले इस बैक्टेरिया का नाम रोडोपसियूडोमोनास पालुसट्रिट है। यह अपने

बाहरी आवरण से सटने वाली किसी भी बिजली युक्त पदार्थ से बिजली को अंदर खींच

लेता है। उसके अंदर के प्रोटिन इस अवस्था में पहुंचने के बाद बिजली को अंदर तक ले

जाने के लिए अपनी संरचना में बदलाव करते हैं। इससे बिजली के स्रोत से अंदर तक एक

अदृश्य का पुल बन जाता है। जिससे बिजली अंदर की तरफ चली जाती है।

बिजली खाने का पता चलने के बाद विधि को खोजा गया

वाशिंगटन विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने इस पर काम किया है। इसमें जो तथ्य

सामने आये हैं, उन्हें एक वैज्ञानिक पत्रिका जर्नल एमबॉयो में प्रकाशित भी किया गया है।

शोधकर्ताओं ने बताया है कि दरअसल इस प्रजाति की बैक्टेरिया के मुंह नहीं होते।

लेकिन जीवन चक्र को आगे बढ़ाने के लिए वह ऊर्जा कहां से ग्रहण करते हैं, इसी सवाल

पर यह शोध प्रारंभ हुआ था। शोध में यह पता चला कि बिना मुंह और भोजन के भी

जीवन आगे बढ़ाने में यह बैक्टेरिया ऊर्जा के परिष्कृत स्वरुप का ही इस्तेमाल करता है।

यानी जहां कहीं भी बिजली का स्रोत मौजूद होता है, वह सीधे उसी स्रोत से अपने लिए

ऊर्जा एकत्रित कर लेता है।

इस शोध से जुड़ी भारतवंशी वैज्ञानिक अर्पिता बोस ने इस बारे में कुछ और जानकारी दी

है। वह विश्वविद्यालय में सहायक प्रोफसर हैं। उनके मुताबिक बैक्टेरिया के इस आचरण

को समझने में काफी परिश्रम करना पड़ा है क्योंकि सामान्य समझ के मुताबिक कोई

प्राणी इस तरीके से भी ऊर्जा हासिल कर सकता है, इसकी कल्पना तक नहीं की गयी थी।

उन्होंने स्पष्ट किया कि दरअसल इन जीवाणुओं की आंतरिक संरचना में मौजूद प्रोटिनों

की वजह से ऐसा संभव हो पाता है। यह सारी ऊर्जा प्रोटिनों के माध्यम से ही परिष्कृत

ऊर्जा में तब्दील होकर बैक्टेरिया के काम आती है।

जिस तरीके से पेड़-पौधे सूर्य की रोशनी से फोटो संश्लेषण के माध्यम से ऊर्जा ग्रहण करते

हैं, ठीक उसी तरह यह बैक्टेरिया भी काम करते हैं। इसमें वे किसी भी ठोस अथवा तरल

पदार्थ में मौजूद बिजली से अपने लिए ऊर्जा हासिल कर लेते हैं। उनके सहयोगी दिनेश

गुप्ता ने कहा कि फोटोट्रॉपिक बैक्टेरिया के इस आचरण का पता चलना हैरान करने वाली

बात थी। इसके माध्यम से अब इलेक्ट्रान के स्थानांतरण में प्रोटिनों की भूमिका की

जानकारी पहली बार मिल पायी है।

इस ऊर्जा के अंदर लेने में प्रोटिन संरचना की भूमिका

इस पद्धति का और बेहतर अध्ययन कर बॉयो डीजल बनाने की पद्धति को और बेहतर भी

बनाय जा सकता है। इस बैक्टेरिया के बाहरी स्तर के अंदर किस तरीके से बिजली पहुंचती

हैं। यह आवरण अपने आप में इलेक्ट्रोड अथवा लौह खनिज से कोई प्रतिक्रिया नहीं

करता। लेकिन आंतरिक प्रोटिन की संरचना में इस बिजली के करीब जो प्रतिक्रियाएं होती

है, उससे बिजली सीधे बैक्टेरिया के अंदर पहुंचने लगती है। बैक्टेरिया के अंदर प्रोटिन की

संरचनाएं ही इस बिजली को परिष्कृत ऊर्जा में बदल देती हैं।

प्रयोगशाला में यह अनुसंधान पूरा कर लेने के बाद यह वैज्ञानिक दल जंगलों और खुले

वातावरण में इसकी गहन जांच की तैयारी कर रहा है। इसके बारे में एक बॉयोलॉजिकल

मार्कर तैयार करने की बात कही गयी है। ताकि इस किस्म का आचरण करने वाले अन्य

प्राकृतिक जीवन का गहराई से पता लगाया जा सके।

कुछ लोग मानते हैं कि बिजली खाने में सक्षम इस बैक्टेरिया की संरचना की बदौलत

ऊर्जा के स्वरुप में तब्दीली के नये द्वार खुल सकते हैं। शोध से जुड़े वैज्ञानिक यह भी

मानते हैं कि इसके बारे में अधिक जानकारी मिलने पर पृथ्वी पर जीवन के क्रमिक

विकास की अन्य गुत्थियों को भी सुलझाने के नये रास्ते मिल सकते हैं।

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7 Comments

  1. […] शोधकर्ताओं ने इसके लिए सुक्ष्म जीवन को अलग अलग परिस्थितियों में रखकर भी उनकी जांच की। यह पाया गया कि अलग अलग भोजन के क्रम में उनका विकास भी अलग अलग हुआ। […]

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