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सुर ना सजे क्या गाऊं मैं सुरके बिना जीवन सूना

सुर नहीं सज रहा है। सही कहें तो सब कुछ फिलहाल तो बेसुरा ही है। हर दिन चार लाख से

अधिक रोगी और चार हजार से अधिक मौत। किसने सोचा था कि लापरवाही की ऐसी

सजा भी मिलेगी। लेकिन सवाल है कि लापरवाही किसकी और सजा किसे मिल रही है।

फिर से लॉकडाउन के प्रावधान यानी छोटे कारोबारी फिर से तबाह। अब हालत सुधरे तो

फिर आगे की रोशनी नजर आये। फिलहाल तो अंधेरा ही अंधेरा है। पिछले पंद्रह दिनों से

जारी जुबानी जंग के बीच अब तक केंद्र सरकार ऑक्सीजन की व्यवस्था नहीं कर पायी।

जिस ठेकेदार को ऑक्सीजन प्लांट लगाने का पैसा दिया था, वह कौन है और कहां है, इस

बारे में सभी मौन हैं। आखिर यह माजरा क्या है। सितंबर के बाद से जब मरीजों का आंकड़ा

नीचे आने लगा, तो नीचे से ऊपर तक सभी लापरवाह हो गये। इस लापरवाही में आम

जनता भी कब जिम्मेदार नहीं। हालांकि उसे तो अपना परिवार पालने की चिंता भी थी।

फिर भी नियमों और बचाव के प्रावधानों का हमलोगों ने खूब उल्लंघन किया। दूसरी तरफ

हमारी आंखों से ओझल रहने वाला दुश्मन अपनी फौज बढ़ाता चला गया। अब हालत हम

सभी के सामने है। साफ है कि सिर्फ भाषणों से यह संकट टलने वाला नहीं है। जिन्हें काम

करना चाहिए उनमें से अधिकांश सीन से गायब हैं और सिर्फ सोशल मीडिया पर अपनी

मौजूदगी जता रहे हैं। कोरोना से लापरवाह सरकार इतने दिनों तक चुनाव में लगी रही।

अगर गंभीरता से विशेषज्ञों की सलाह पर ध्यान दिया होता तो अस्थायी अस्पताल,

ऑक्सीजन और दवा के भंडारण पर भी पर्याप्त और यूं कहें कि देश की जरूरत से बेहतर

इंतजाम हो चुका होता।

केरल ने पहले से अपने ऑक्सीजन उत्पादन क्षमता को बढ़ाया

केरल को देखिये, वहां खतरे का अंदेशा था। इसलिए वहां ऑक्सीजन उत्पादन की क्षमता

को इसी दौरान बढ़ा लिया गया। वहां की सरकार भी चुनाव लड़ रही थी और चालीस साल

के केरल के चुनावी इतिहास में दूसरी बार वामपंथी मोर्चा सरकार बना रही है। लेकिन

बाकी जगह का हाल देखकर लगता ही नहीं है कि सरकार है। केंद्र और राज्य सरकार एक

दूसरे पर जिम्मेदारी डालने का खेल खेलने में व्यस्त हैं। इसी बात पर एक पुरानी फिल्म

का गीत याद आ रहा है। फिल्म बसंत बहार के लिए इस गीत को लिखा था शैलेंद्र ने और

संगीत में ढाला था शंकर जयकिशन ने। इसे मन्ना डे ने अपने क्लासिकल अंदाज के

गायन में नई ऊंचाई प्रदान की थी। गीत के बोल हैं।

सुर ना सजे क्या गाऊँ मैं सुर ना सजे क्या गाऊँ मैं
सुरके बिना, जीवन सूना सुर के बिना, जीवन सूना

सुर ना सजे क्या गाऊं मैं सुर ना सजे …
जलते गया जीवन मेरा जलते गया जीवन मेरा
इस रात का न होगा सवेरा इस रात का न होगा सवेरा

सुर ना सजे …
दोनों जहां, मुझसे रूठे दोनों जहां, मुझसे रूठे
तेरे बिना ये गीत भी झूठे तेरे बिना ये गीत भी झूठे

सुर ना सजे …
तट से लगी नदिया गावे तट से लगी नदिया गावे
पी तुम कहाँ पपीहा गावे पी तुम कहाँ पपीहा गावे

सुर ना सजे …
संगीत मन को पंख लगाए
गीतों में रिमझिम रस बरसाए

संगीत मन को पंख लगाए
गीतों में रिमझिम रस बरसाए
स्वर की साधना स्वर की साधना
परमेश्वर की

सुर ना सजे क्या गाऊं मैं

खैर सरकारी सुर अगर बेसुरा है तब भी अच्छी बात यह है कि अपनी आदत के मुताबिक

देर से ही सही लेगी देश की जनता और सामाजिक संगठन फिर से जाग चुके हैं। अपने

अपने स्तर पर हर कोई जितना हो सके प्रयास कर रहा है। अपने आस पास की जरूरतों का

ख्याल रख रहा है। इससे हालत काफी संभली है। शायद इनका प्रयास देखकर भी सरकारों

को अपनी जिम्मेदारियों का एहसास हो। हर बात का फैसला कोर्ट से हो, यह भी लापरवाही

और गैर जिम्मेदारी का उदाहरण भर है। चुनाव निपट चुके हैं। अब तो हुजूर लोग उस काम

पर ध्यान दिये, जिसके लिए जनता ने आपको चुनकर भेजा है। वरना अगला चुनाव आने

तक जनता आपको याद रखेगी या नहीं, यह भी सोचने वाली बात है। वैसे भी अगले चुनाव

तक मतदाता सूची से कितने नाम गायब हो चुके होंगे, यह भी देखने लायक बात होगी। हर

दिन अगर चार हजार से अधिक लोग देश में मर रहे हों तो समझा जा सकता है कि पूरी

सरकार के सुर बिगड़े हुए हैं और व्यवस्था बेसुरी हो चुकी है। टीकाकरण का लफड़ा क्या है,

यह खुलकर कोई नहीं कहता जबकि टीका बनाने वाली कंपनी का सबसे बड़ा अधिकारी

लंदन भागकर वहां दूसरा काम कर रहा है। खैर जो है, उसे तो सुर में मिलाइये। ऑक्सीजन

की व्यवस्था सुधारिये, जांच की गति तेज कीजिए और दवा का भंडारण और वितरण

दुरुस्त कीजिए हुजूर लोग

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