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एसपी लिपि सिंह के मामले में अंदर सुलग रही है आग




  • नीतीश के आज के बयान के अलग अलग अर्थ

  • मुंगेर में हिंसा के बाद चुनाव आयोग ने हटाया

  • रिपोर्ट के नाम पर चुप्पी साध गये अधिकारी

ब्यूरो प्रमुख

भागलपुरः एसपी लिपि सिंह के मुद्दे पर सिर्फ मुंगेर ही नहीं बिहार के कई जिलों में असंतोष

की आग अंदर ही अंदर सुलग रही है। दरअसल इसे राजनीतिक मामला बताने वाले इस

बात से शायद बेखबर हैं कि बतौर एसपी लिपि सिंह ने कई अधीनस्थ अधिकारियों के साथ

अपने अभद्र व्यवहार की वजह से दुश्मनों की एक बड़ी फौज खड़ी कर रखी है। वे आज भी

मुंगेर की घटना पर वरीय अफसरों द्वारा क्या कुछ किया जाता है, उस पर नजर रखे हुए

हैं। लेकिन चुनाव आयोग के निर्देश पर उन्हें मुंगेर से हटाने के बाद भी उनके खिलाफ जांच

रिपोर्ट का मामला अभी शायद ठंडे बस्ते में चला गया है। इस घटना पर रिपोर्ट देने की

कार्रवाई पर किये गये सवाल पर अधिकांश अफसर चुप्पी ही साध रहे हैं।

वीडियो में जान लीजिए इससे संबंधित जानकारी

इससे स्पष्ट है कि फिलहाल इस सरकार में कोई भी एसपी लिपि सिंह के खिलाफ कोई

कार्रवाई करने की हैसियत में ही नहीं है। इस विवाद के नये सिरे से सुलगने के बाद पुरानी

घटनाओं को भी लोग याद करने लगे हैं। पुलिस विभाग में इस बात की चर्चा है कि अपने

राजनीतिक प्रभाव की वजह से ही उहोंने एक डीएसपी को अपने चैंबर में बुलाकर

अपमानित किया था। तब भी लोग यही कहा करते थे, जो अभी कहा जा रहा है कि सैंया

भए कोतवाल तो डर काहे का। यह कहावत मुंगेर के तत्कालीन एसपी लिपि सिंह पर

चरितार्थ होती दिख रही है। राजनीतिक सत्ता के मद में चूर लिपि सिंह ने मुंगेर को

जलियावालाबाग बना दिया और जनरल डायर की तरह गोली चलाने का फरमान जारी कर

दिया। सत्ता के रसूख धारों में शामिल आरसीबी सिंह की बेटी और एसपी लिपि सिंह ने

धार्मिक भावना को ठेस पहुंचाते हुए जो घृणित कार्य किया है उसके लिए चुनाव आयोग ने

उसे तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया है। लेकिन सवाल यह भी है कि जिसके घर का

चिराग बुझ गया क्या उसके लिए लिपि सिंह की यह सजा जख्मों पर मरहम लगाने का

काम कर सकती है। यह अपने आप में एक बड़ा सवाल है साथ ही साथ लालफीताशाही

जैसे चीजों पर एक बड़ा सवालिया निशान खड़ा करते हैं कि जिस तरह से सुशासन का नाम

नहीं सरकार ने अपने शासन को दिया था। सुशासन का यह निर्णय एक बार फिर से

ब्रिटिश हुकूमत की तस्वीर को ताजा कर देती है। इस तरह के मामले में अफसरों को

बर्खास्त कर हत्या के लिए बनी हुई धारा 302 के तहत कार्रवाई भी काफी कम होगी।

एसपी लिपि सिंह विवाद के बीच नीतीश का नया बयान

इस बीच नीतीश कुमार की आज की जनसभा में कही गयी बातों के अलग अलग

निहितार्थ निकाले जा रहे हैं। नीतीश कुमार ने इस चुनाव को अपना अंतिम चुनाव बताकर

एक साथ कई बहसों को जन्म देने का काम किया है। चुनाव प्रचार का अंतिम दिन बीत

जाने के दौरान ही नीतीश कुमार के इस बयान की लोग अलग अलग तरीके से व्याख्या

करने में जुटे हैं। नीतीश विरोधियों का आकलन है कि संभावित चुनाव परिणाम को नीतीश

कुमार भांप चुके हैं और इसी वजह से आगे चुनाव नहीं लड़ने की बात कर रहे हैं। दूसरी

तरफ नीतीश समर्थकों के बीच ऐसी चर्चा है कि इस बार भी जबर्दस्त जीत दर्ज करने के

बाद वह अपने सुशासन बाबू की छवि को बरकरार रखते हुए बिहार की राजनीतिक

सक्रियता से खुद को दूर करना चाहते हैं। वैसी स्थिति में वह दिल्ली की राजनीति पर

अपना ध्यान केंद्रित करेंगे। इन परस्पर विरोधी दावों के बीच एक वर्ग ऐसा भी है, जो यह

मानता है कि नीतीश  कुमार की सोच को इतनी आसानी से पकड़ पाना संभव नहीं हैं। आगे

जो कुछ घटित होगा, उससे साफ हो जाएगा कि उन्होंने किस संदर्भ में यह बात कही थी।

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